Skip to main content

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- श्रीमद्भागवद्गीता में अर्जुन के बहाने स्वयम के संशय को देखने का अभ्यास

श्रीमद्भागवद्गीता में अर्जुन के संशय के बहाने स्वयम के संशय को देखने का अभ्यास
---------------------------------------------------------
व्याख्या----राहुल रम्य
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

शंखनाद के पश्चात वास्तविक युद्ध के पूर्व अर्जुन युद्ध हेतु अपना आकलन करने हेतु दोनों पक्षों की सेनाओं का स्वयम निरीक्षण कर लेना चाहता है। दरअसल कोई भी समझदार व्यक्ति जब किसी समस्या का हल करना चाहेगा, अथवा जब भी किसी परिस्थिति से मुकाबला करना चाहेगा तो सबसे पहले क्या करेगा? सबसे पहले वह समस्या के हर पहलू को परखेगा, हर पहलू के ताकत और कमजोरी का आकलन कर लेना चाहेगा। उसी के बाद अपनी रणनीति तय करेगा। बिना समस्या को समझे सीधे जाकर सिर भिड़ा देना निरी मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता। बड़ी से बड़ी समस्या, बड़े से बड़े ताकतवर का कोई कमजोर पक्ष भी होता है, जिससे निपट कर इंसान उस बड़ी से बड़ी समस्या या बड़े से बड़े ताकतवर आदमी को हरा सकता है, हरा भी देता है। अर्जुन युद्ध के लिए तटपर है, लेकिन वो इस पक्ष का जिससे उसे लड़ना है उसकी समग्र ताकत को तौल लेना चाहता है ताकि उसे युद्ध करने में सुविधा हो। अपने विरोधी के संगी साथियों की भी पहचान कर लेना जरूरी होता है ताकि ये पता रहे कि आपके वैरी कौन और किस तरह के लोग हैं। इसी प्रकार जब आप कोई बड़ी समस्या सुलझाने चलते हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि किस किस तरह की अन्य समस्याएँ आपके रास्ते आ सकती हैं। सो अर्जुन विरोधी के हर पक्ष को जान समझ लेने के लिए उत्सुक है। सच तो ये है कि यदि आप सही में प्रयास करना चाहते हैं तो आपकी रणनीति में ये बातें शामिल होनी ही चाहिए। और ये बात जीवन के हर पहलू पर लागू होती हैं।

           और ये भी सच है कि जब आपकी ही बुराई, आपके ही दुर्गुण, आपको घेरने लगे तो सावधानी पूर्वक आपको पहचान करनी होती है कि वो कौन से दुर्गुण हैं जो आपको घेर रहें हैं। तभी आप उनसे छुटकारा पाने का , उनसे पार पाने का रास्ता भी निकालेंगे। दवा करने के पहले मरीज के हर मर्ज की जाँच करना जरूरी है। ध्यान रखना चाहिए कि दुर्गुण हमेशा झुण्ड में आपको घेरते हैं , वो अकेले अकेले कभी नहीं आते।

       अब देखिए , यँहा अर्जुन के लिए कपिध्वज शब्द का इस्तेमाल किया गया है। युद्ध की कथा के अनुसार हनुमान जी अर्जुन के रथ पर रहते हैं। हनुमान सम्पूर्ण कथा संसार में सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली किरदार माने गए हैं। साथ ही सबसे शीलवान भी। मतलब साफ है कि जब आप बड़ी समस्याओं से निपटने चलते हैं तो आपका शरीर स्वास्थ्य रहे, आपकी बुद्धि उत्कृष्ट स्तर की हो और चरित्र साफ सुथरा हो। इन तीन महत्वपूर्ण कारकों के अभाव में  आपके प्रयास विफल हो जाएंगे। ये तीनों आपको अपराजेय शक्ति देते हैं।  

     इसीप्रकार हम देखते हैं कि कृष्ण के लिए अच्युत सम्बोधन का प्रयोग  हुआ है और ये प्रयोग अर्जुन के द्वारा किया गया है। रथी अपने सारथी को अच्युत कह रहा है अर्थात जिसका पतन नहीं हो सकता हो। श्रीकृष्ण अर्जुन के फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड की भूमिका में हैं और अर्जुन को उनपर इतना भरोसा है कि वो मानता है कि श्रीकृष्ण का पतन नहीं हो सकता अर्थात श्रीकृष्ण उसे कभी गलत सलाह नही। दे सकते। जीवन में। हम सभी को ऐसे ही मित्र होने चाहिए जो हर परिस्थिति में हमें सही सलाह दे सकें और जिनपर हमें भरोसा भी हो और जिनके प्रति हमारे मन में सम्मान भी हो।  कठिन  समय में इस तरह के मित्र की जरूरत ज्यादा होती है। बुरे व्यक्ति के मित्र भी बुरे ही होते हैं जबकि अच्छे व्यक्ति के मित्र अच्छे होते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन के कहे अनुसार रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले आकर खड़ा करते हैं। अर्जुन को गीताकार ने गुडाकेश नाम से सम्बोधित किया है। गुडाकेश का अर्थ है जिसने निंद्रा पर विजय प्राप्त कर लिया हो। यह वर्णन युद्ध क्षेत्र का है सो युद्ध के अनुरूप अर्जुन के जो गुण हैं उनका वर्णन गीताकार के द्वारा यथा स्थान किया गया है। निंद्रा को कठोर परिश्रम से ही जीता जा सकता है। निंद्रा अंधकार का प्रतीक है, मन मस्तिष्क के सुप्तास्था का परिचायक है । निंद्रा के समय हमें बोध नहीं होता, हम सचेत नहीं होते। लेकिन युद्ध क्षेत्र में निरन्तर सजग और सावधान रहने की जरूरत होती है। यह तभी सम्भव है जब हम निंद्रा पर जीत हासिल कर पाएं हों। कभी भी , कँही भी जब हम बड़ी चुनौती से आपने सामने होते हैं तब हमारी सजगता अति उच्च स्तर की होनी ही चाहिए। थोड़ी भी शिथिलता मंहगी पड़ सकती है, समस्या किसी भी कोने से अचानक आकर हमें घेर ले सकती है, सो हम निशिन्त होकर आरामतलबी होने का जोखिम नहीं ले सकते। सो इन तरह की स्थितियों में हमें गुडाकेश ही होना होगा। बड़ी चुनौती से हम तभी निपट सकते हैं जब हमारा परिश्रम, हमारी सजगता अति उच्च स्तर की हो।

          निंद्रा यानी चेतना का अभाव तब भी होता है जब हमारी बुराइयाँ हमारी अच्छाइयों को ढँक लेती हैं और हम अपने दुर्गुणों के व्यसन में डूब अच्छे बुरे के भान से अनजान बन जाते हैं। इसके उलट यदि हम अपनी अच्छाइयों के बल पर हैं तो फिर हमारे सद्गुण हमें हमेशा सजग रखते हैं कि हम कँही भी , कभी भी अपनी अच्छाई से गिर कर दुर्गुणों के अंधकार में न चलें जाएँ। यहॉ सजगता हमें हमारे महान उद्देश्य में सफल बनाती है। 

