रिश्ता ऐप
कोविड ने एक तरफ जँहा विकास के बुलबुले को झटके से फोड़ कर हवा में उड़ा दिया है वंही दूसरी तरफ इसने रिश्तों की पोल भी खोल कर रख दिया है और दिखा दिया है कि रिश्तों में कितनी हवा भरी हुई थी। सोशल मीडिया ने एक आसान आउटलेट दे दिया है, कुछ अफसोस के पोस्ट किए, कुछ हौसला अफजाई के शेर पढ़े और फिर लग गए धंधे पर। लेकिन पोल तो तब खुल जाती है जब (खुदा न करे किसी को ये बीमारी हो) किसी को कोविड का संक्रमण हो जाता है तो परिवार के रिश्तेदार, मित्र आदि उस बीमार से ऐसे पेश आने लगते हैं जैसे वो अछूत हो। ये सही है कि कोविड संक्रमण सम्पर्क से फैलता है लेकिन ऐसा भी नहीं कि पूरे सुरक्षात्मक व्यवस्था के साथ आप उस इंसान या उसके परिवार से नहीं मिल सकते, उसे आवश्यक मदद नहीं दे सकते। लेकिन ये सम्पर्क तभी होता है जब आपको उस इंसान या उसके परिवार से आपको अपना कोई हित साधना हो , नहीं तो दूर से ही व्हाट्सएप्प और फेसबुक के माध्यम से दुआ सलाम कर लेते हैं लोग घर और पड़ोस में रहने वाले भी। इंसानी रिश्ते को भी आभासी(वर्चुअल) बना छोड़ा है। वीडियो काल से दोस्ती और रिश्ता निभाने की रस्म अदायगी ने इंसानों को वर्चुअल ऐप में तब्दील कर दिया है। कोविड के दौर ने रिश्तों की परत उघेड़ कर रख दिया है। न खून का, न दोस्ती का हवाला रह गया है जबकि उसी साइंस ने जिसकी मदद से आप वर्चुअल हो रहें हैं उसने वो तमाम सुविधाएं भी मुहय्या कराई हैं जिनकी मदद से आप न सिर्फ रिश्तों की इज्जत रख पाते बल्कि जरूरत के समय उस बीमार आदमी की भरपूर मदद कर पाते। लेकिन रिश्ते प्ले स्टोर हो चुके हैं और रिश्तेदार और मित्र ऐप , जरूरत के हिसाब से इनस्टॉल और अनइंस्टाल हो रहें हैं।