आत्ममुग्धता
आत्ममुग्धता एक खरनाक लत है, लग गई तो फिर लग गई, जाती ही नहीं। तो भला इसमें ऐसी क्या बात है कि इतना एक्साईटेड हुआ जाए? जी बात है और बात भी खुद एक्साइटेड स्टेट में ही है। आत्ममुग्धता व्यक्तित्व के उस हिंसक भाग को उभारता है जिससे खुद के पास ताकत होने का दम्भ होता है। ताकत सत्ता को जन्म देती है, और जब सत्ता सयानी हो जाती है तो केन्द्रीयकरण की जननी बन जाती है।केंद्रीययकृत होने से सत्ता को धारण करने वाले को लगता है कि एक मात्र वो ही तो है जिसपर सब कुछ न्योछावर होना चाहिए। प्रभुता का यह भाव समाज के व्यापक हित पर हमें खुद को थोपने के लिए उकसाता है , जिसके कारण समाज के सामूहिक हित का क्षरण होते जाता है ।
वर्तमान को आप चाहें तो इस चश्में से भी देखने की कोशिश कर सकते हैं।