भारतीय जनमानस के सम्बंध में इतनी बात तो बड़ी सहजता से कही ही जा सकती है कि इस देश की आबादी का अधिकांश हिस्सा ये समझने में असमर्थ है कि उसके जीवन के लिए, उसकी भावी पीढ़ी के अस्तित्व की रक्षा के लिए क्या जरूरी तौर पर सही है और क्या सही तौर पर जरूरी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, जीवन स्तर जैसे कुछ जरूरी सवाल हैं जिनसे हर आदमी को दो-चार होना होता है। ये सवाल सिर्फ उनके लिए जरूरी नहीं हैं जिन्हें ये हासिल नहीं है बल्कि उनके लिए भी है जिनको खुद के लिए तो हासिल है लेकिन अगली पीढ़ी को भी मिल सके इसकी चिंता और सजगता है। ये ही वो मुद्दे हैं जिन्हें मौलिक रूप से सेक्युलर कहा जाता है। लेकिन इस देश का अपर मिडिल क्लास और अपर क्लास समाज के विशिष्ट(एलीट) वर्ग के साथ मिलकर एक ऐसा माहौल बनाने में सफल हुआ है जिसमें मौलिक और सेक्युलर मुद्दों की जगह बनावटी मुद्दे और धार्मिक-साम्प्रदायिक मुद्दे प्रधान बनाये जा चुके हैं। इन मुद्दों के प्रधान बनाने के पीछे की मंशा ये है कि लोगों की मौलिक सेक्युलर समस्यायों का जब निदान होने लगता है तब लोग राजनीतिक सत्ता में भी अपनी वाजिब स्थिति को देखने खोजने लगते हैं। ये मुद्दे ऐसे हैं जिनपर एकता लाने के रास्ते में भावानात्मक अवरोधों को लाना मुश्किल होता है। इनके इस्तेमाल से अपर मिडिल क्लास और अपर क्लास इलीट क्लास के साथ जठजोड कर जन साधारण को आपस में लड़ा भिड़ा कर खुद की सत्ता को अक्षुण रखता है। यही वजह है कि भारतीय एलीट और उसके पार्टनर वर्गों के नामचीन और प्रभावी सदस्य जोर शोर से, तन-मन-धन से सत्ता के खुराफात में सत्ता के सहयोगी बने होने को ही गौरव का विषय मानते हैं। ये बात हिंदुस्तानी सिविलाइज़ेशन में सदियों से गहरी बैठी रही है। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल से अंग्रेजों के राज काज तक ये खालिस भारतीय एलीट आए उच्च वर्गीय लोग ही थे जिनके सहयोग से तात्कालिक सत्ताएँ गद्दी पर आईं भी और राज भी की। यही प्रथा आज भी निभाई जा रही है सो भारतीय एलीट और सहयोगी वर्गों के वर्ग चरित्र पर और उनके कार्यकलापों पर आश्चर्य नहीं किया जा सकता है।
दूसरी तरफ भारतीय मिडिल और लोअर क्लास हमेशा की तरह आर्डर एबाईडर की भूमिका में निष्ठापूर्वक लगा हुआ है। पूरा का पूरा वैल्यू सिस्टम और बिलिफ सिस्टम इसी नैरेटिव को मजबूत करने में लगा हुआ है । इस विचार को ग्रहण करना और आत्मसात करना सबसे बड़ी खूबी के रूप में देखी जा रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से निकले मिडिल क्लास में इस इस चारण प्रवित्ति की बहुत कमी थी। उसे अपने नायकों पर स्वाभाविक भरोसा था । लेकिन समय के साथ नायकों की धोखाधडी जन सामान्य से बढ़ी जिसके परिणाम स्वरूप तात्कालिक नन कॉन्फॉर्मिस्ट मिडिल क्लास विद्रोह और विरोध पर उतर आया। तब एलीट वर्ग ने आर्थिक प्रगति की चकाचौंध का सब्जबाग दिखाना शुरू किया और उसके प्रभाव से मैकाले द्वारा इंफ्यूस कराए गये पुराने संस्कार फिर से पुनर्जीवित हो उठे। आर्थिक समानता की बात गौण कर दी गई और आर्थिक प्रगति की बात लाई गई, सामाजिक न्याय की बात की जगह सामाजिक समरसता का मुहावरा गढ़ा गया और राजनीतिक समानता के बदले राजनीतिक भक्ति का पाठ इंट्रोड्यूस किया गया। सम्पन्नता की रेस में जो छूट रहे थे उनके लिए धार्मिक प्रतीकों और जातीय पहचान का कॉकटेल पेश किया गया। और ये सब किया गया मीडिया में एलीट के द्वारा अबतक के सबसे बड़े आर्थिक और मानव संसाधन और तकनीक के निवेश के जरिये और उसपर के सबसे प्रभावी नियंत्रण के जरिये। इसके जरिये एलीट जन साधरण को ये घुट्टी पिलाने में सफल रहा है कि जन साधारण का भला इस एलीट और उसके सहयोगियों के द्वारा ही सम्भव है। जनता इस घुट्टी को पीकर तरलता महसूस कर रहीं है।
(विपक्ष के एलीट की भूमिका पर आगे के पोस्ट में)