गीता-अध्याय 1 श्लोक-8
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अपनी सेना की प्रशंसा करते हुए दुर्योधन कौरव पक्ष के महत्वपूर्ण योद्धाओं के नाम द्रोणाचार्य को बताता है। क्यों बताता है? क्योंकि मोह का प्रतिरूप दुर्योधन सत्य के प्रतिनिधियों से भयभीत है। सो वो अपने पक्ष के वीरों का नाम गिना कर खुद को भरोसा दिलाता है कि उसके बुराई का पक्ष पांडवों के भलाई और धर्म के पक्ष से अधिक ताकतवर है। हर बुरा आदमी यही करता है। और दुर्योधन भी घबराहट में यही कर रहा है।
दुर्योधन भीष्म से पहले द्रोण का नाम लेता है। जब एक अधर्मी, बुरा इंसान किसी ऐसे इंसान जिसे अच्छे बुरे का ज्ञान हो उसके सामने शेखी बघारता हो और वो आदमी बिना अभिरुचि लिए चुप हो तो वो वाचाल आदमी सकपका जाता है। और ऐसी स्थिति में चापलूसी पर उतर आता है। इसी वजह से दुर्योधन भी द्रोण को खुश करने की नीयत से पहले उनका नाम लेता है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि महाभारत की लड़ाई आंतरिक युद्ध पहले है, फिर बाहरी। आपकी अच्छी(दैवी) और बुरी (आसुरी) प्रवृत्तियों के बीच निरन्तर संघर्ष होता है और ये तब तक होता है जब तक बुराई हार नहीं जाती। इस युद्ध में बुराई/अधर्म/आसुरी शक्तियाँ अन्य आसुरी शक्तियों को याद करती हैं, उनको अपने लिए लामबंद करती हैं। द्रोण द्वैत के, भीष्म भ्रम के, कर्ण विजातीय कर्म के, कृपाचार्य कृपा के, अश्वथामा आसक्ति के, विकर्ण विकल्प के , भूरिश्रवा भ्रममयी श्वास के प्रतीक हैं। आंतरिक युद्ध में जब आपको लगता है कि आप ईश्वर से अलग हैं तो आप गुरु के शरण में जाते हैं। लेकिन जब तक भ्रम जीवित रहता है ब्रह्म की प्राप्ति असम्भव होती है। इसको ऐसे समझा जा सकता है कि भ्रम वो मूल है जिससे आसुरी गुण अर्थात दुर्गुण पोषित होते हैं, मोह, आसक्ति , विजातीय कर्म लगे रहते हैं और गलत पर गलत करते जाते हैं। लेकिन मोहवश इंसान को कुछ सूझता नहीं। वो गलती पर गलती किये जाता है। भीष्म के भ्रम में दुर्योधन मोह से आसक्ति से बंध कर विकल्प की उपथिति में भी गलत काम करने के लिए ही प्रवृत्त होता है। एक बात और ध्यान देने की है कि जब आप ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में चलते हैं अर्थात अपने दैवी गुणों/सद्गुणों को विकसित करते हैं तो मार्ग में आपको अपनी शक्ति बढ़ने के अहसास भी होते हैं। और आप लगते हैं सोंचने की आप तो किसी का उद्धार कर सकते हैं, आपकी कृपा से चमत्कार हो सकते हैं। आपकी ये लालच रास्ते में ही आपका पतन करा देती है।
इस श्लोक में गीताकार ने दुर्योधन के माध्यम से हम सब को आगाह किया है कि दुर्गुणों/अधर्म/आसुरी सम्पद के बढ़ने से हमारा मनोविज्ञान कैसे विकृत हो जाता है जो हमारे अहंकार से भरे भय के माध्यम से दिखाई देता है। अधर्मी शारीरिक बल और संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद नैतिक बल की कमी के कारण अच्छाई से डरा हुआ होता है और डर आत्मरक्षा में भ्रम, आसक्ति,इत्यादि का आह्वान कर अपनी रक्षा करना चाहता है।