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SHRIMADBHAGWAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 12

गीता आध्याय 2 श्लोक 12
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 त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
 न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥

न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
 ॥12॥

अर्जुन के विषाद को अकारण होने का कारण बताते हुए श्रीकृष्ण पहली बार आत्मा की अमरता और अजरता की तरफ अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान खींचते हैं जिसे आगे और स्पष्ट भी करते हैं। विषाद या दुख किसके लिए हो सकता है?  दुख या विषाद हमें तब होता है जब हमें लगता कि कोई चीज हमसे छूट रहा है या छूट गया है या छूट जाएगा। विलगाव का भय हमें दुखी करता है। अर्जुन को भी इसी से दुख है। लेकिन श्रीकृष्ण का कथन है कि हम जिसे विलगाव होना समझ रहें हैं वो दरअसल विलगाव है ही नहीं। निरन्तरता ही सत्य है भले स्वरूप भिन्न हो। हम स्वरूप को ही प्राथमिक समझते हैं , हमें लगता है कि जिसका आकार है, जिसमें स्पंदन है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता है वही मात्र जीवन की पहचान है।
 हमारा ज्ञान इतना भर ही है कि शरीर की समाप्ति के साथ जीव का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह सोच यह समझ पूरी तरह से सिरे से गलत है। स्वरूप या शरीर का खत्म होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन जब हम गहराई से सोचते हैं तो पाते हैं कि शरीर हमारी पहचान नहीं है। कुरूप से कुरूप व्यक्ति भी अपनी अभिव्यक्ति से अपने रूप से भिन्न हो सकता है। वस्तुतः अपने या अन्य के होने का भान यानी ईगो यानी अहम स्थूल शरीर, भावना और बुद्धि से मिलकर बनता है जबकि अभिव्यक्ति तो आत्मस्वरूप यानी सेल्फ से होता है जो आकारविहीन है। हम आप जानते हैं कि हर चीज मैटर से बना होता है, और मैटर अंततः परमाणु से बना होता है। मैटर और ऊर्जा आपस में परिवर्तनीय होते हैं। ऊर्जा का न तो निर्माण होता है न ही विनाश, बस उसका स्वरूप  परिवर्तन ही हो सकता है। हमें भ्रम होता है कि हमने विधुत पैदा कर  लिया, ऊष्मा पैदा कर दिया, प्रकाश ला दिया आदि आदि। ये सब हमारा भ्रम मात्र है। हम ऊर्जा को नहीं बनाते अपितु उसका स्वरूप बदलते हैं। इसी प्रकार हम मैटर का नाश नहीं कर पाते। मैटर समाप्त नहीं होता वह तो ऊर्जा का रूप ले लेता है। इसी प्रकार जीव का नाश नहीं होता , उसका स्वरूप बदलता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण कहते हैं कि समय के हर काल में कृष्ण भी रहें हैं, अर्जुन भी रहा है और अन्य सभी भी रहे हैं और ये सब हमेशा रहेंगे, स्वरूप चाहे जो हो।
        जीवन के प्रत्येक प्रसंग में अनश्वरता का बहुत महत्व है।कोई भी चीज नश्वर नहीं बल्कि मात्र परिवर्तनशील है। सो प्रत्येक समय हमें ये जानना समझना जरूरी है कि यदि कोई ऊर्जा हमें नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर रही है तो उसमें ऊर्जा की नहीं हमारे ईगो की भूमिका है। उससे सकारात्मकता म कैसे प्राप्त की जाए ये सेल्फ यानी आत्मबोध की समझ पर निर्भर करता है। ऊर्जा का स्वरूप परिवर्तनशील है।जब हम ये समझते हैं तो  कोई विषाद नही  हो सकता, कोई भ्रम नही हो सकता। 
   अनश्वरता की ये समझ हमें दार्शनिक स्तर के साथ साथ व्यवहारिक स्तर पर भी मदद पहुँचाती है। हर प्रसंग में निर्णय और निर्णय के अनुसार क्रिया के दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष हमें सत्य, न्याय, धर्म की तरफ ले जाता है और दूसरा ठीक इसके विपरीत असत्य, अन्याय और अधर्म की तरफ। युद्ध का मैदान तो एक ही है, साध्य यानी राज्य जिसे हासिल करना है वो हस्तिनापुर भी एक ही है लेकिन साधन भिन्न। अर्जुन अभी भी युद्ध की धार्मिकता, सत्यता और न्याय के पक्ष को समझने की कोशिश कर रहा है।  योद्धा होने के नाते वह चाहता तो सीधे युद्ध की बात करता, साध्य को देखता, लेकिन वह युद्ध के पहले युद्ध के साधन को समझना है। युद्ध कला में दोनों पक्ष समान रूप से सामर्थ्यवान हैं लेकिन अर्जुन तमाम सामर्थ्य के बावजूद साधन की शुचिता को निर्धारित कर लेना चाहता है। इसके विपरीत कौरव पक्ष युद्ध  के स्वरूप को ध्यान में नहीं रखता है, उसके लिए साधन की शुचिता मायने नहीं रखती।
   हमें अपने अपने जीवन प्रसंगों में ऊर्जा की निरंतरता और अनश्वरता को समझना चाहिए। अति सामान्य शब्दों में समझें तो बात इतनी भर है कि सत्य हमेशा रहा है। यदि समय के किसी भी पहर में हम सनातन सत्य को वरण करते हैं तो असत को पराजित कर सकते हैं चाहे हमारे सामने असत का जो भी रूप हो, युद्ध हो , या कुछ और। 
     ध्यान देने की बात यह भी है कि ऊर्जा के इस सनातन प्रवाह को हमें अपने अंदर अनुभव करना होता है।  बाहर नहीं। ये हमारे आत्मबोध के स्तर पर हो सकता है हमारे ईगो यानी स्थूल स्वरूप के स्तर पर नहीं। स्थूल का कार्य इतना भर है कि वो शरीर का आधार देता है जो परिवर्तनशील है लेकिन आत्मबोध सनातन है और इसी आत्मबोध की खोज हमारा युद्ध है। आगे श्रीकृष्ण इसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ की परिभाषा से समझायेंगे।


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It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.