     अर्जुन वीर होने के साथ साथ विवेकी और सच्चरित्र भी है, उसे अपने दुर्गुणों को काट कर अपने सदगुणों को बढाने आता है। इस दृष्टि से भी अर्जुन गुडाकेश है। हमें भी इस प्रकार निंद्रा विजयी यानी दुर्गुणों का विजेता होना चाहिए। 

     अब देखिए श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को कँहा ले आकर खड़ा करते हैं। दोनों पक्षों के बीच ठीक भीष्म और द्रोण के समक्ष।  यदि कृष्ण चाहते तो रथ दुर्योधन के सम्मुख भी खड़ा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे सीधे भीष्म और द्रोण के सामने अर्जुन को ले आये।  यदि सामने दुर्योधन रहता तो कदाचित गीता वाचन का अवसर भी नहीं आता और सीधे युद्ध प्रारम्भ हो जाता। दुर्योधन और अर्जुन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घोर वैर था। दुर्योधन ही वह प्रमुख कारक था जिसके कारण पांडवों को इतने कष्ट उठाने पड़े थे। लेकिन तब जो युद्ध होता उसमें धर्म का कोई स्थान नहीं होता। वह युद्ध दुर्योधन के लालच रूपी अधर्म और अर्जुन के बदले की भावना  रूपी अधर्म के बीच होता जिसमें मूल्यों का कोई स्थान नहीं होता। तब बुराई से अच्छाई नहीं लड़ रही होती बल्कि एक बुराई दूसरे बुराई से लड़ रही होती। इसके परिणाम स्वरूप बुराई ही अंत परिणाम के रूप में सामने आती। हम एक कि बुराई को दूसरे की बुराई से नहीं हरा सकते, क्योंकि कोई भी बुराई का परिणाम अच्छाई नहीं होती। तब एक कि बुराई दूसरे की बुराई से बस स्थान्तरित हो जाती है। एक अधर्म का स्थान दूसरा अधर्म ले लेता है। लालच और बदले की भावना में क्या हो जाता यदि एक का लालच हार ही जाता तो। बस यही होता कि बदले की भावना जीत कर प्रतिशोध का साम्राज्य कायम कर देती। तब वैमस्य का कँहा अंत होता। तब ये युद्ध धर्म युद्ध होता ही नहीं। हमें कभी भी एक बुराई को हराने के लिए दूसरे बुराई का सहारा नहीं लेना चाहिए।

    सो कृष्ण अर्जुन को भीष्म और द्रोण के समक्ष ले जाते हैं। यँहा दोनों के बीच कोई वैमस्य नहीं है। यँहा एक सम्भावना है कि अर्जुन को अपने आदरणीय अंग्रजो को देख कर अपनी  करुण भावनाओं , अपने मोह से संघर्ष करना पड़े।  जब हमारे स्वजन, हमारे आदरणीय  गलती करते हैं तो हम मोह वश उनकी गलतियों से आँख मोड़ना चाहते हैं। लेकिन ऐसा कर हम बुराइयों को प्रश्रय ही देते हैं। एक प्रकार से अधर्म के बढ़ोतरी में सहायक ही होते हैं। सो जब हमारे अंदर अच्छाई और बुराई का संघर्ष हो तो हमारी समझ इतनी होनी चाहिए कि हम बुराई का साथ न दें। यही बात हमारे कार्यक्षेत्र में भी लागू होती है। जो गलत  के रास्ते पर है  या  जो अधर्म के रास्ते पर है,  भले ऐसा करने वाला हमारा कितना भी प्यारा क्यों न हो, भले हमारा अपना ही अंग क्यों न हो, हमें अपनी मानसिक अवस्था इतनी मजबूत रखनी चाहिए की हम उसके बुराइयों का प्रतिवाद और प्रतिकार कर सकें।

  भीष्म भ्रम और द्रोण गुरु होने के नाते द्वैत के प्रतीक हैं। अच्छे और बुरे के संघर्ष में अच्छाई का पहला सामना भ्रम से होता है। यह भ्रम अच्छाई को अपने मोह पाश में लेकर उसकी मति मारना चाहता है। तरह तरह के तर्क देता है, भय, लालच, अहंकार,  असत्य , हिंसा इत्यादि को जन्म देता है। दूसरी तरफ गुरु हमें इस बात का भान दिलाता है कि यदि हमें  जीत हासिल करनी है तो हमें सन्मार्ग पर बढ़ने का रास्ता चुनना होगा। जब भी हम बड़ी चुनौतियों से दो चार होते हैं  तो सबसे पहले हमें अपने भ्रम को मारना होता है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। अच्छाई के प्रति, सही के प्रति हमारी परतबढता अटूट होनी चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को एक मौका देते है कि भीष्म यानी भ्रम के बहाने अर्जुन मोह से दूर होकर सत्य के प्रति परिबद्ध हो सके। अर्जुन का रथ भीष , द्रोण और पृत्वी के समस्त राजाओं के मध्य खड़ा है। हमारे सामने अभी अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ  खड़ी हैं । जरूरी है कि हम अपनी प्रतिबद्धता अच्छाई के प्रति साबित कर सकें। हर बड़ी चुनौती सामबे आने पर हम सभी के सामने ऐसी हो परिस्थिति रहती है। यदि हम सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमारी मानसिक स्थिति भ्रम को काटने वाली होंनी ही चाहिए। किंकर्तव्यविमूढ़ता को हराये बिना हमारी नजर साफ ही नही हो पाती। श्रीकृष्ण अर्जुन को अच्छाई और बुराई के इस महाभारत में बुराई से लड़ने के लिए उज़के गुणों से तैयार करना चाहते हैं। हमें बुराई को हराने के लिए, अनीति को हराने के लिए सिर्फ शरीर से ही नहीं विवेक से भी मजबूत होना होता है और ये तभी होता है जब हम बुराई के बतरंजाल से उससे सीधे सीधे उलझ कर बाहर आते हैं।

       अर्जुन के लिए पार्थ सम्बोधन श्रीकृष्ण प्रयोग में लाते हैं। कुंती का एक नाम पृथा भी है, अर्जुन को उसके माँ के नाम से जोड़कर श्रीकृष्ण सम्बोधित करते हैं। यानी माँ कुंती के सारे गुण अर्जुन में भी हैं ये इस तथ्य का प्रतीक है। पृथा पार्थिव का भी द्योतक है यानी जो मिट्टी का बना है अर्थात जो नाशवान है। मतलब जब जब हम अपने इस मिट्टी के नाशवान शरीर को ही बुराई से लड़ने का साधन बना लेते हैं तब हम पार्थ हैं। हमारा शरीर ही वो रथ है जिसपर सवार होकर हम सन्मार्ग पर चलते हैं।

      अब देखें, अर्जुन को ये प्रेरणा कौन दे रहा है। ये प्रेरणा हृषिकेश दे रहे हैं यानी जो इन्द्रियों के स्वामी दे रहें हैं। मतलब की हमारी प्रेरणा का मूल स्रोत हमारा विवेक ही है। यही बतलताता है कि हमे क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है।

