अभी तक हमने श्रीमद्भागवत गीता के पन्द्रह अध्यायों का श्रवण किया जिससे स्पष्ट हो जाता है कि श्रीकृष्ण की शिक्षा निष्काम कर्म के इर्द गिर्द ही घूमती है। अब प्रश्न उठता है कि इसका अभ्यास करें तो कैसे करें। यदि गीता के दर्शन को समझने में किसी को भी कोई कठिनाई होती है, कोई भरम होता है, यदि उसे लगता है कि गीता दर्शन एक कठिन विषय है उन सभी से अनुरोध है कि यदि वे गीता के सारे पाठों को भूल भी जाएँ, न भी समझे तो कोई बात नहीं। वे मात्र 16वेन अध्याय को समझ लें, जो समझने में सबसे सरल पथ है भी तो गीतोक्त ज्ञान से परिपूर्ण हो जाएंगे।
निष्काम कर्म का मार्ग दैवी गुणों यानी सद्गुणों से होकर जाता है और गीतोक्त मोक्ष की पराकाष्ठा जो जीते जी ईश्वरत्व की प्राप्ति है में भी इन्हीं गुणों की परिपूर्णता ही होती है। मोक्ष क्या है? 16वे अध्ययाय के सदगुणों की परिपूर्णता ही मोक्ष है, वही ईश्वरत्व की प्राप्ति है। आपके अंदर अच्छे और बुरे गुण दोनो हैं । यदि आप अच्छे गुणों को बढ़ाते हैं तो आप ईश्वरत्व की तरफ बढ़ते हैं और इसके विपरीत बुरे गन आपको अधम बनाते हैं।
तो आइए देखें कि गीता के 16वें अध्याय के अनुसार ये करने लायक अच्छे गुण यानी दैवी गुण क्या हैं और न करने लायक बुरे गुण यानी आसुरी गुण क्या हैं।
दैवी गुण
आसुरी गुण