लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्था ढंग से पटरी पर रहे इसके लिए लोकतंत्र में एक व्यक्ति के मतदाता और नागरिक होने के फर्क को समझना आवश्यक है। ध्यान रहे, चुनाव की प्रकिया को लोकतंत्र नहीं कहते, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को चलाने के लिए निर्वाचन एक प्रक्रिया मात्र है।
अत्यंत संक्षेप में समझे तो बात ये है कि निर्वाचन प्रक्रिया के द्वारा मतदाता किसी एक राजनीतिक दल/दलों के समूह को बहुमत से एक नियत अवधि के लिए सरकार चलाने के लिए अधिकृत करता है। उस नियत अवधि की समाप्ति के पश्चात सरकार चलाने की जो शक्ति मतदाता के द्वारा राजनीतिक दल को दी गई रहती है वो समाप्त हो जाती है, और मतदाता से पुनः प्राधिकृत होना अनिवार्य हो जाता है। निर्वाचित प्रतिनिधि की शक्ति चुनाव के अवधि तक ही सीमित होती है, किंतु लोकतंत्र जीवित और गतिशील बना रहता है, सरकार की अवधि के बाद भी । इसी फर्क को यदि समझ लिया जाय तो लोकतंत्र और चुनाव के फर्क को आसानी से समझा जा सकता है।
सो लोकतंत्र के अधीन व्यवस्था को चलाने के लिए, ध्यान दें, लोकतंत्र के अधीन ही व्यवस्था को चलाने के लिए निर्वाचन के द्वारा सरकार का गठन किया जाता है। इससे निम्न बातें निकल कर आती हैं--
1.एक नागरिक चुनाव की प्रक्रिया में मतदाता होता है। वो नागरिक है सो मतदाता है, न कि मतदाता होने के कारण वो नागरिक होता है।
2.वो नागरिक तात्कालिक और स्थायी परिस्थिति के अनुसार लोकतंत्र के अधीन व्यवस्था को चलाने के लिए किसी राजनीतिक दल/समूह को एक नियत अवधि के लिए बहुमत से अधिकृत करता है। ऐसा वो मतदाता बनकर करता है। जो नागरिक मत नहीं देता वो मतदाता नहीं हो पाता, भले आंकड़ों में उसे मतदाता माना जाता हो। सरकार के गठन में उस नागरिक विशेष की जो मत नहीं देता है उसकी प्रत्यक्ष भूमिका या प्रत्यक्ष योगदान नहीं होता है।
3. चुनाव में मत देने के उपरांत वो सरकार की नीयत अवधि तक सिर्फ और सिर्फ नागरिक ही रहता है, जब तक उसे फिर से मत देकर सरकार न बनाना पड़े।
इससे स्पष्ट है कि एक नागरिक सरकार के पूरे कार्यकाल के दौरान नागरिक बना रहता है। ऐसे में उस नागरिक के लिए ये तथ्य बहुत मायने नहीं रखता की उसने मत किसे दिया था। मत दिया जाना कई दीर्घकालिक और तात्कालिक कारकों से प्रभावित होता है और उसका प्रभाव भी एक निश्चित अवधि तक ही होता है, किंतु नागरिक के रूप में उसकी इक्षाएँ, आवश्यकताएँ शाश्वत हैं और सरकारों का गठन भी उसी नागरिक की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही होता है। सो एक मतदाता को ये पूरा अधिकार हमेशा बना रहता है कि जिसे वो मत देता है अथवा नहीं भी देता है उससे वो पूछ सके कि एक नागरिक के रूप में उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उसका प्रतिनिधि क्या कर रहा है। इस प्रकार एक नागरिक को सरकार से सवाल करने का शाश्वत अधिकार होता है, और प्रतिनिधि/सरकार राजनीतिक, नैतिक और कानूनी तौर पर नागरिक के इस अधिकार का सम्मान करने के लिए बाध्य है। अगर नागरिक को लगता है कि उसके द्वारा चुनी सरकार उसकी आवश्यकता की पूर्ति करने में सक्षम नही है तो चुनाव की उसी प्रक्रिया से जिससे उसने चुना था, उसे हटाने के लिए भी स्वतंत्र होता है।
यदि आप सरकार और नागरिक के इस लोकतांत्रिक सम्बन्ध को समझ पाएंगे तो आप जिसे आप अपना वोट देते हैं, उसका पिछलग्गू नहीं बनेंगे, उसकी दासता नहीं स्वीकारेंगे, उसका वोटबैंक नहीं बनेंगे, उसकी भक्ति नहीं करेंगे। वोट किसी को दें लेकिन एक दिन वोट देने के बाद लगातार पाँच साल सवाल करते रहें। तब देखिए कोई सरकार कैसे जन्मोउन्मुखी क्यों नहीं होती है।