कोविड पार्ट 2:लौकडाउन
Lockdown एक दंडात्मक और निरोधात्मक कदम है , न कि उपचारात्मक और सुधारात्मक। lockdown से आम जनता के मौलिक और नैसर्गिक अधिकारों का हनन तो होता ही है साथ ही प्रशासनिक नाकामी भी सामने आती है कि समय रहते निरोध के उपाय नहीं किये गए और न ही जनता को समस्या के प्रति साक्षर और जागरूक ही किया गया। इसके साथ ही lockdown राज्य के नीति निर्देशक मार्दर्शिकाओं का भी उल्लंघन है। महाराष्ट्र , मध्यप्रदेश सरीखे राज्य यदि आज कोविड प्रसार के केंद्र बने हुए हैं तो इसमें वायरस की खूबी नहीं व्यवस्था की नाकामी की कहानी है। यदि समय रहते जागरूकता का अभियान और कड़ाई दोनों किया गया होता तो आज ये नौबत नहीं आती। सरकार के बहुत हाथ पैर होते हैं और सरकारें यदि ठान लें तो बड़ा से बड़ा अभियान आसानी से फलीभूत हो जाता है। लेकिन इन सब के लिए दूरदृष्टि, स्वक्ष मंशा, दृढ़ संकल्प और माइक्रो लेवल के कार्य योजना की जरूरत होती है जो राजनीति करने भर से नहीं आती।
कोविड 19 एक पब्लिक हेल्थ इशू है जिसमें पब्लिक के सामाजिक पहलू रचे बसे हैं। यदि इसे बीमारी यानी डिजीज की तरह नहीं एक पब्लिक हेल्थ इशू के रूप में ट्रीट किया गया होता तो ये नौबत नहीं आती। फिजिकल डिस्टेंसिनग और मास्क का उपयोग करा लेना आसान नहीं होता वो भी उस समाज में जँहा तीज त्योहारों और भीड़ भाड़ वाले सामाजिक परमपराओं की न खत्म होने वाली फिहरिस्त हो। सो इन उपायों को आप जबरदस्ती बहुत समय तक लागू नहीं कर सकते। इशू और बीमारी में फर्क होता है। बीमारी इलाज खोजती है, इशू निदान मांगता है, सो कोविड का निदान उसके इलाज से ज्यादा जरूरी रहा है। प्रयास और फोकस निदान पर होना चाहिए था न कि अस्पतालों के भरोसे आप इंसानों को छोड़ दे सकते हैं। किसी भी देश की आबादी की तुलना में अस्पतालों की हैसियत बहुत छोटी होती है सो आबादी को शिक्षित और जागरूक करने पर ज्यादा जोर होना चाहिए था। TV पर कुछ चेहरों से प्रचार करा कर कर्तव्य की इतिश्री समझ लेना एक भूल थी और इस भूल की कीमत दम तोड़ती जिंदगियां और चरमराते अस्पताल चुका रहें हैं आज।