लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था ढंग से पटरी पर रहे इसके लिए लोकतंत्र में एक व्यक्ति के मतदाता और नागरिक होने के फर्क को समझना आवश्यक है। ध्यान रहे, चुनाव की प्रकिया को लोकतंत्र नहीं कहते, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए निर्वाचन एक प्रक्रिया मात्र है। अत्यंत संक्षेप में समझे तो बात ये है कि निर्वाचन प्रक्रिया के द्वारा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल/दलों के समूह को बहुमत से एक नियत अवधि के लिए सरकार चलाने के लिए अधिकृत करता है। उस नियत अवधि की समाप्ति के पश्चात सरकार चलाने की जो शक्ति मतदाता के द्वारा राजनीतिक दल को दी गई रहती है वो समाप्त हो जाती है, और मतदाता से पुनः प्राधिकृत होना अनिवार्य हो जाता है। निर्वाचित प्रतिनिधि की शक्ति चुनाव के अवधि तक ही सीमित होती है, किंतु लोकतंत्र जीवित और गतिशील बना रहता है, सरकार की अवधि के बाद भी । इसी फर्क को यदि समझ लिया जाय तो लोकतंत्र और चुनाव के फर्क को आसानी से समझा जा सकता है। सो लोकतंत्र के अधीन व्यवस्था को चलाने के लिए, ध्यान दें, लोकतंत्र के अधीन ही व्यवस्था को चलाने के लिए निर्वाचन के द्वारा सरकार ...