आगे का रास्ता
नवधनाढ्यों की सम्पत्ति को गिन गिन कर और सूट बूट वाले मध्यमवर्ग के द्वारा लोन पर जीवन जीने के क्रेज को देखकर हम भी कई ट्रिलियन का इकॉनमी बनने का ख्वाब पाल रहे थे। उस समय भी कतिपय समाज विज्ञानी, अर्थशास्त्री , और अन्य विद्वान और यँहा तक कि ठीक ठाक समझदार लोग इस बात से आगाह कर रहे थे कि बिना मौलिक संरचनाओं की मजबूती के, बिना ह्यूमन इंडेक्स को ठीक करने वाले कदम उठाए, बिना असमानता को डील किये, बिना अधिसंख्य आबादी का स्तर उठाये इस तरह के दावे करना सिरे से बेवकूफी करना होगा। लेकिन समय रहते इन सुझावों का मजाक उड़ाना कितना महँगा पड़ रहा है, इसे अलग से रेखांकित करने और इसकी व्याख्या करना जरूरी नहीं है। इसके साथ ही ये भी जरूरी था और आज भी है कि हम आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए शिक्षा, विज्ञान, शोध, मैन्युफैक्चरिंग, और कृषि पर पर्याप्त जोर देने की जरूरत को समझें। वर्तमान में हम बाजार, उपभोक्ता और क्लाइंट सर्वर बनकर खुश हैं। हमारी IT इंडस्ट्री जिसके बारे में ढेरों गलतफहमियां समाज के मध्यम वर्ग में है, मूल रूप से सॉफ्टवेयर जानकार क्लर्क पैदा कर रही है। हमने पूरी इंजिनीरिंग शिक्षा का मैकॉलेकरण करके रखा है और दम भर रहें हैं ऐसा की अमेरिका और चीन भी शरमा जाए। जमीन पर लौटिए, मौलिक चीजों में सुधार लाइये, विज्ञान परक बनिये , समझिए बिना स्वास्थ्य, शिक्षा और विज्ञान के कुछ सुधार नही हो सकता। हो सकता है कि हमारी जानकारी बड़े लोगों से कम हो लेकिन इतना जरूर जानिए कि यदि इन बातों पर ध्यान नहीं दीजिएगा तो राजनीति तो कर लीजिएगा, लेकिन आने वाले समय में बहुत पीछे रह जायेगा देश हमारा।