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Showing posts from April, 2021

Regional and class discrimination in COVID reporting

Regional and class discrimination in COVID reporting  Although discussions on the terrible form of COVID in India today are going on in the country and abroad, it is only a discussion of the metropolitan middle / upper class.  Common urban areas and rural areas are missing from that discussion, the lower middle class / lower class, unpriveleged sections of society, women and children are missing.  Indian journalism with  all its flaws   is limited to the discussion of metros and the upper class and upper middle class.  The responsibility of collecting the news from  the small places have been left to  the local journalists who themselves work in such a coersive environment that it is not possible for them all the time  to collect reliable news .  Also, there is no system to integrate local journalism into national journalism.  In addition, Indian journalism has also become hostage to Opinion Moguls.  This journalism is so ...

कोविड रिपोर्टिंग में क्षेत्रीय और वर्गीय भेदभाव

कोविड रिपोर्टिंग में क्षेत्रीय और वर्गीय भेदभाव हिंदुस्तान में कोविड के भयानक रूप पर जो चर्चा आज देश विदेश में हो रही है वह महानगरीय मध्यम/उच्च वर्ग की ही चर्चा है। उस चर्चा से सामान्य शहरी क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र तो गायब है ही, निम्न मध्यम वर्ग/निम्न वर्ग, समाज के unpriveleged वर्ग, स्त्रियाँ और बच्चे गायब हैं। भारतीय पत्रकारिता अपनी तमाम खामियों में ये खामी भी रखता है कि पत्रकारिता महानगरों की चर्चा और सम्पन्न वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग की  चर्चा तक ही सीमित है। छोटी जगहों की खबरों को इकट्ठा करने की जबाबदेही जिन स्थानीय पत्रकारों पर छोड़ दी गई है वो इतने coersive माहौल में काम करते हैं कि उनके माध्यम से विश्वसनीय खबरों को इकठ्ठा करना सम्भव नहीं होता है। साथ ही राष्टीय पत्रकारिता में स्थानीय पत्रकारिता को integrate करने की कोई व्यवस्था भी नहीं है। इसके अतिरिक्त भारतीय पत्रकारिता ओपिनियन मोगल्स की बंधक भी बन चुकी है। ये पत्रकारिता इतनी सतही है कि यदि कुछ विषयों के विशेषज्ञ यदा कदा कुछ लेख अखबारों पत्रिकाओं में नहीं लिखे तो भारी अकाल पड़ जाए। TV के डिबेट तो महज नौटंकी हैं।  ऐसी स...

COERCION FREE EDUCATION

  COERCION FREE EDUCATION We must explore the ways to make education free to all and at the same time to make education free from all external coercion.  This will be one of the most striking steps in our fight against poverty. It has been accepted on the basis of evidences that education , if not single is one of the most potent ways for ensuring socio-economic upward mobility. But as it's has been almost impossible to provide equality of opportunity for acquiring education , poverty continues to thrive on inequality of educational opportunity. Everywhere there are so many types of education , some for the poor, some for the middle, and a few for the rich.  Education for the rich is highly supported by the hefty fees and donations by the rich, but that for the poor and the middle is sustained by the governments. Governments put all their efforts to keep education suitable for their own survival. In either case education is subjected to some sorts of external coercion, so...

SCIENCE IS PARAMOUNT

SCIENCE IS PARAMOUNT Throughout the history it's a proven fact that people can be affluent materially and spiritually only by following the path of science. Science is like any other stream  of knowledge gained by experience and practice. Anything which is empirically possible, anything which has evidence based explanation is a science. This leads us to do innovations and through innovations we can find newer ways to enrich our life.          Since science is evidence based it's the most important ingredient of a public policy both as means and end. When a policy is made for the common good of the people of a society it must be designed by taking the impact  into account . Take for example, the current pandemic of COVID 19 in Indian context. At present the entire nation is mourning under the heat of the pandemic. But how could the virus play such a devastating impact only in India whereas in most parts of the world the second phase passed with comparat...

