हम आप माने या न माने लेकिन हम सामूहिक रूप से एक ऐसी दुनिया बनाने में लगे हैं जो आने वाली पीढ़ियों के रहने योग्य नहीं रह जायेगी। आतंकवादी गतिविधियाँ, युद्ध, जलवायु परिवर्तन, महामारी, बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या, संसाधनों का आसमान वितरण और नियंत्रण, अशिक्षा,खराब जन स्वास्थ्य सेवाएँ, गरीबी आदि ऐसी आपदाएँ हैं जिन्हें प्रकृति ने नहीं बनाया है, वे प्राकृतिक आपदाएँ नहीं हैं और न हीं यदा कदा घटने वाली घटनाएँ हैं, बल्कि वे पूरी तरह से मानव जनित आपदाएँ हैं जो पूरी दुनिया में सतत बनी हुई हैं। इन आपदाओं ने दुनिया को एक नहीं रहने लायक जगह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी हैं। इन समस्याओं को बढाने में भी समूचे विश्व की साझेदारी है। हम सामूहिक प्रयास के जरिये आने वाली पीढ़ियों के लिए दुनिया को विनष्ट करने में लगे हैं। और ये सब तब है जब मानव सभ्यता अपने अब तक के इतिहास में ज्ञान विज्ञान के उस सबसे ऊँचे शिखर पर है जँहा से इस दुनिया को सबसे खूबसूरत जगह बनाया जा सकता था। परन्तु जब ज्ञान विज्ञान का चरित्र वैश्विक न हो होकर स्थानीय हितों को तरजीह देने लगी है तब किसी अच्छाई की उम्मीद करना बेकार ही लगता गया। वैश्वीकरण ने जो अवसर उपलब्ध कराए थे हम उन अवसरों को जल्द से जल्द गंवाने की हड़बड़ी में जो हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं। ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....