     फिर श्री कृष्ण कहते हैं,  युद्ध के लिए जूट हुए इन कौरवों को देख पार्थ। यानी अर्जुन को देखने का निर्देश  श्रीकृष्ण दे रहें हैं। हमने पूर्व में देखा है कि कौरव पक्ष में ये निर्देश दुर्योधन देता है। वह अहंकार और बेचैनी में गुरु द्रोण को पांडवों वीरों को देखने के लिए कहता है। लेकिन इसके विपरीत यँहा हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण जो इन्द्रियों के स्वामी हृषिकेश हैं, विवेकी हैं वो अर्जुन को कह रहे है समस्त कुरुओं यानी कौरव और पांडव दोनो। को देखने के लिए कहते हैं। कौरव और पांडव दोनों ही कुरुवंशी ही हैं।  श्री कृष्ण दुर्योधन की तरह योद्धा विशेष का नाम नहीं गिनाते। विवेक स्वाभाविक रुक से इंसान को यही समझाता है कि कोई भी कार्य करने के पूर्व उससे  जुड़ी अच्छाई और बुराई, उससे जुड़े सद्गुण और दुर्गुण, उससे जुड़े सही और गलत दोनों को देखे। यदि हम कुछ करने जा रहें हैं तो हमें ठहर कर हर पक्ष का ठीक से अवलोकन कर लेना चाहिए।  अन्यथा हम सही और गलत का निर्णय नहीं कर सकते और ऐसी स्थिति में सफलता के लिए कुछ भी गलत सही करने के लिए तैयार  तैयार हो जाएंगे जिसके कारण बहुत ही विनाशकारी परिणाम भी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश विवेक का निर्देश ही तो है।
   
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ को अर्जुन के कहे अनुसार लेजाकर दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य खड़ा कर दिया ताकि अर्जुन दोनों पक्ष की सेनाओं का निरीक्षण कर सके और अपने ही कहे अनुसार यह देख सके कि दुर्बुद्धि दुर्योधन का साथ देने के लिए कौन कौन लोग आए हैं। उद्देश्य स्पष्ट है कि अर्जुन वास्तविक युद्ध शुरू होने के पहले मित्र और शत्रु के बल का वस्तुनिष्ठ आकलन कर लेना चाहता है । श्रीकृष्ण रथ खड़ा कर उसे निदेश भी देते हैं कि देखो यानी आकलन करो। और अर्जुन क्या आकलन कर लेता है ? अर्जुन को शत्रु सेना में अपने परिजन और मित्र दिखते हैं।

      यह एक वास्तविक मानसिक स्थिति होती है जिससे हम सभी गुजरते हैं, प्रतिदिन गुजरते हैं। हम सिद्धान्त तौर पर गलत को गलत कहते ही हैं लेकिन जब उस गलत को खत्म करने की हमारी बारी आती है तो हम कन्नी काटने लगते हैं कि फलाना गलत कार्य, फलाना अपराध तो मेरे अपने व्यक्ति ने किया है तो अब मैं क्या करूँ। अपनों की आड़ लेकर हम न्याय से , सत्य से भागते हैं। तरह तरह के तर्क गढ़ते हैं जैसा कि अर्जुन आगे के श्लोकों में गढ़ता है। अपराध या गलत अपराध या गलत ही होता है, कौन किया अपने किये कि पराये ये मायने नहीं रखता। लेकिन हमारा मन मोह में फंसा अपने और पराये के भेद में उलझ जाता है। न्याय की हमारी सैद्धान्तिक समझ वास्तविकता के धरातल पर आकर अपने और पराये कर्ता के आधार पर भेद करने लगती है। और तब हम न्याय का , सत्य का, धर्म का पक्ष नहीं ले कर पलायन करने लगते हैं। नतीजा कि अन्याय तो बढ़ता ही है हमारी अपनी नैतिक स्थिति , हमारा न्याय का पक्षधर होने की अपना नैतिक बल कमजोर होने लगता है।

     जब हम मोहवश अनिर्णय की स्थिति में होते हैं तो कार्य प्रारम्भ करने से डरते हैं , सो अर्जुन की तरह हम भी भयभीत और विषादग्रस्त हो जाते हैं। हमें पता होता है कि सामने वाले ने गलत किया है, लेकिन ये भी सोचते हैं कि गलत करने वाला तो मेरा अपना ही है तो फिर उसे दण्डित कैसे करें। हम अधर्म , अन्याय, गलत, दुर्गुण, बुराई के और उसके दुष्परिणाम के बारे में भूल जाते हैं और उसे करने वाले के यानी उस अधर्मी, अन्यायी, गलत, दुर्गुणी,और बुरे व्यक्ति के जिसे हम अपना ही समझते हैं उसके कल्याण के बारे में सोचने लगते हैं। परिणाम ये होता है कि अधर्म, दुर्गुण, बुराई, गलत  ये सब और मजबूत होते जाते हैं। और हम अनिर्णय के कारण अपने सद्गुणों को अपने ही मोह से मारकर हताश , निराश , व्यथित, दुखी हो कर बैठ जाते हैं, अक्रियाशील हो जाते हैं। व्यवहार का सिद्धांत से विलगाव निराशा का जन्मदाता होता है।

      हमारे अंदर अच्छी और बुरी दोनों प्रवृत्तियाँ होती हैं। जब हम चुनौती स्वीकारते हैं तो दोनों हमें प्रभावित करना चाहती हैं। जैसे ही हमपर भ्रम और भ्रम जनित मोह हावी होता है हम सत्य, अच्छाई के मार्ग से हट जाते हैं। अगर वस्तुतः हम अच्छी सोच के व्यक्ति हैं और मोहवश गलत के फेरे में पड़ जाते हैं तो मानसिक रूप से यानी आत्मिक तौर पर तार तार हो जाते हैं। ये हमपर ही निर्भर करता है कि हम गलत करने का साथ देंगे सिर्फ इस आधार पर कि वो मेरा अपना है , उसे दंडित करने से मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा या गलत का विरोध कर उससे संघर्ष करेंगे। 

    हर चुनौती के समय ये प्रश्न विकराल रूप में हमारे सामने आता है । भ्रम वश मोह में उलझ कर अवगुणी व्यक्ति भी अपने अवगुण के कारण हमारा शत्रु न लग कर हमसे अपने सम्बन्ध के कारण हमारा मित्र अथवा अपना स्वजन लगने लगता है।

     तो क्या हम आप किसी अपराधी को सिर्फ इसलिए माफ कर दें कि अपराध की प्रकृति चाहे जो हो चूँकि अवराधि मेरा अपना है सो उसका विरोध नहीं किया जाए।  तब तो खत्म हो गए सारे अधर्म, अपराध, अवगुण, असत्य, और दुर्गुण।

        अब हम पुनः इस मूल श्लोक पर लौटते हैं थोड़े फ्लैशबैक के साथ। अर्जुन हाथ में धनुष उठाये हुए है और श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य लेकर चलने को कहता है ताकि वो दुर्योधन और उसके मूर्ख मित्रों को देख सके। श्रीकृष्ण ऐसा करते भी हैं। स्पष्ट है कि अर्जुन युद्ध के लिए तैयार है, उसके मन में कोई संशय नहीं है, कोई असमंजस नहीं है। लेकिन जैसे ही वह शत्रु पक्ष को देखता है उसे शत्रु पक्ष सेना की तरह नहीं स्वजनों के समूह की तरह लगता है। जब भी हम भ्रम में पड़ते हैं मोह का जन्म होता है, मोह से माया उतपन्न होती ही है जिसके परिणाम में अपने और पराये का बोध होता है। 