आगे का रास्ता

                आगे का रास्ता नवधनाढ्यों की सम्पत्ति को गिन गिन कर और सूट बूट वाले मध्यमवर्ग के द्वारा लोन पर जीवन जीने के क्रेज को देखकर हम भी कई ट्रिलियन का इकॉनमी बनने का ख्वाब पाल रहे थे। उस समय भी कतिपय समाज विज्ञानी, अर्थशास्त्री , और अन्य विद्वान और यँहा तक कि ठीक ठाक समझदार लोग इस बात से आगाह कर रहे थे कि बिना मौलिक संरचनाओं की मजबूती के, बिना ह्यूमन इंडेक्स को ठीक करने वाले कदम उठाए, बिना असमानता को डील किये, बिना अधिसंख्य आबादी का स्तर उठाये इस तरह के दावे करना सिरे से बेवकूफी करना होगा। लेकिन समय रहते इन सुझावों का मजाक उड़ाना कितना महँगा पड़ रहा है, इसे अलग से रेखांकित करने और इसकी व्याख्या करना जरूरी नहीं है। इसके साथ ही ये भी जरूरी था और आज भी है कि हम आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए शिक्षा, विज्ञान, शोध, मैन्युफैक्चरिंग, और कृषि पर पर्याप्त जोर देने की जरूरत को समझें। वर्तमान में हम बाजार, उपभोक्ता और क्लाइंट सर्वर बनकर खुश हैं। हमारी IT इंडस्ट्री जिसके बारे में ढेरों गलतफहमियां समाज के मध्यम वर्ग में है, मूल रूप से सॉफ्टवेयर जानकार क्लर्...

WHY WE NEED TO BEHAVE IN A SCIENTIFIC WAY

    WHY WE NEED TO BEHAVE IN A SCIENTIFIC WAY Time is tough at present, no doubt. But this tough time also reminds us that this world may be made a better place for all those who wish to save this world for our future generations. Issues of sustainable development, climate change, scientific temperament and achievement of common good are still relevant in the midst of the pandemic. COVID has reminded us where we faulted. If our thirst is for earth as a better place we in the midst of the pandemic will not lose chance to evaluate how and why our arrangements and managements failed. Politics has its answer in its own lucid style but this is not the whole story.  Our abhorrence for scientific understanding of the issue both at societal level and political level has made us totally hapless. We must have to adopt science as a way of thinking .     Note--how this scientific habit can be strengthened by our spiritual pursuit will be discussed tomorrow.

रिश्ता ऐप

                  रिश्ता ऐप कोविड ने एक तरफ जँहा विकास के बुलबुले को झटके से फोड़ कर हवा में उड़ा दिया है वंही दूसरी तरफ इसने रिश्तों की पोल भी खोल कर रख दिया है और दिखा दिया है कि रिश्तों में कितनी हवा भरी हुई थी। सोशल मीडिया ने एक आसान आउटलेट दे दिया है, कुछ अफसोस के पोस्ट किए, कुछ हौसला अफजाई के शेर पढ़े और फिर लग गए धंधे पर। लेकिन पोल तो तब खुल जाती है जब (खुदा न करे किसी को ये बीमारी हो) किसी को कोविड का संक्रमण हो जाता है तो परिवार के रिश्तेदार, मित्र आदि उस बीमार से ऐसे पेश आने लगते हैं जैसे वो अछूत हो। ये सही है कि कोविड संक्रमण सम्पर्क से फैलता है लेकिन ऐसा भी नहीं कि पूरे सुरक्षात्मक व्यवस्था के साथ आप उस इंसान या उसके परिवार से नहीं मिल सकते, उसे आवश्यक मदद नहीं दे सकते। लेकिन ये सम्पर्क तभी होता है जब आपको उस इंसान या उसके परिवार से आपको अपना कोई हित साधना हो , नहीं तो दूर से ही व्हाट्सएप्प और फेसबुक के माध्यम से दुआ सलाम कर लेते हैं लोग घर और पड़ोस में रहने वाले भी। इंसानी रिश्ते  को भी आभासी(वर्चुअल) बना छोड़ा है। वीडियो काल से ...

