गीता-अध्याय-1, श्लोक- 2
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धृतराष्ट्र के पूछने पर संजय युद्ध का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। युद्ध के वर्णन में संजय को जो बात सबसे पहले दिखती है वो है दुर्योधन की बेचैनी। सभी को पता है कि महाभारत का युद्ध दुर्योधन की जिद्द और धृतराष्ट्र की विवशता का परिणाम है। दोनों ही अपने परिजनों के जायज अधिकारों का हनन करने पर तुले हैं। तब अधिकारों से वंचित हुए परिजन भी प्रतिकार करने को विवश होते हैं, तो परिणाम में महाभारत का युद्ध होता है।
संजय को युद्ध के मैदान में दुर्योधन ही सबसे पहले क्यों दिखता है, ये सवाल तो हम में से किसी के मन में उठना स्वाभाविक है। दरअसल जीवन में जब भी अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष होता है तो शुरुआत में बुराई खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश करती है, वो तरह तरह से लोगों का और लोगों की प्रकृति का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास करती है ताकि लोगों की नजर में उसे एक स्वीकार्यता और वैधानिकता मिल सके। सो वो ध्यान खींचने के लिए भोंडा प्रदर्शन करती है। बुराई खुद को स्थापित करने के लिए तरह तरह का प्रदर्शन करती है। आप अपने अगले बगल देखिए। जो जितना गलत होगा वो खुद को सही साबित करने के लिए उतने ही जोर जोर से चीख चीख कर लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश करेगा । दुर्योधन यही कर रहा है।
हर गलत प्रवृत्ति को बेचैनी होती है और उसे अच्छी प्रवृत्तियों से हारने का डर भी होता है सो वो बेचैनी में इधर उधर भटकती है और प्रयास करती है कि उसे सामाजिक स्वीकार्यता मिले। कोई ऐसा मिले जिसके पास उसे अपनी बुराइयों को व्यक्त करने में कठिनाई न हो, संकोच न हो। ये बेचैनी उसके इस अहसास का परिणाम होती है कि वो हार जाएगी अच्छाई से। डरा हुआ मन, डरा हुआ इंसान घबराहट में उसके पास दौड़ता है जँहा जाकर उसे सम्बल मिलने की उम्मीद होती है। बुराई को कभी भी खुद पर आत्मविश्वास नही होता, सो वो किसी भरोसे के इंसान के पास जाकर भरोसा पाना चाहती है। दुर्योधन भी यही कर रहा है। उसे खुद की ताकत पर भरोसा नहीं है, तभी तो वो अपनी सेना की तरफ न देखकर पांडवों की सेना और उनकी व्यूह रचना की तरफ देखता है। बुराई चाहे जितनी भी बड़ी हो वो तो हमेशा अच्छाई से डरी होती है, उसे हमेशा अच्छाई से हार जाने का डर सताता है। जब कोई अपनी बुराई के बल पर आगे बढ़ना चाहता है तो उसे सबसे अधिक डर अच्छाई से लगता है, वो अपना ध्यान अच्छाई को हराने में लगाये उसी पर देखता है भय से सशंकित होकर। जबकि अच्छी प्रवृत्तियाँ हमेशा एक खास तरह से सुसज्जित होकर रहती हैं, उनमें बेचैनी, भय , निराशा, घबराहट नहीं होते । इसलिए अच्छी प्रवृत्तियाँ घोर बुराई के समक्ष भी एक अनुशासित दल की तरह मजबूती से खड़ी रहती हैं। सद्गुणों को दुर्गुणों से भय नहीं होता और उनकी संरचना ऐसी होती है कि ऐसे सद्गुण एक विशेष श्रृंखला में सजे होते हैं। हर एक सद्गुण सभी दुर्गुणों पर भारी होता है। इसीलिए सद्गुण या अच्छी प्रवृत्तियाँ एक खास व्यूहरचना में दिखती हैं।
संजय ने दुर्योधन के नाम के आगे राजा शब्द लगाया है जो दुर्योधन के गुणों की स्थिति और उनकी शक्ति को इंगित करता है। दुर्योधन मोह है, धृतराष्ट्र उसी मोह में पड़कर अपने छोटे भाई के पुत्रों को मारने तक के लिए उद्दत है। मोह सारी बुराइयों का जड़ है। जब इंसान आँख पर मोह की पट्टी बाँध लेता है तो उसका सारा ज्ञान और विवेक , निष्पक्ष निर्णय लेने की उसकी क्षमता खत्म हो जाती है और वो धृतराष्ट्र हो जाता है। मोह अज्ञान और अविवेक को जन्म देता है और फिर अवगुण बढ़ते जाते हैं। इसीलिए मोह सभी अवगुणों , सभी दुर्गुणों का स्वामी है यानी उनका राजा है। हम में से कोई भी जिस किसी परिस्थिति में मोह में पड़ता है हम गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं। मोह से ग्रस्त व्यक्ति मोह वश झूठ बोलता है, लड़ता झगड़ता है, हिंसा तक कर डालता है और अन्याय करने से भी पीछे नहीं हटता। सम्पत्ति का मोह, वासना का मोह, प्रमाद का मोह, सत्ता का मोह आदि सभी मोह के मूल भाव के अलग अलग स्वरूप भर होते हैं। मोह में फंस कर हम गलत से गलत काम करने में पीछे नहीं रहते और मोह से अँधी हुई बुद्धि कुछ भी सही समझने के लिए तैयार नहीं होती। दुर्योधन इसी का प्रतीक भर है, सभी मोहग्रसित व्यक्तियों की स्थिति दुर्योधन सी हुई रहती है।
अब एक सवाल और उठता है। महाभारत के युद्ध में कौरवों के प्रथम सेनापति भीष्म थे तो दुर्योधन सबसे पहले द्रोण के पास क्यों जाता है। जब आपके मन में कोई सवाल होता है तो हम आप उसके निराकरण के योग्य इंसान को खोजते हैं। शंका समाधान जो करता है वही तो गुरु होता है। गलत करने वाला व्यक्ति चाहता है कि उसे कोई ऐसा मिले जो उसकी गलतियों को तार्किकता का जामा पहना सके। भले गलत व्यक्ति सीधे सीधे ये नहीं कहे कि उसके दुर्गुणों को तार्किक वैधानिकता दी जाए, वो अपने और विपक्षी की ताकत का तुलनात्मक विवरण पेश कर गुरु से या गुरु सरीखे किसी और से अपनी शंका का समाधान चाहते हुए उससे अपने अवगुणों की तार्किक वैधानिकता की उम्मीद तो अवश्य करता है। द्रोण की युद्ध भूमि में उपस्थिति समझाती है कि इक्षित फल प्राप्त करने के लिए दुर्गुणी को भी एक ऐसे व्यक्ति की तलाश तो रहती ही है जिससे वो अपने पक्ष में कौशल पूर्वक तार्किक वैधानिकता गढ़वा सके।
इस प्रकार हम देखते हैं कि गीता के प्रथम अध्याय के दूसरे श्लोक में ही गीताकार ने बड़ी सहजता से एक दुर्गुणी के चरित्र को मात्र दो पंक्तियों में उभार दिया है।