    तो फिर दुर्योधन को ऐसा क्यों नहीं हुआ? वह भी तो पांडव पक्ष को देख रहा था लेकिन उसे तो पांडवों में अपने शत्रु ही दिखे, परिजन नहीं। वस्तुतः ये हमारे गुणों के स्तर और उससे प्राप्त ज्ञान में फर्क के कारण है।

     दुर्योधन के अंदर हमेशा ही आसुरी गुण यानी क्रोध, अहंकार, लालच, असत्य, हिंसा के भाव रहते हैं। इस तरह के व्यक्ति के अंदर सत्य के अन्वेषण की प्रवृत्ति नहीं होती। तभी तो युद्ध के मैदान भी वही अपने गुरु को निर्देश दे रहा है। जिसे सत्य की कामना ही नहीं वो भला सत्य के मार्ग में आने वाली कठिनाई की चिंता क्यों करें। यदि अज्ञानी को अपने अज्ञान पर ही अहंकार हो तो फिर उसे मार्गदर्शक, या सलाहकार की क्या जरूरत। उसके विपरीत अर्जुन वीर होने के साथ ज्ञानी भी है। उसे लगता है कि स्वजनों से अपने हित पूर्ति के लिए लड़ना स्वार्थ परक हिंसा है। सो वो भ्रमित होता है और सेना में उसे स्वजन और मित्र दिखते हैं। ये और बात है कि उसका ज्ञान अधूरा है। जब हम सत्य के मार्ग पर बढ़ते हैं तभी हमारे दुर्गुण हमपर हमला कर हमें भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। जो हमेशा भ्रमित और अवगुणों के सहारे है वो फिर भला कभी सोच भी सकता है क्या?

यही वो मनःस्थिति होती है जब गीता के ज्ञान की आवश्यकता शिद्दत से महसूस होनी शुरू होती है। लेकिन ज्ञान उसी को मिलता है जिसे इसकी चाह होती है। आगे देखेंगे अर्जुन को चाह थी सो गीता का सानिध्य मिला। हमें होगी तो हमें भी मिलेगा, अन्यथा हम भी दुर्योधन ही बने बने समाप्त हो जाएंगे।
आप  कोई कार्य प्रारम्भ करने वाले हों , उसी समय उस उस कार्य के प्रति आपको भ्रम हो जाये, तो आपकी मानसिक स्थिति कैसी हो सकती है?  यदि आप उत्साह से  भरकर  अपराधी को दण्डित करने वाले हों उसी समय आपको ज्ञात हो/आभास हो कि ये अपराधी तो आपके ही परिवार के सदस्य हैं तो आपकी मानसिक स्थिति क्या होगी? 

           युद्धक्षेत्र के बीच खड़ा अर्जुन इसी तरह की स्थिति में फँस गया पाता है अपने आपको। विपक्ष उसे शत्रु के रूप में नहीं दिख रहा है। कँहा तो वो युद्ध में शत्रुओं को हराकर अपना राज्य वापस पाने चला था गांडीव थामे और कँहा उसे विरोधी के रूप में स्वजन और मित्रगण ही दिख रहे हैं।  जब अपराधी में स्वजन और मित्र दिखने लगे, जब गलत और दुर्गुणी व्यक्ति के दुर्गुण नहीं दिखे, उनका अधर्म और अपराध नहीं दिखे बल्कि इसके बदले सम्बन्ध दिखने लगे तो क्या हम में से कोई वस्तुनिष्ठ हो सकता है, क्या हमसे आपसे न्याय की उम्मीद की जा सकती है?  चेहरा देख कर, अपना पराया के आधार पर , मित्रता शत्रुता के अनुसार धर्म, सद्गुण,न्याय का पक्ष नहीं लिया जा सकता है। किसी का अवगुण, किसी का अपराध, किसी का अधर्म, किसी का अन्याय सिर्फ इसलिए क्षम्य कैसे हो जा सकता है कि वो व्यक्ति हमारा मित्र या परिवार का है? तब तो न कुछ धर्म होगा न अधर्म। 

         लेकिन अर्जुन इसी का शिकार हो जाता है युद्ध के मैदान में।उसे अधर्मी ,अन्यायी, अपराधी में अपने स्वजन और मित्र दिखते हैं। जब हमें सत्य की   समझ पूरी तरह से नहीं हो, जब हमारा ज्ञान अधूरा हो, जब विवेक का जोर नहीं चल रहा हो तब ऐसा वयक्ति भ्रम में पड़ता ही है।

     सत्य धारण करने का दम्भ भरते भरते जब हम अधर्म के मार्ग पर बढ़ जाते हैं तो हमारा बल, हमारी शक्ति क्षीण होने लगती है, पहले मन मस्तिष्क साथ छोड़ता है, फिर शरीर भी शिथिल होने लगता है। अभी तो अर्जुन कौरवों से युद्ध करने के लिए उत्साहित हो कर सैन्य निरीक्षण पर निकला था कि उसके अंदर अपना पराया का भ्रम आ गया। इस भ्रम बे उसकी बुद्धि को भ्रष्ट किया। हर जगह यही होता है। जैसे ही सत्य के प्रति भ्रम होता है, सबसे पहले बुद्धि और विवेक का पतन होता है। इससे मन के अंदर डर जन्म लेता है। ये डर खुद के अंदर होता है न कि बाहर। अर्जुन अपने युग का महानतम योद्धाओं में शामिल था लेकिन सत्य के प्रति जैसे ही उसे भ्रम होता है उसकी शक्ति क्षण भर में क्षीण हो जाती है। शक्ति सत्य में होता है, शरीर में नहीं। निडरता तभी तक साथ देती है जब तक हम सत्य के साथ खड़े होते हैं। दैनिक जीवन के किसी भी उदाहरण को उठा कर देख लीजिए, जब कभी आप झूठ का सहारा लेते हैं, जब कभी आप अन्याय का साथ देते हैं , जब कभी आप गलत काम का समर्थन करते हैं आप खुद को अपने ही अंदर कमजोर पाते हैं, मन ही मन डरे हुए होते हैं, आपका आत्मविश्वास डिगा रहता है।

  सच जानने वाला यदि सच से मुँह मोड़ता है तो उसका पतन उस आदमी से भी अधिक होता है जो शुरू से ही असत्य के साथ है। जो शुरू से असत्य, अन्याय, अधर्म, और अवगुण यानी आसुरी शक्तियों के साथ है उसका भला क्या पतन होगा, गिरा हुआ कँहा गिरेगा, सो दुर्योधन को भला क्या अज्ञान का डर होता। लेकिन जिसने हमेशा असत्य, अन्याय, अधर्म, अवगुण का विरोध किया हो वो अगर भ्रमवश सत्य से  विचलित होता है तो वो तो गिरेगा हीं, निश्चित गिरेगा, उसके भी हाथ पैर काँपने लगेंगे, मुँह सूखने लगेगा, दिमाग सुन्न पड़ने लगेगा। यही तो अर्जुन को हो रहा है। उसकी  माया, उसके मोह उसकी शक्ति को खाय जा रहें हैं। इसी स्थिति में इंसान मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगता है। और अज्ञान को ही ज्ञान बताकर विरोधाभाषी तर्क करना प्रारम्भ कर देता है यानी कुतर्क पर उतर आता है। वह भोग और सन्यास को एकसाथ भोगना चाहता है। इस स्थिति में गिरा आदमी चाहता है कि उसे कोई कार्य होने का जिम्मेदार भी न माने और उसे उस कार्य का फल भी भोगने को मिल जाये। उसका अपना कोई अधर्म, अन्याय करे तो उसे वो दंडित न करे लेकिन उसे ही धर्म और सत्य का मीठा फल भी मिल जाये। वाह! ऐसा सोचने वाला पतनशील नही  तो क्या कहलायेगा भला!

