गीता अध्याय 1 श्लोक 12 एवम 13
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अब तक देख चुके हैं कि जब अच्छाई और बुराई का सीधा आमना सामना होता है तो बुराई का मुख्य किरदार मोह रूपी दुर्योधन किस प्रकार विचलित हुआ रहता है और ऐसा इंसान खुद के बल की प्रसंसा कर खुद को दिलासा देने की कोशिश करते रहता है कि उज़के पास तो तरह तरह के मित्र हैं जैसे भ्रम,असत्य, अहंकार, हिंसा, क्रोध, इत्यादी तो उसे कौन हरा सकता है। लेकिन जब जब उसकी घबराहट सामने आती है तो उसकी रक्षा में सर्वप्रथम, उसी के भ्रम और कामनाएँ सामने आती हैं। आदमी के आसुरी सम्पदाओं यानी बुराई के मुख्य पोषक भ्रम और कामनाएँ ही होती हैं। भ्रम इंसान को दिलासा देता है कि तुम्हारे अवगुण ही तुम्हारी ताकत हैं, सो तुम घबराओ मत। इस मानसिकता में इंसान अपनी ही इक्षाओं का गुलाम बनकर अपने अहंकार, क्रोध, असत्य, हिंसा के बल पर प्रेम, सद्भाव, सत्य, विवेक जैसे अपने ही सदगुणों को मारता है। भ्रम में और कामनाओं में उलझे आदमी को सदगुणों से युक्त व्यक्ति ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन प्रतीत होता है। यही हाल महाभारत के युद्ध के इस घड़ी हो रहा है। विचलित दुर्योधन को दिलासा देने भीष्म आगे आते हैं, गुरु द्रोण नहीं। भीष्म शेर जैसी गर्जना कर अपना शंख बजाते हैं ताकि दुर्योधन सहित अन्य कौरव योद्धा उत्साहित हों, उनमें हिम्मत आये और युद्ध के लिए वे मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।
गीताकार के द्वारा जिन शब्दों का चयन किया गया है उनपर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। भीष्म ने शेर जैसी गर्जना की। ध्याम देने योग्य बात है कि शेर की दहाड़ भय पैदा करती है। आसुरी वृत्तियाँ इंसानों के मन में डर ही जगाती हैं और डराकर ही लोगों से काम निकालना आता है उनको। उनसे प्रेम और निडरता नहीं हो पाती। लेकिन बुराइयों को ऐसा ही बर्ताव करना पसंद है, सो भ्रम मोहवश ऐसा ही करता है। वह अपनी तरह अन्य लोगो को भी ऐसा ही करने के लिए उकसाता है और अन्य बुराइयाँ भी डर पैदा करने वाला कोलाहल ही करती हैं, उनके सुर में कोई लयबद्धता नहीं होती है।
दूसरी तरफ ये भी ध्यान देने योग्य है कि अच्छाई बुराई पर कभी पहले हमला नहीं करती। युद्ध के लिए दोनों पक्ष की सेनाएँ आमने सामने थीं, लेकिन युद्ध का उद्घोष अहंकार रूपी कौरवों के पक्ष से उनके भ्रम यानी भीष्म के द्वारा होता है। भीष्म पितामह हैं, भ्रम बुराइयों का पितामह है।