कोविड रिपोर्टिंग में क्षेत्रीय और वर्गीय भेदभाव
हिंदुस्तान में कोविड के भयानक रूप पर जो चर्चा आज देश विदेश में हो रही है वह महानगरीय मध्यम/उच्च वर्ग की ही चर्चा है। उस चर्चा से सामान्य शहरी क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र तो गायब है ही, निम्न मध्यम वर्ग/निम्न वर्ग, समाज के unpriveleged वर्ग, स्त्रियाँ और बच्चे गायब हैं। भारतीय पत्रकारिता अपनी तमाम खामियों में ये खामी भी रखता है कि पत्रकारिता महानगरों की चर्चा और सम्पन्न वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग की चर्चा तक ही सीमित है। छोटी जगहों की खबरों को इकट्ठा करने की जबाबदेही जिन स्थानीय पत्रकारों पर छोड़ दी गई है वो इतने coersive माहौल में काम करते हैं कि उनके माध्यम से विश्वसनीय खबरों को इकठ्ठा करना सम्भव नहीं होता है। साथ ही राष्टीय पत्रकारिता में स्थानीय पत्रकारिता को integrate करने की कोई व्यवस्था भी नहीं है। इसके अतिरिक्त भारतीय पत्रकारिता ओपिनियन मोगल्स की बंधक भी बन चुकी है। ये पत्रकारिता इतनी सतही है कि यदि कुछ विषयों के विशेषज्ञ यदा कदा कुछ लेख अखबारों पत्रिकाओं में नहीं लिखे तो भारी अकाल पड़ जाए। TV के डिबेट तो महज नौटंकी हैं। ऐसी स्थिति में भारत के अंदरूनी हल्कों में, कमजोड और उपेक्षित वर्गों में , स्त्रियों और महिलाओं में कोविड के प्रसार और प्रभाव का आकलन सम्भव नहीं हो पा रहा है।
हिंदुस्तान में कई NGO इन वर्गों के बीच काम करते हैं। उम्मीद है कि इस महामारी के दौर में भी यथा सम्भव वे क्रियाशील होंगे। यदि वे फर्स्ट हैंड जानकारी और विश्लेषण साझा करें कि कोविड किस प्रकार इन वर्गों को प्रभावित कर रहा है तो सम्भवतः कुछ सच्चाई सामने आ पाए।