ISSUES OF DISCRIMINATION IN EDUCATION

ISSUES OF DISCRIMINATION IN EDUCATION 1. Parents discriminate among their children to give one child better education whom they consider can be winner. 2.Parents discrimate against their girl child as girl child even after being educated can't be an economic asset for the parents family. 3.Parents discriminate against girl child culturally as well. 4. Parents discrimate in favour of even even a girl child if girl child has better scope of being employed and in turn it's easier to marry her without dowry. 5. Teachers discriminate on the basis of (a) caste (b) economic status of children (c) other nepostic grounds 6. Caste based discrimation has multidimensional , (a) SC teachers may go against SC students considering SC students can't be able to be a good student (b) OBC teachers may favour OBC students for bringing them in competition with upper caste students. 7. Self discrimination is another basis. This is based on self image of children, parents and teachers. Many child...

नागरिकता के सवाल और कोविड 2

नागरिकता के सवाल और कोविड 2 भारतीयों को एक बार फिर से याद करना चाहिये कि सरकारों का गठन क्यों किया जाता, लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली क्यों माना जाता है , लोककल्याणकारी राज्य की कल्पना को क्यों साकार किया गया, संविधान क्यों और कैसे बना और मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वो के बीच क्या सम्बन्ध है और क्या समझ इन दोनों के बीच विकसित होने चाहिए थे। ये नागरिकता के वे मौलिक सवाल हैं जिनका उत्तर जाने बिना सिर्फ 18 वर्ष पूरा कर लेने भर से नागरिकता की आत्मा व्यक्ति में प्रवेश नहीं कर जाती है। ये सवाल ऐसे हैं जिनका जबाब आपको आना ही चाहिए और आपका ये फर्ज बनता है कि आप इन जबाबों से सामान्य जन को शिक्षित भी करें। सत्ता हमेशा चाहेगी कि आपको इन सवालों के जबाब नहीं मिल सकें और यदि आपको मिल भी जाते हैं तो आप इनको दूसरों से साझा नहीं कर पाएं। परम्परागत रूप से यह काम शिक्षा व्यवस्था को तो करनी ही है साथ ही साथ प्रेस और मीडिया का भी यही प्राथमिक दायित्व होता है। प्रेस और मीडिया का प्राथमिक के कार्य समाचारों का प्रसार नहीं है, यह तो उनका द्वितीय दायित्व है। लेकिन इन सवालों के जबाब सिखान...

महामारी में शिक्षा

महामारी में शिक्षा Pandemic के कारण जब शिक्षण संस्थान बन्द कर दिए गए हैं और सिर्फ ऑनलाइन शिक्षा की अनुमति दी गई है तो इस व्यवस्था का सतत मूल्यांकन भी आवश्यक है और वर्तमान में pandemic की भयावहता और व्यापकता को देखते हुए ये आवश्यक है कि यदि भौतिक रूप से मूल्यांकन करना सम्भव नहीं हो तो इसका मूल्यांकन ऑनलाइन ही किया जाए। साथ ही परीक्षाओं के रद्द किए जाने और संस्थाओं के बन्द किये जाने का जो मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव पड़ने या पड़ रहे होने की आशंका है उससे निबटने के लिए ऑनलाइन ही मनोवैज्ञानिक  अध्ययन और सलाह की भी सख्त जरूरत है। सनद रहे कि pandemic के इस काल में  कँही हम पूरी पीढ़ी को ही शैक्षणिक रूप से दिवालिया न हो जाने दें। बहुतेरे तकनीकी माध्यमों को तत्काल विकसित करने और उनका उपयोग करने की जरूरत है ताकि हम इस समय भी शिक्षा के क्षेत्र में जड़ता और अराजकता दोनों नहीं आने दें। देश का भविष्य शिक्षा पर ही टिका होता है, इसके बिना किसी भी तरह के विकास और जनोउन्मुखी राजनीति की कल्पना कोरी कल्पना ही है।

भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा

भौतिक और आध्यात्मिक शिक्षा अगर आप कुछ सीखते हैं और सिख कर उसे अपनाते नहीं सिर्फ उस शिक्षा की महत्ता का गुण गाते रहते हैं तो यही पाखण्ड है। हममें से अधिकांश का जीवन इसी पाखण्ड को सजाते संवारते गुजर जाता है। और यंही से कट्टरता भी शुरू होती है। जो कुछ हम उच्च आदर्शों से सीखते हैं यदि उनको अपने जीवन पद्धति में लागू करते या करने की कोशिश करते तो हमारा दर्शन कट्टर नही। होता क्योंकि कोई भी आदर्श कट्टरता की सीख नहीं देता। लेकिन दिक्कत ये है कि हम आचरण नहीं संवारते आवरण संवारते हैं और आवरण तो बाहरी आबोहवा के अनुकूल ही होता है न। हम तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार अपना आवरण तो कर लेते हैं लेकिन आचरण का कोई तालमेल हमारी शिक्षा से नहीं होता है। और हम ये भूल गए हैं कि सारी भौतिक शिक्षा का सांसारिक महत्व तभी तक है जब तक उस शिक्षा का सदुपयोग बिना किसी भेद भाव के सम्पूर्ण समुदाय और समाज के लिए किया जाए और भौतिक शिक्षा का ये उपयोग करने की व्यवहारिक शिक्षा हमें अपने अध्यात्म से मिलती है। यदि हम सभी की समानता, सभी के समान अधिकारों, सभी के गौरव और सम्मान की रक्षा की भावना के बीना भौतिक ज्ञान का उपयोग करत...

कोविड, शिक्षा और विकास

कोविड, शिक्षा और विकास पश्चिमी देशों में जँहा जँहा राजनीति असफल हो रही है, वँहा विश्विद्यालय उस असफलता से निपटने के तरीकों को ईजाद कर रहें हैं , जबकि हमारे यँहा असफल राजनीति का एक शिकार खुद विश्वविद्यालय ही होते जा रहें हैं। हैदराबाद और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से शुरू हुई कहानी अशोका यूनिवर्सिटी से भी आगे निकल रही है। कोविड pandemic से जूझते पश्चिम और पूरब के कुछ देशों में वँहा के विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षा संस्थानों ने अपने रिसर्च के बदौलत सुधार के मॉडल देने शुरू कर दिए हैं जबकि हम शिक्षा को बंद करने के कोई मौके को चुकने के लिए भी तैयार नहीं हैं। शिक्षा सिर्फ डिग्री पाने की कहानी नही होती इसमें अध्ययन, व्यख्या, रिसर्च  आदि भी शामिल हैं जिनके प्रति हमारा आत्मघाती दुराव हमारे पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह है। हमने पिछड़ेपन और विकास को हमेशा आर्थिक चश्में से देखा है और कभी ये नही समझा है कि इस विकास की पहली पूर्वशर्त ज्ञान का विकास है जो शिक्षा की व्यवस्था से ही सम्भव है। आज पश्चिम के देश कोविड झेलते हुए अपने शहरी संरचना में आवश्यक सुधार की चर्चा कर रहें हैं, उसके लिए तमाम तरह के रि...

CAPITALISM AND FREE WILL

CAPITALISM AND FREE WILL Irony of Indian capitalism is that supporters of free market are the strongest opponents of freedom of citizens. The philosophy of free market, despite all its limitations strongly favours the freedom of choice and freedom of will of common citizens . But Indian middle and upper class which are the biggest supporters of the system of free operation of market have been arduously opposing the idea of free will. This support comes in two ways, one by actively supporting the curbs on freedom and others by actively accepting the curbs. Indian right wing is in moral and philosophical dilemma and so on one hand it's supporting the free growth of biggest capitalist class of the country and on the other hand suppressing any attempt for free will by common masses. This is also being reflected in the policy making process and consequently India is not going to any developmental path. This is the age of moral dilemma of Indian elite class responsible for making policie...

भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथ

भारतीय राजनीति का दक्षिणपंथ आधुनिक भारतीय राजनीति में सही ढंग से कोई Rightist पार्टी नहीं रही है। हाँ Leftist और Centrist रहें हैं। इन दो के अतिरिक्त जो तीसरी महत्वपूर्ण धारा भारतीय राजनीति की प्रारम्भ से  रही है वह है Communalist पार्टियों की धारा। आज जब left और Centrist दल कमजोड हुए हैं तो यही Communalist धारा खुद को भारतीय राजनीति की Rightist धारा होने का दावा करती है, लेकिन उसके दावे के पक्ष में rightist दर्शन नहीं साम्रदायिक और कट्टरपंथी दर्शन रहें हैं और आज भी हैं। विश्व के Rightist पार्टीज का इतिहास देखेंगे तो अमेरिका की रिपब्लिकन और इंग्लैंड की टोरी पार्टी सबसे बड़े उदाहरण हैं और इन दोनों दलों ने समय समय पर ऐसे नेताओं और नीतियों को भी जन्म दिया है जो उन देशों के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए हैं। भारत के राजनीतिक दलों के लगभग 150 सालों के इतिहास में सही मायने में rightist धारा INC के अंदर ही रही जो समय समय पर महान नेताओं को सामने भी लाई। आज जो दल RIGHTIST होने का दावा करती है उसके इतिहास में तो सिर्फ साम्प्रदायिक नेतृत्व ही रहा है, सो अपनी सार्थकता साबित करने के लिए ये द...

WHAT NEXT TO DO

WHAT NEXT TO DO  Now we are in the middle of the second wave of the pandemic COVID 19 and struggling to find the things at their places but feeling not capable to do so. We are struggling on all fronts like those of data collection, tracking and  treatment facilities and vaccination. In fact it is sorry to state that we have treated the pandemic as a health issue alone treatable at hospitals and this approach is the root of all failures. COVID 19 is a not a disease which can be fought at the medical centers alone. Rather it's a public health issue having the capacity to infect the communities at super jet speed and no amount of vaccination or medical treatmen alone are going to help us in our fight against the pandemic. Unfortunately we have ignored the lessons we got from our success in anti kalazar , anti polio, anti malaria campaigns. Intensive scientific research coupled with strengthening of public health system at the grassroot level, extensive survey and mapping , aware...

आत्ममुग्धता

आत्ममुग्धता आत्ममुग्धता एक खरनाक लत है, लग गई तो फिर लग गई, जाती ही नहीं। तो भला इसमें ऐसी  क्या बात है कि इतना एक्साईटेड हुआ जाए? जी बात है और बात भी खुद एक्साइटेड स्टेट में ही है। आत्ममुग्धता व्यक्तित्व के उस हिंसक भाग को उभारता है जिससे खुद के पास  ताकत होने का दम्भ होता है।  ताकत सत्ता को जन्म देती है, और जब सत्ता सयानी हो जाती है तो केन्द्रीयकरण की जननी बन जाती है।केंद्रीययकृत होने से सत्ता को धारण करने वाले को  लगता है कि एक मात्र वो ही तो है जिसपर सब कुछ न्योछावर होना चाहिए। प्रभुता का यह भाव समाज के व्यापक हित पर हमें खुद को थोपने के लिए उकसाता है , जिसके कारण समाज के सामूहिक हित का क्षरण होते जाता है  ।         वर्तमान को आप चाहें तो इस चश्में से भी देखने की कोशिश कर सकते हैं।

कोविड पार्ट 2: लौकडाउन

कोविड पार्ट 2:लौकडाउन  Lockdown एक दंडात्मक और निरोधात्मक कदम है , न कि उपचारात्मक और सुधारात्मक। lockdown से आम जनता के मौलिक और नैसर्गिक अधिकारों का हनन तो होता ही है साथ ही प्रशासनिक नाकामी भी सामने आती है कि समय रहते निरोध के उपाय नहीं किये गए और न ही जनता को समस्या के प्रति साक्षर और जागरूक ही किया गया। इसके साथ ही lockdown राज्य के नीति निर्देशक मार्दर्शिकाओं का भी उल्लंघन है। महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश सरीखे राज्य यदि आज कोविड प्रसार के केंद्र बने हुए हैं तो इसमें वायरस की खूबी नहीं व्यवस्था की नाकामी की कहानी है। यदि समय रहते जागरूकता का अभियान और कड़ाई दोनों किया गया होता तो आज ये नौबत नहीं आती। सरकार के बहुत हाथ पैर होते हैं और सरकारें यदि ठान लें तो बड़ा से बड़ा अभियान आसानी से फलीभूत हो जाता है। लेकिन इन सब के लिए दूरदृष्टि, स्वक्ष मंशा, दृढ़ संकल्प और माइक्रो लेवल के कार्य योजना की जरूरत होती है जो राजनीति करने भर से नहीं आती। कोविड 19 एक पब्लिक हेल्थ इशू है जिसमें पब्लिक के  सामाजिक पहलू रचे बसे हैं। यदि इसे बीमारी यानी डिजीज की तरह नहीं एक पब्लिक हेल्थ इशू के रूप में ट...

