श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक--
श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?
इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे विषाद हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत्य, अहिंसा, दया का पाठ पढ़ाया, उसे माया, मोह, क्रोध, घृणा आदि से दूर किया। स्वाभाविक परिणाम ये हुआ कि अर्जुन को कर्तव्यबोध हुआ, उसे पता चला कि धर्म और अधर्म क्या है और कैसे धर्म के मार्ग को चुना जाएगा। यही गीता है। गीता कुछ और नहीं आपके हमारे व्यवहार में भरम से उपन्न अंधकार को, निराशा और विषाद को दूर करने का क्रियात्मक प्रशिक्षण है। गीता की शिक्षा हमें बताती है कि हम क्यों क्रोध, मोह , माया, अनीति करते हैं और किस प्रकार हमें इनसे पार पाना होता है। हम सभी के पारिवारिक, सामाजिक और व्यवसायिक जीवन में ऐसा धर्मसंकट उतपन्न होता ही है और उससे पार पाने का मार्ग गीता है।
गीता का धर्म कर्मकाण्डी नहीं है। ऐसे कितने महापुरुष होंगे जो ये कहने की हिम्मत करेंगे कि देवताओं की पूजा आसुरी वृत्ति है? कृष्ण ने डंके की चोट पर ये कहा है और ये भी बताया है कि ऐसा क्यों है। जैसे किसी क्रिया के पीछे व्यक्तिगत लाभ का लोभ आता है वो आसुरी हो उठी है। कृष्ण ने इसी के खिलाफ हमें चेताया है। कृष्ण की गीता में परमेश्वर का कोई नाम नहीं कोई रूप नहीं, उसे पाने का कोई कर्मकाण्डी विधान नहीं है। बल्कि कृष्ण तो ये समझाते हैं कि कर्म कैसे करोगे तो वो धर्म हो जाएगा। आधुनिक भाषा में कहें तो गीता हमारे दैनिक व्यवहार का Do's and Dont's है।
गीता की पराकाष्ठा मोक्ष में निहित है लेकिन इस मोक्ष के लिए तीर्थ नहीं करने पड़ते, कर्मकांड नहीं करने पड़ते, धर्मयुद्ध के नाम पर अन्य धर्मावलम्बियों की हत्या नहीं करनी होती, बल्कि हमें अपने आचार-विचार और व्यवहार में परिवर्तन लाना होता है जिसमें सबसे प्रमुख हैं अभयता,अन्तःकरण की शुद्धता, ध्यान में लग्न सर्वस्व का समर्पण इन्द्रियों पर नियंत्रण अहिंसा सत्य क्रोध का न होना कर्मफल का त्याग चित्त की चंचलता का अभाव सभी के प्रति दयाभाव अनासक्ति कोमलता लक्ष्य के प्रति समर्पण व्यर्थ की चेष्टा का अभाव क्षमा तेज शत्रुभाव का अभाव लालच का अभाव पूजे जाने की भावना का अभाव मान अपमान के भाव का अभाव जैसे सदगुणों को अपनाया जाए और पाखण्ड घमण्ड अभिमान क्रोध कठोर वाणी अज्ञानता दम्भ मान अपमान की चिंता मद कर्मफल में आसक्ति इन्द्रियों में आसक्ति निंदा अहंकार कामना लोभ मोह जैसे अवगुणों को त्यागा जाए। इन्ही सदगुणों में पारंगत होना मोक्ष है जिससे मनुष्य ईश्वरत्व को प्राप्त करता है, इंसान और भगवान एक हो जाते हैं। यही मोक्ष है जो कर्मपथ पर चलकर ही होता है।
कृष्ण ने मानव मात्र के बीच कोई भी विभाजन को मानने से इनकार कर दिया । सभी को समान माना और माना कि इंसान अपने गुणों के अनुसार अच्छा या बुरा होता है। जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार के भेद का स्थान गीता में नहीं है। श्रीकृष्ण ने विभिन्न जातियों में जन्म के आधार पर कोई भेद नहीं किया और न ही किसी को ऊँचा और किसी को नीचा माना। इसी प्रकार पूजा पद्धतियों और ईश्वर की प्राप्ति की विधि के आधार पर अर्थात विभिन्न धर्मावलम्बियों के आधार पर किसी में भेद किया। इन आधारों पर न तो कोई श्रेष्ठ है न ही नीच। सभी समान हैं। ईश्वर का सब में समान निवास है और सभी को ईश्वर की प्राप्ति का समान अधिकार भी है। गीता के अनुसाफ इंसान सिर्फ दो प्रकार के होते हैं, एक जिनमें सदगुणों की बहुलता होती है दुसरे वे जिनमें दुर्गुणों की।