   अर्जुन की हालत मनोरोगी की हो रही है। जब  भी धर्म, न्याय, देवी गुणों, (सद्गुण) और सत्य  के रास्ते चलने वाला किसी परिस्थिति विशेष में ज्ञान के अभाव में सत्य ,  धर्म , न्याय के प्रति भ्रम में पड़ता है किसी कारण वश तो विवेक और बुद्धि और उन्ही से नियंत्रित शरीर भी भय से व्याकुल हो उठते हैं।
    मोह से पीड़ित व्यक्ति की मानसिक स्थिति बिगड़ती जाती है, वो अधीर, चंचल, अस्थिर, व्याकुल होकर शक्तिहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसमें शारीरिक बल भी नहीं रह जाता। मन से कमजोर इंसान शरीर से भी प्रतिकार करने लायक नहीं रह जाता। यही कारण है कि हर प्रतिद्वंद्विता और प्रतिस्पर्द्धा में पहले विरोधी के मानसिक बल को तोड़ने की रणनीति बनाई जाती है और माना जाता है कि यदि आप प्रतिद्वंद्वी को मानसिक स्तर पर हरा देते हैं तो फिर शारीरिक स्तर पर हराना मात्र औपचारिकता भर होता है। दुर्गुण यानी आसुरी शक्तियाँ भी दैवी गुणों(सद्गुणों) के साथ की लड़ाई में यही करती हैं। आसुरी गुण यानी दुर्गुण झुण्ड में व्यक्ति के बुद्धि विवेक पर आक्रमण करती हैं। भ्रम, मोह, माया, क्रोध, निराशा, अहंकार ये सभी एक साथ हमारे विवेक को घेरती हैं, नतीजा ये निकलता है कि यदि हमारे सद्गुण कमजोर पड़े तो हम हतोत्साहित होकर मानसिक रोगी की तरह आचरण करने लगते हैं। तब हम अपनी स्थिति को सही ठहराने के लिए अपने ही विवेक से कुतर्क करना शुरू कर देते हैं। सत्य से भागा हुआ मन सामाजिक रूप से ये तो नहीं स्वीकारता कि वो असत्य और अन्याय का साथ दे रहा है किंतु उसके तर्क घुमा फिरा कर यही कहते हैं।

     मोह से विचलित अर्जुन की भी यही स्थिति है। अपराध , असत्य, अन्याय को सिर्फ इस आधार पर माफी देने का मोह कि दोषी उसके परिवार के और मित्रगण हैं को अर्जुन सीधे सीधे नहीं स्वीकारता बल्कि कई तरह के कुतर्क देता है। उसे ज्ञान नहीं है लेकिन वह दिखाना चाहता है कि वह बड़ा ज्ञानी है।

   अर्जुन के तर्कों का सारांश यही है कि जिनसे युद्ध करना है वो सभी उसके स्वजन हैं , मित्र हैं जिन्हें मारना उचित नहीं है। वह यह तर्क भी देता है कि यदि स्वजनों को गँवा कर राज्य मिल भी जाय तो ऐसे राज्य के भोग का वह क्या आनंद उठा पायेगा। उसे लगता है कि सुख और आनंद बाँटने के लिए उसके स्वजन और मित्र ही न हो तो फिर राज्य जीतने का क्या लोभ। इससे अच्छा तो उन्हें नहीं मारना है भले वे अर्जुन को मार डालें। अर्जुन यँहा तक कह जाता है कि उसके ये स्वजन भले ही आतताई हों लेकिन उन्हें मारने से तो अपने ही कुल का नाश होगा जिससे सुख नही मिलेगा। सो अर्जुन युद्ध से इनकार करता है।

    इस प्रकार अर्जुन तर्क पर तर्क दिए जा रहा है और कृष्ण कुछ बोल ही नहीं रहें हैं। अर्जुन के इन तर्कों का यदि परीक्षण करें तो कई तथ्य खुलकर सामने आते हैं।

         अर्जुन की नजर में अपराध से ज्यादा महत्व अपराधी का  है। यदि अपराधी अपने कुल परिवार का है तो उसके सारे खून माफ कर दिए जाने चाहिए। यँहा तक कि यदि अपने कुटुम्ब के लोग आतताई भी हों अर्थात ऐसे लोग जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के साथ अन्याय पूर्वक हिंसा करते हों तब भी उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ देना चाहिए कि वे अपने परिवार के हैं, अपने मित्र, दोस्त, सम्बन्धी हैं। इस प्रकार अर्जुन एक ऐसी व्यस्था का समर्थन करने में लगा है जँहा न्याय पीड़ित को नहीं पीड़ा देने वाले को दिए जाने का सिद्धांत होता है।  यदि कोई अपराधी आपके पिता की हत्या कर देता है और वो हत्यारा किसी मजबूत का कोई सम्बन्धी है तो उसे सजा नहीं दी जाय। ईद प्रकार लगातार अपराध की श्रृंखला तैयार होती जाएगी। लेकिन सम्बन्धों के मोह में पड़ा व्यक्ति निर्लज्जता से इस तर्क के पक्ष में खड़ा मिलता है।  अर्जुन शासक वर्ग से आता है जिसे दण्ड देने का अधिकार है। यदि शासक ही ऐसा मानेगा तो प्रजा का क्या हाल होगा आप खुद अनुमान कर लें। लेकिन मोह से घिरा मन इस  अनीति इस अन्याय को नहीं समझ कर इसे ही नीति का नाम दे देता है। राजनीति की ये धारा आज भी है क्योंकि मोह तो आज भी जिंदा है। जँहा मोह होगा वंही अन्याय का वास भी होगा। ऐसी स्थिति से समाज में अनाचार का प्रभुत्व बढ़ेगा, अपराध और अन्याय बढ़ेगा। हम सभी अपने अपने मोह में यही करते रहते हैं। अपनी अपनी स्थिति, अपने अपने हैसियत के अनुसार अपने परिजनों और मित्रों के कुकर्मों को नजरअंदाज करते रहते हैं। नतीजा में एक ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था का निर्माण होता है जिसमें बेखौफ अपराधियों का भाई भतीजेवाद के बल पर प्रभुत्व कायम रहता है और सामान्य जन इन चंद लोगों के रहमो करम पर रहने के लिए विवश होते हैं। इस सोच से घोर अस्मांतावादी समाज बनता है जिसमें ताकतवर के सभी दोष सिर्फ इसलिए माफ कर दिए जाते हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध सत्ता में बैठे लोगों से होता है। परिणामतः समाज में हर तरह के अपराध, अन्याय, असत्य अवगुण का राज स्थापित हो जाता है। अनीति को, अन्याय को , अत्याचार को बर्दाश्त करने की सीख अर्जुन दे रहे होते हैं। जब हम अन्याय, अनाचार , अत्याचार को बर्दाश्त करते हैं तो हम उनको बढ़ावा दे रहें होते हैं।  अन्याय के प्रति सहनशीलता समाज में अराजकता को जन्म देती है। सो ये जरूरी होता है कि अन्याय, अत्याचार , अधर्म और अनीति को बर्दाश्त नही कर उनका सक्रिय प्रतिकार किया जाए ताकि समाज में नीति का राज और शांति की व्यवस्था कायम की जा सके।

