नागरिकता के सवाल और कोविड 2
भारतीयों को एक बार फिर से याद करना चाहिये कि सरकारों का गठन क्यों किया जाता, लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली क्यों माना जाता है , लोककल्याणकारी राज्य की कल्पना को क्यों साकार किया गया, संविधान क्यों और कैसे बना और मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक तत्वो के बीच क्या सम्बन्ध है और क्या समझ इन दोनों के बीच विकसित होने चाहिए थे। ये नागरिकता के वे मौलिक सवाल हैं जिनका उत्तर जाने बिना सिर्फ 18 वर्ष पूरा कर लेने भर से नागरिकता की आत्मा व्यक्ति में प्रवेश नहीं कर जाती है। ये सवाल ऐसे हैं जिनका जबाब आपको आना ही चाहिए और आपका ये फर्ज बनता है कि आप इन जबाबों से सामान्य जन को शिक्षित भी करें। सत्ता हमेशा चाहेगी कि आपको इन सवालों के जबाब नहीं मिल सकें और यदि आपको मिल भी जाते हैं तो आप इनको दूसरों से साझा नहीं कर पाएं। परम्परागत रूप से यह काम शिक्षा व्यवस्था को तो करनी ही है साथ ही साथ प्रेस और मीडिया का भी यही प्राथमिक दायित्व होता है। प्रेस और मीडिया का प्राथमिक के
कार्य समाचारों का प्रसार नहीं है, यह तो उनका द्वितीय दायित्व है। लेकिन इन सवालों के जबाब सिखाने में अपने यँहा न तो क्षत विक्षत हुई शिक्षा व्यवस्था है और प्रेस और मीडिया की तो भूमिला ही बदल चुकी है। प्रेस और मिडिया का काम अब सरकारी पक्ष का प्रसार भर रह गया है , वह तो आपको शिक्षित जागरूक करने से रहा। लेकिन अभी भी कुछ बचे हैं जो ये सब करने की कोशिश कर रहें हैं लेकिन सत्ता संचार के माध्यमों पर कब्जा कर उनको भी निष्प्रभावी करने की पुरजोर कोशिश करती है।
लोकतांत्रिक राज्य में सिद्धान्ततः राज्य की शक्ति बहुत सीमित होनी चाहिए थी और कानून बनाने की उसकी शक्ति पर जनता का लगाम होना चाहिए था। लेकिन चुँकि जनता जब खुद के अधिकारों। से अनभिज्ञ है तो फिर सरकारों पर उनका क्या नियंत्रण हो पायेगा।
सैद्धान्तिक विमर्श से हमारे देश में घोर एलर्जी है। लेकिन ये सैद्धान्तिक विमर्श ही है जो व्यवहार की जमीन तैयार करता है। विमर्श के अभाव में हुआ परिवर्तन बहुधा घातक होता है। विमर्श का दायरा दो व्यक्तियों से लेकर पूरे देश तक कुछ भी हो सकता है लेकिन इस विमर्श की उपस्थिति ही हमें अपने वास्तविक स्थिति का ज्ञान कराती है अन्यथा हम पीड़ित होकर भी नहीं जान पाते कि ये पीड़ा हमारे लिए नैसर्गिक नहीं है, किसी के द्वारा बलात हम पर थोपी गई है। आज जब सम्पूर्ण देश कोविड 2 से कराह रहा है तो लोगों को ये जानने की जरूरत है कि ये आपदा न तो आसमानी है, न ही अचानक आई है। इसकी नीव तो पिछले साल सितंबर -अक्टूबर में ही पड़ गई थी जब हम कोविड 1 के गिरते ग्राफ को अपने राजनिज्ञों, नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों की उपलब्धि मान बैठे थे, जब हम कम होते रिसर्च व्यय पर सवाल नहीं करना चाह रहे थे और बिना किसी ठोस जानकारी के उपलब्ध हुए वैक्सीन को संजीवनी मान लिए थे। तथ्य विहीन जानकारी पर और व्यक्ति पूजा पर हमारी जो सांस्कृतिक आस्था रही है हम उसी की कीमत चुका रहें हैं। हमने सवाल करना छोड़कर मजबूत की दावेदारी को सहर्ष स्वीकार किया है तो कीमत तो हम ही चुकाएंगे। अभी भी समय है , आत्ममुग्धता के दौर से बाहर निकल कर विज्ञानपरक और तथ्य परक जानकारी की उपलब्धता की मांग करें। इस लेख के शुरुआत के सवालों के जबाब माँगिये वर्ना अस्तित्वविहीन होकर रह जाना होगा।