चाटुकार एलीट वर्ग के चोंचले

भारतीय जनमानस के सम्बंध में इतनी बात तो बड़ी सहजता से कही ही जा सकती है कि इस देश की आबादी  का अधिकांश हिस्सा ये समझने में असमर्थ है कि उसके जीवन के  लिए, उसकी भावी पीढ़ी के अस्तित्व की रक्षा के लिए क्या जरूरी तौर पर सही है और क्या सही तौर पर जरूरी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जीवन स्तर जैसे कुछ जरूरी सवाल हैं जिनसे हर आदमी को दो-चार होना होता है। ये सवाल सिर्फ उनके लिए जरूरी नहीं हैं जिन्हें ये हासिल नहीं है बल्कि उनके लिए भी है जिनको खुद के लिए तो हासिल है लेकिन अगली पीढ़ी को भी मिल सके इसकी चिंता और सजगता है। ये ही वो मुद्दे हैं जिन्हें मौलिक रूप से सेक्युलर कहा जाता है। लेकिन इस देश का अपर मिडिल क्लास और अपर क्लास समाज के विशिष्ट(एलीट) वर्ग के साथ मिलकर एक ऐसा माहौल बनाने में सफल हुआ है जिसमें मौलिक और सेक्युलर मुद्दों की जगह बनावटी मुद्दे और धार्मिक-साम्प्रदायिक मुद्दे प्रधान बनाये जा चुके हैं। इन मुद्दों के प्रधान बनाने के पीछे की मंशा ये है कि लोगों की मौलिक सेक्युलर समस्यायों का जब निदान होने लगता है तब लोग राजनीतिक सत्ता में भी अपनी वाजिब स्थिति को देखने खोजने लगते हैं...

ELECTIONS FOR VOTERS

As long as in elections politicians , and not voters continue to come first there can not be any quality tivr change in people's life for any positive. If voters wish their own betterment they will have to fight elections for themselves. Paradox of our democracy is that voters go polling booths to exercise their votes in favour of politicians. If they start casting their votes for themselves every thing will change.

गृहयुद्धों का नया दौर

दुनिया  वैश्विक सिविल वॉर के दौर में प्रवेश करने की तैयारी कर रही है, सरकारें, सोशल मीडिया महाबली, वैचारिक विरोधी एलिट्स, और इन सब के बीच आम लोग! इस बार के गृह युद्ध बहुपक्षीय होंगे। सरकारें इनसे बचने के लिए एक दूसरे से उलझने का नाटक कर सकती हैं क्योंकि अंततः उनका बहुत कुछ नहीं खोने जा रहा है ऐसे छद्म युद्धों में। आप देखते चलें , फेक न्यूज़ और हेट न्यूज़ सिविल वॉर और फेक वॉर के कितनी श्रीखनाओं को शुरू करेगी। ये सदी इसी के नाम रहेगी।

भाषा की गरिमा

भाषा व्यक्तित्व का प्रतिनिधत्व करती है। यदि भाषा में गरिमा का अभाव है तो व्यक्तित्व भी गरिमाविहीन ही होती है। खासियत ये है कि भाषा की गरिमा आपके ज्ञान के भण्डार पर निर्भर नहीं करती। ज्ञानी भाषा के उपयोग और प्रयोग में संयमी और जरिमायुक्त हो ये कतई जरूरी नहीं होता। साथ ही व्यंग भाषा की धार होती है जो सीधे सीधे श्रोता के कमजोड नस को ही निशाना बनाती है। जिनको गरिमा का भान नहीं होता वे अपनी समृद्ध भाषा में भी निहायत घटिया प्रतिक्रिया ही देते है।  बाकी सब तो ज्ञानी हैं हीं भईया😄😄😄