    दूसरी बात कि मोह से घिरा मन चालाकी से अपने अज्ञान को ही ज्ञान बताकर प्रचारित करता है। अर्जुन राज्य त्याग की बात कर ये दिखाता है कि वह तो महान त्याग परम्परा का सन्त है जिसे राज पाट से कुछ लेना देना नहीं है बल्कि उसके अंदर तो सन्यास भाव है। हम में से कई लोग , विशेषकर समाज के ताकतवर लोग इस तरह का ढोंग खूब करते हैं और खुद को साधु, सन्त, फकीर कहते नही  अघाते और गीताज्ञान से वंचित जनता उनके बहकावे में आकर उनपर भरोसा कर उनको पूजने भी लगती है। दरअसल ध्यान देने की बात है कि अर्जुन क्या तर्क दे रहा है। उसका कहना है कि बन्धु, बाँधवों, मित्रों को गंवाकर प्राप्त राज्य का वह क्या करेगा जब उसका सुख भोगने के लिए ये बंधु बाँधव मित्र ही न हो उसके साथ। मतलब साफ है कि अर्जुन को राज पाट तो चाहिए लेकिन दुर्गुणों से भरे दोस्त मित्र और सम्बन्धी भी चाहिए। या यूं समझें कि अर्जुन को राज पाट सब चाहिए बस उसके माथे इन इष्ट मित्रों परिजनों की हत्या का दोष न लगे। मतलब साफ है। गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज करें! यह भला कौन सा सन्यास है जो सुविधा की शर्त पर टिका हुआ है। आज भी ऐसे ढोंगी सन्यासी खूब मिलते हैं जो इसी तर्क के बल पर समाज के औराधियो को संरक्षण देकर उसकी कीमत में भौतिक सुख सुविधा और सत्ता का सुख उनसे लेते हैं। 

      अर्जुन के इन तर्कों से समाज में अपराध और सत्ता के गठबंधन की नींव पड़ती है।

  महाभारत का युद्ध आंतरिक युद्ध पहले है, बाहरी युद्ध बाद में है। हमारे अंदर की बुरी प्रवृत्तियाँ जब अच्छी प्रवृत्तियों पर हावी होती हैं तो भ्रम उनका अगुआ होता है जो मोह को हमारे विवेक के ऊपर छोड़ता है। अगर मोह हावी हुआ तो बुद्धि और विवेक अपना प्रभाव खो देते हैं। ऐसी स्थिति में इंसान का व्यवहार ठीक शब्दसः वही होता है जो अबतक हम अर्जुन का देख रहें हैं। उसकी मानसिक हालत और उसके कुतर्क भी वही होते हैं। ऐसा नहीं कि इसका प्रभाव सिर्फ युद्ध जैसी स्थिति में ही होता है। जीवन के हर मोर्चे पर हमारे अंदर हमारी ही बुराई हमारी ही अच्छाई से लड़ रही होती है और जब जब बुराई हावी होती है हम भी इसी मानसिक शारीरिक बौद्धिक स्थिति में गिर जाते हैं और कुतर्कों का जाल बुनने लगते हैं खुद को सही ठहराने के लिए।

      श्रीकृष्ण अभी तक चुप हैं। उनका चुप रहना एक मनोवैज्ञानिक योजना का अंग है। जब एक अच्छा भला इंसान किसी वजह से विवेक खो दे तो उसे पहले जी भर कुतर्क कर लेने दें ताकि वो अपनी बात कह कर खुद को मानसिक रूप से हल्का कर सके। तब ही उसे समझाना उचित होता है, अन्यथा वह आदमी अनावश्यक वाद विवाद में पड़ा रहेगा और आपको भी खींचता रहेगा।
    अर्जुन कृष्ण के मौन से परेशान सा हुआ लगता है। जब हम तर्क देते हैं तो चाहते हैं कि सामने वाला हमारे तर्क को समर्थन दे, बोलकर नहीं तो अपने हाव भाव से ही सही। लेकिन जब सामने वाला एकदम से कोई प्रतिक्रिया ही न दे तो हम क्या करते हैं? यदि हम थोड़े पढ़े लिखे हैं , थोड़ा बहुत अनुभव भी है तो खुद को बड़ा ज्ञानी साबित करने में लग जाते हैं और लगते हैं तर्क पर तर्क करने भले ही हमारा तर्क कुतर्क ही क्यों न हो।कम ज्ञान की भरपाई हम अधिक बोलकर, कुछ ऊँची आवाज में बोलकर, कुछ आलंकारिक भाषा में बोलकर पूरा करने की कोशिश करते हैं। कुरुक्षेत्र में हू  ब बहू यही हो रहा है। अर्जुन लागातार तर्क पर तर्क दिए जा रहा है। अब वो क्या तर्क कर सकता है, इसे भी समझें। मन में भ्रम है, अत्याचारी, अधर्मी, अनाचारी, अन्यायी सम्बन्धियों के लिए मोह है, उनके प्राणों का मोह है,  खुद अपने मन में सम्बन्धियों सहित राज पाट भोगने की लालसा है तब सोचिये कि अर्जुन क्या तर्क कर रहा होगा। 

      वह वही कह रहा है जो इस अवस्था में पड़ा इंसान करेगा। वो अपने तर्कों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि सम्बन्धियों की मृत्यु से उसके कुल का विनाश हो जाएगा, और कुल नाश का पाप उसे लगेगा। मित्रों से युद्ध मित्रों से घात करना होगा। कुल का नाश होने से कुलधर्म खत्म हो जाएगा और सम्पूर्ण कुल में पाप का प्रभुत्व हो जाएगा। अर्जुन का मानना है कि सम्बन्धी चाहे आतताई ही क्यों न हों उनकी रक्षा होनी ही चाहिए ताकि कुल/परिवार चलता रहे। अर्जुन का धर्म सिखाता है कि अधर्म करने वाला अगर सम्बन्धी है तो उसी अधर्मी के बल पर कुल धर्म की रक्षा की जा सकती है। आप देख रहें हैं कि मोहग्रस्त अर्जुन जिसके पास अपने पक्ष में कोई तर्क नही है किस प्रकार निर्भीक हो कर कुतर्क कर रहा है। अर्जुन के अनुसार कुलधर्म ही सनातन धर्म होता है। सनातन धर्म की उसकी समझ उसे बताता है कि हमारा कुलधर्म ही सनातन है अर्थात ऐसा धर्म जिसका न कोई प्रारम्भ है न ही अंत।  उसके अनुसार पारिवारिक परम्पराएँ ही धर्म कहलाती हैं, सनातन धर्म। अर्थात सनातन धर्म वही कुछ है जो  हमारा परिवार हमें  सिखाता है।

     अर्जुन ये मानता है कि कुलधर्म के नाश और परिणामस्वरुप सनातन धर्म के नाश से पाप का प्रसार होता है। वह अधर्मी, अनाचारी , अत्याचारी, आतताई  को दंडित करने को अधर्म मानता है और  उनके नाश से सनातन धर्म के नाश का डर है उसे। उसे डर है कि आतताई के दाण्डित होने से पाप का प्रसार होगा!