इसी प्रकार दूसरे की बुराई से लड़ने के लिए कृष्ण की शिक्षा के अनुसार खुद को बुरा नहीं बनाना है। यदि कोई आपसे बुराई करता है तो आपको भी उसी की तरह उसके साथ बुराई करने की शिक्षा गीता कँही भी नहीं देती बल्कि उसके बदले आपको खुद को और अच्छा बनाना है। गीता के एक भी श्लोक में बदले जैसी किसी भावना का कोई स्थान नहीं है। बुराई से लड़ने के लिए खुद को बुरा नहीं बल्कि और बेहतर बनाइये यही गीता की शिक्षा है। बदला, घृणा, भेदभाव, हिंसा जैसी भावनाओं को अपनाने नहीं त्यागने की शिक्षा देती है गीता।
आज के समय में बढ़ते संघर्ष को समझने और उनसे निपटने की अद्भुत शिक्षा का स्रोत है श्रीकृष्ण की अमरवाणी गीता। दूसरे के बुराई का प्रतिकार अपनी अच्छाई ही हो सकती है।
गीता को समझने के लिए पूर्व से मन में बैठी कुरीतियों को भगाना जरूरी है अन्यथा गीता आपके लिए अजनबी ही रह जायेगी।
सभी 18 अध्यायों के अध्ययन के पश्चात और उसे समझने के पश्चात हम वंही पहुँचते हैं जँहा हमने गीता को समझना शुरू किया था। एक चक्र पूरा होता है।
गीता एक क्रियात्मक प्रशिक्षण की शिक्षा है। धर्म विशेष अथवा सम्प्रदाय विशेष से इसका कोई लेना देना नहीं है। आप विश्व के किसी भाग में रहते हों, कोई धर्म मानते हों या नास्तिक हों उससे गीता की शिक्षा प्राप्त करने की आपकी योग्यता पर कोई असर नहीं पड़ता है। आपको , इस समाज को किस प्रकार जीना चाहिए इसे तो समझना सब के लिए आवश्यक है। ये जानना जरूरी है कि हम किस प्रकार जीवन जिये कि न्यूनतम विवाद अथवा विवाद रहित जीवन जी सकें ताकि समाज में हम सब सुख शांति समृद्धि से रह सकें। इस आवश्यकता से धर्म विशेष के किसी भी सिद्धान्त का विरोध सम्भव नहीं है। न ही किसी नास्तिक व्यक्ति का इससे विरोध हो सकता है। हाँ ये अवश्य है कि गीता में ईश्वर की प्राप्ति को लक्ष्य बताया गया है।
अब प्रश्न उठता है कि ईश्वर, धर्म, कर्म जैसे शब्दों का क्या अर्थ है। यदि हम गीता को बार बार पढ़ें, समझे तो पाते हैं कि इन सब शब्दों का जीवन में वही स्थान है नो सदगुणों का है। गीता की शिक्षा बताती है कि मनुष्य के जीवन का एकमात्र उद्देश्य ईश्वरत्व की प्राप्ति है। ये ईश्वर है क्या और इसे प्राप्त कैसे किया जाए। एक झलक में तो यह प्रश्न विकट दार्शनिक उलझनों सा प्रतीत होता है। इसी एक झलक पा कर हम सब चाहें जो धर्मावलम्बी हों या नास्तिक अपनी अपनी समझ के अनुसार कर्मकांड में प्रवृत्त हो जाते हैं। लेकिन यदि धैर्य से गीता की शिक्षा को समझें तो पाते हैं कि स्वयम के सत्य को प्राप्त करना ही ईश्वरत्व की प्राप्ति है और हमारा सत्य ही हमारा ईश्वर भी है। हमारा सत्य क्या है? हम जानते समझते हैं कि इंसान समाज में रहता है। उसमें सोचने समझने निर्णय लेने की शक्ति होती है। तो ये भी जरूरी है कि वो इन क्षमताओं को प्राप्त करना भी समझे। इसके लिए जरूरी है कि वो आपस में प्रेम, भाईचारा से रहे, एक दूसरे का सम्मान करें, एक दूसरे का उत्थान करे, ऐसा कुछ न करे कि आपस में विवाद हो, संघर्ष हो। अगर वो ऐसा कर पाता है तो मनुष्य रूप में उसके जन्म लेने का उद्देश्य प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति को हर समाज में सम्मान की नजर से देखा जाता है। जब वो ऐसा कर पाता है तो वो खुद को संशय से दूर कर पाता है।
तो फिर वो ऐसा कैसे कर पाता है? इसी प्रश्न का उत्तर है गीता जिसमें हमें सिखाया जाता है कि हम सब को अपने सदगुणों को बढ़ाना चाहिए और उन्ही सदगुणों के अनुसार अपने कर्मों को करना चाहिए, हमेशा अपने गुण और अवगुण की समीक्षा करती रहनी चाहिए, उनके अनुसार अपने कर्म को परिमार्जित करना चाहिए। इसके लिए चाहिए कि हम उन चीजों का जो हमें अपने सदगुणों के विकास होने देने से रोकते हैं उनको नजरअंदाज करना चाहिए। पहले तो ये काम जागरूक होकर प्रयास कर करना होता है, फिर धीरे धीरे हमारी यही कोशिश हमारे स्वभाव का अंग बन जाती है और हम स्वभावतः करने लगते हैं। समय के साथ साथ हमारा स्वभाव हमें उन सब चीजों से हटा देता है जिनके करने से अत्याचार, अनाचार, हिंसा, झूठ, फैलता है। तब प्रश्न उठता है कि हम कोई काम करें तो कैसे करे?