आज जब कोरोना वायरस का प्रकोप सारी दुनिया में फैला हुआ है और हम अपने देश में भी 21 दिनों के लॉकडाउन में हैं हमारे पास ये जानने समझने का समय है कि हमने अपनी शिक्षा व्यवस्था, विशेषकर विज्ञानपरक शिक्षा व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था में कितना कुछ लगाया है, उससे कितना कुछ पाया है। ये प्रश्न किसी अन्य से नहीं हमें खुद से करना चाहिए और गूगल कर तथ्यों को खोजना चाहिए। हमें चाहिए कि हम परखें कि आजादी के सात दशक बीत जाने के बाद हम कँहा पहुँचे, क्या वँहा पहुँचे जँहा पहुँचना चाहिए था। साथ ही ये भी परखें कि इन सात दशकों में हमारे साथ के देश कँहा पहुँचे। एक सवाल और है जिसका उत्तर खोजना जरूरी है। हमारे पास हमारे अपने महात्मा गाँधी थे। वे आज भी हैं। क्या ये जरूरी नहीं है कि ठोस अर्थव्यवस्था के लिए उनके ग्राम स्वराज की अवधारणा को वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के साथ समन्वित कर सोचा जाए।
तथ्यों को खुद खोजें, परखें, विश्लेषित करें, और आगे की कार्ययोजना पर अपना ध्यान दें। कोरोना वायरस से जनित वैश्विक महामारी को तो दुनिया के वैज्ञानिकों, सरकारों और जनता के सहयोग से तो आज नहीं तो कल खत्म होना ही है, लेकिन हमारी खूबसूरत दुनिया कोरोना के बाद भी रहेगी। हमें एक जागरूक नागरिक के रूप में इस अवसर का उपयोग भविष्य के विश्व की रूप रेखा तय करने के लिए होम वर्क करने में करना चाहिए ताकि कल की दुनिया में यदि कोई विपत्ति आती है तो हमारा शिक्षा सह वैज्ञानिक समाज तुरत हरकत में आ सके, हमारी अर्थव्यवस्था इतनी सेल्फ सस्टेनेबल रहे कि वैश्विक मंदी को नकार सके, हमारी स्वास्थ्य सेवाएँ ऐसी हों जिसमें सभी व्यक्तियों के स्वास्थ्य को सम्भालने की क्षमता हो। कोरोना ने हमें कष्ट दिया है तो एक अवसर भी दिया है कि हम पहले से खूबसूरत दुनिया बना कर दिखायें। इंसान कभी हारा नहीं है। फिर एकबार जीतने की सोच में ढले।