       आखिर अर्जुन जैसा शिक्षित, दीक्षित, सदाचारी, वीर इस तरह का कुतर्क क्यों करने पर उतारू हो चला है। दरअसल युद्ध तो हम सबके अंदर है,अर्जुन के भी अंदर  है। वह स्वाभावतः वीर है सो शत्रु दल की सम्मलित शक्ति भी उसके वीरोचित शौर्य को नहीं हिला सकी थी। हम देखते हैं कि अर्जुन विरोधियों के बल से तनिक भी नहीं डरा है। लेकिन मन के अंदर चलने वाले अच्छे बुरे के संघर्ष में वह हारता हुआ दिखता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।  वह कमजोर पड़ रहा है तो मन के कारण। उसके अंदर की बुराई उसकी अच्छाई पर  भारी पड़ रही है। हम सभी के अंदर दैवी गुण(सद्गुण) और आसुरी गुण ( अवगुण) होते हैं। इन गुणों की विस्तृत व्याख्या श्रीकृष्ण सोलहवें अध्याय में करते हैं लेकिन इनकी चर्चा दूसरे अध्याय से ही शुरू कर देते हैं। भ्रम, माया, मोह, क्रोध, असत्य, लोभ, वासना, हिंसा, कामना, भोग , भय इत्यादि आसुरी गुण हैं जबकि सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव, अभयता, दया, क्षमा, कामना का त्याग आदि दैवी गुण हैं। जब दुर्गुण सद्गुण पर भारी पड़ते हैं तो सही निर्णय ले पाने की , सत्य को देख समझ पाने की हमारी क्षमता खत्म हो जाती है और हम भयभीत होकर आत्म रक्षा के लिए अनाचार, अत्याचार , का रास्ता पकड़ लेते हैं और इसी अवगुण से उपजे तर्क को ज्ञान समझने की भूल कर बैठते हैं। ठीक यही अर्जुन के साथ हो रहा है। तभी तो वह धर्म को पारिवारिक परम्परा भर समझता है और इसी पारिवारिक परम्परा को अनंत काल से चलने वाला सनातन धर्म समझकर इसकी रक्षा में पल्याणवादी हो जाता है। जिस वीर अर्जुन को समस्त कौरव सेना मिलकर नहीं डरा सकी उसी वीर अर्जुन की वीरता उसीके भ्रम, मोह, अज्ञान से धाराशायी होकर तार तार जाती है। इतनी कि उसका मुख्य शस्त्र तक उससे नहीं उठ पा रहा है, जिससे उसने समस्त भारत भूमि के वीरों को धूल चटाया था। अर्जुन भ्रम में पड़कर इस तरह लाचार हो चला है। यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जिसे हो सकता है कि ज्ञान  बहुत हो लेकिन उसे मुठ्ठी भर भ्रम और मोह मिल जाये तो सारा ज्ञान मटियामेट होकर रह जाता है। मन के युद्ध में आसुरी शक्तियों के विजय में ही जीवन की हार बसती है।

       ध्यान देने की बात है कि अर्जुन का चरित्र दुर्योधन से भिन्न है। दुर्योधन को ज्ञान है ही नहीं , उसे अहंकार ही है। उसे सही गलत का भान तक नहीं सो वह तर्क नहीं कर पाता सीधे युद्ध पर उतरता है। दूसरी तरफ अर्जुन को ये तो ज्ञात है ही कि उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं सो जब उसपर भ्रम हावी होता है तो वह युद्ध नही करने के नतीजे पर पहुँचने के लिए तर्क का सहारा लेता है। हाँ, उसके तर्क बेतुके और खतरनाक हैं क्योंकि ये तर्क  कि वअधर्म , अनाचार, अत्याचार, अन्याय, असत्य को खत्म करने के स्थान पर उनकी रक्षा की दलील दिया जाय अत्यंत ही खतरनाक और समाज विरोधी  है क्योंकि परिणाम में तो अधर्म और अन्याय ही जीतेगा न।

     अभी अर्जुन थका नहीं है। आगे अभी वो और तर्क देगा।
      अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से कोई समर्थन न पाकर विचलित होता दिखाई दे रहा है। लेकिन उसके पास श्रीकृष्ण को समझाने का कोई और उपाय नही  रह गया है। सो वो अपने पिछले तर्क को ही नए तरह से धर्म की आड़ लेकर फिर से कहता है। जब दो जनों में वाद विवाद होता है और जब एक के पास समझ और तर्क खत्म होने लगते हैं लेकिन वो हार मानने के लिए तैयार नही  होता तो फिर से अपने पुराने तर्कों को ही नए ढंग से कहने का प्रयास करता है।  सत्य को स्वीकारने के लिए जिसमें  न तो साहस हो न ही ज्ञान वो असत्य के समर्थन में कोई न कोई  नया तर्क खोजेगा ही। इसी कारण अब अर्जुन अपने तर्क को नई भाषा देता है कि युद्ध में अगिनत लोगों के मारे जाने से समाज में स्त्रियों का चरित्र गिरेगा, जिससे वर्णसंकर पैदा होंगे। इससे पारिवारिक परम्परा का लोप होगा, पिंडोत्तक क्रिया समाप्त होगी,  पितर रुष्ट होंगे, और परिणाम में सनातन धर्म और जाति धर्म नष्ट होंगे। अर्जुन के तर्क प्रथम दृष्टया बहुत सही लगते भी हैं। लगता है अर्जुन हिंसा का घोर विरोधी है।आगे चलकर श्रीकृष्ण अर्जुन के इन तर्कों पर गहरा प्रहार करते हैं। अर्जुन का तर्क है कि जो पारिवारिक परम्परा है, उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन धर्म भ्रष्ट करता है। कुल ही धर्म का रक्षक है, वाहक है। उसके तर्कों के अनुसार यदि कुल में दुष्ट, अत्याचारी हों तो कुल की परम्परा, यानी कुलधर्म यानी सनातन धर्म को हानि नहीं होती बल्कि हानि तब होती है जब ऐसे दुष्ट, अनाचारी लोगों का अंत होगा क्योंकि इससे कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं और एक जाति की स्त्रियों का दूसरी जाति के पुरुष से सन्तान जन्म लेते हैं जो वर्ण संकर कहलाते हैं जिनमें किसी कुल की परंपरा नहीं होती। है न विचित्र तर्क ये!