आप अपने कामनाओं के अधीन रहकर सुखी हो ही नहीं सकते। एक कामना की पूर्ति कई और कामनाओं को जन्म देती है, फिर आप उनके आधीन होते हैं और ये सिलसिला चलते जाता है। किंतु कामनाओं का नहीं होना अकर्मण्यता नहीं होती जैसा कि आम तौर पर कह दिया जाता है , समझ लिया जाता है। कामनाओं के अभाव में ही आप जान पाते हैं कि व्यक्ति और समाज के प्रति आपके क्या उत्तरदायित्व हैं और तब आप उस उत्तरदायित्वबोध के अधीन कर्म में प्रवृत्त हो पाते हैं। ऐसे कर्म के फल से आपकी कोई लिप्सा नहीं रह जाती क्योंकि आप कर्म इसलिए नहीं कर रहें होते हैं कि आपको उसका फल चाहिए, बल्कि इसलिये कर रहे होते हैं कि आप उसे अपना उत्तरदायित्व या धर्म समझते हैं।
यही निष्काम कर्म का मार्ग है। बिना किसी कारण के जब हम लोगों के साथ अच्छे से पेश आते हैं तो निश्चित रूप से हमें स्वयं के प्रति संतोष की अनुभूति होती है। व्यक्तिगत जीवन हो, सामाजिक जीवन हो या हमारा कार्यक्षेत्र हो, हर जगह हमें लोगो से, परिचितों और अजनबियों से मिलना ही होता है। कई बार फायदे और नुकसान की बातें रहती हैं। कई बार सामान्य संव्यवहार भी हो सकता है। लेकिन हर बार यदि हम दूसरों से मिलते वक़्त यानी उनसे संव्यवहार की प्रक्रिया में जुड़ते वक़्त उनके प्रति उनकी अच्छाई की भावना लिए हों तब हमें खुद के अंदर अपनी सम्पूर्णता, अपनी प्रसन्नता का बोध होता है। ये अनुभूति हमें प्रेरित करती है कि हम जो भी करें उसे पूरे परफेक्शन के साथ करें ताकि हम उस व्यक्ति को अधिकतम खुशी दे सके। इस भावना से जब हम अपने दायित्व को पूरा करते हैं तब एक ""कॉमन गुड"" समाज में फलीभूत होता है। समाज की अच्छाई में हमारा भी एक छोटा सा प्रयास रहता है।
व्यक्ति, समाज, संस्था सब के विकास, सबकी भलाई के लिए हमें ऐसी सोच अपनाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। आपका कोई शत्रु नहीं है। ये मान कर, समझ कर चलें।
लेकिन एक चेतावनी भी जरूरी है। आपके द्वारा अन्य प्रति अच्छाई के दायरे में अन्य के अनाचार को समर्थन नही आता। लेकिन ये विरोध भी उसके अच्छाई के लिए अच्छाई की भावना से ही होना चाहिए। अन्यथा होता ये है कि जब हम दूसरे को अ
हानि पहुँचाने की भावना से जब क्रियाशील होते हैं तो ये तो गारण्टी के साथ नहीं कहा जा सकता कि उसे हानि होगी ही, परन्तु इस प्रक्रिया में आप अपने अंदर इतनी नकारात्मकता भर लेते हैं कि आपकी हानि होगी ही,इसकी गारण्टी हो जाती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि गीता की शिक्षा हमें प्रेरित करती है कि हम उस कर्म को करें जिससे हमारे अंदर अच्छाई बढ़े, नकरात्मकता को हम दूर करते हैं। ऐसा करते करते हम इंसान के रूप में अपने दायित्व को पूरा करते हैं। तो फिर ईश्वर हमारे ही साथ आ जाते हैं। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि इंसान के रूप में हमारा दायित्व पूरा होता है।
यही गीता का मूल भी है।
हर विषय की अपनी शब्दावली होती है, गीता की भी है। उन्ही शब्दावलियों के माध्यम से गीता में भी शिक्षा दी गई है। इन शब्दावलियों में ईश्वर, धर्म, कर्म, यज्ञ, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सन्यास, त्याग, दैवी और आसुरी सम्पद, क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ , वर्ण इत्यादि हैं जिनका अर्थ गीता में वो नहीं है जो आम बोल चाल की भाषा में होता है। इन शब्दों को गीता के परिपेक्ष्य में गीता की रचना के काल खंड के अनुसार ही समझा जाना चाहिए।
गीता एक क्रियात्मक प्रशिक्षण है।