   इसी प्रकार अर्जुन जन्म आधारित वर्णव्यस्था का समर्थन भी करता है और स्पष्ट रूप से जन्म आधारित जाति व्यस्था, स्त्रियों की शुद्धता जैसी चीजों के समर्थन में खुलकर आता है। उसकी समझ है कि यदि कुल भ्रष्ट होता तो सन्तानें भी भ्रष्ट होंगी जिससे पूर्वजों द्वारा संचित की गई कीर्ति भ्रष्ट हो जाएगी। अर्जुन की नजर में स्त्रियों के शारीरिक रूप से भ्रष्ट होने से  जाति और वर्ण की व्यवस्था समाप्त होती है जबकि पुरुषों के आतताई, अनाचारी, अन्यायी  होने से कुल भ्रष्ट नहीं होता। साफ साफ दिखाई दे  रहा है कि अर्जुन कुतर्क करने पर अमादा है। उसकी अहिंसा में अत्याचारी और अधर्मी की तो चिंता है लेकिन धर्म और आचार विचार की रक्षा की चिंता नहीं है। वह बार बार धर्म के भ्रष्ट होने की दुहाई तो दे रहा है लेकिन उसका धर्म विचित्र है जिसमें अधर्मी के नष्ट होने से धर्म खतरे में पड़ता दिखता है, कुल की परंपरा नष्ट होते दिखती है लेकिन अधर्म अनाचार के खात्मे के लिए क्या किया जाना उचित होगा, ऐसा क्या किया जाना जरूरी है जिससे समाज से आसुरी शक्तियो का प्रभुत्व खत्म हो इसके बारे में कोई तर्क नहीं है। बार बार स्त्री की शुद्धता और जाति की शुद्धता का ही तर्क है उसके पास। इस प्रकार उसकी अहिंसा में अनाचारी के हिंसा के प्रतिकार का कोई रास्ता नहीं है, बल्कि उसके सामने समर्पण की वकालत ही उसका तर्क है। 

    इसी प्रकार अर्जुन की नजर बृहत्तर समाज के बृहत कल्याण पर नहीं है बल्कि उसे कुल की रक्षा समाज की रक्षा से ज्यादा जरूरी लग रहा है।

       यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जो स्वार्थ के अधीन होकर सिर्फ और सिर्फ अपना, अपने परिवार के कल्याण के बारे में सोचता है भले कुल की कीमत पर समाज को हानि ही क्यों न उठानी पड़े
     सब तर्क देकर दुख के साथ अपना विचार प्रकट करता है कि--

    एक कि वो बुद्धिमान है, दूसरे कि बुद्धिमान होकर भी राज पाट के लोभ और सुख के लोभ में वे लोग अपने ही कुटुम्बियों और मित्रों को मारने पर उतारू हो गए हैं, और अंत में तीसरा और अंतिम की बुद्धिमान होकर भी इन लोभों के कारण बहुत भारी पाप करने जा रहें हैं।

     निश्चित रूप से बुद्धिमान को इस प्रकार के लोभ नहीं ही करने चाहिए और यदि इसप्रकार के लोभ के फेरे में कोई पड़ता है तो वह पाप ही करता है जो उसे नहीं करना चाहिए।  अब सवाल उठता है कि अर्जुन किस तरह से तय कर लेता है कि वो बुद्धिमान है ही। अब तक तो श्रीकृष्ण जिनको वो अपना ज्ञान दे रहा है एकदम चुप हैं, सिर्फ उसकी सुन रहें हैं। तो क्या यदि हमारे तर्क को कोई सुन भर ले तो हम बुद्धिमान हो जाएंगे? तय है कि नहीं। फिर भी अर्जुन को अपनी बुद्धि के बारे में ये गलतफहमी हो गई है। जब हम कुछ जानते ही नहीं तो बड़ा ज्ञानी होने का दम्भ भरने से बाज नहीं आते। जब तर्क खत्म हो जाता है तो सिर्फ गाल बजाना ही बाकी रह जाता है कि हम तो बुद्ध हो गए हैं, हमसे कोई क्या बात करेगा हम तो ज्ञान के भंडार है।  

          अब देखते हैं कि अर्जुन को क्या गलत लगता है। उसे लगता है कि युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्ष सिर्फ राज पाट हथियाने के लिए लड़ने कटने आ गए हैं। उसे युद्ध का लक्ष्य  सम्पत्ति और सुख प्राप्ति ही लगता है, उसे कौरव पक्ष और पांडव पक्ष के उद्देश्य एक से लगते हैं। निश्चित रूप से ये एक भ्रम की स्थिति है। जब हम खुद के अंदर की अच्छाई और बुराई में फर्क नहीं कर पाएं तो तय है कि हम दिग्भ्रमित हो गए हैं और   भ्रम के असर से सही और गलत, न्याय और अन्याय के फर्क को समझना भूल जाते हैं। इस अवस्था में कोई भी आदमी जब होता है, चाहे वो अर्जुन ही क्यों न हो उसे यही नहीं पता चलता कि उसका दायित्व क्या है, उसकी अपनी भूमिका क्या है, उसे क्या करना और क्या नहीं करना है। तब ऐसा इंसान मूर्खता पर उतर आता है। लेकिन कोई भला अपने को मूर्ख क्यों मान ले, सो खुद को बुद्धिमान ही कहता फिरता है। आये दिन हम अपने समाज में देखते हैं कि लोग ऐसी बेवकूफियाँ करते ही हैं। जब हम आप खुद के अंदर के गुण अवगुण को नहीं समझ पाएंगे तो निश्चित है कि इसी तरह से व्यवहार करेंगे। 

पाप और पुण्य को समझने के पूर्व कर्म के पीछे की मंशा को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। एक स्त्री हरण रावण ने किया, एक स्त्रिहरण खुद अर्जुन ने भी किया, और एक स्त्रिहरण श्रीकृष्ण ने भी किया। अब यदि मात्र स्त्री हरण की बात की जाए तो तीनों का दोष एक समान लगेगा। लेकिन तीनों के इन क्रियाओं के पीछे की परिस्थिति पर विचार करेंगे तो भिन्न भिन्न स्थिति पाएंगे।  इस बात को समझने के लिए अच्छे बुरे की समझ की आवश्यकता होती है। युद्ध या कोई भी अन्य कार्य जरूरी भी हो सकता है और गैर जरूरी भी।  लेकिन देखने समझने की बात है कि वास्तव में हम किस गुण या अवगुण से प्रेरित होकर उस क्रिया विशेष को करते हैं। अर्जुन ने अपने युद्ध को जिन कारणों से गलत और पापयुक्त कहा है, उन कारणों को स्वीकारने में किसी को भी दिक्कत है। जैसे अर्जुन के मुख्य तर्क हैं

  1.कुल की रक्षा अनिवार्य है।

   2.कुल की रक्षा के लिए कुल के  आतताई सदस्यों को भी हानि नहीं पहुंचाना चाहिए।

   3. कुल के नाश से स्त्री शारीरिक रूप से दूषित होती है जिससे वर्णसंकर पैदा होते हैं।

   4. वर्णसंकर कुल के नाश के कारण होते हैं

   5. इससे जाति व्यवस्था टूटती है।

    6. कुल के नाश से कुलधर्म का नाश हो जाता है।

    7.कुलधर्म ही सनातन धर्म है, और इस कारण युद्ध से सनातन धर्म नष्ट हो जाएगा।

   अब युद्ध के विरुद्ध इतने बेसिर पैर के तर्क को देकर अर्जुन खुद को बुद्धिमान भी घोषित कर देता है।

      हर जगह, लोग मूर्खता को ज्ञान और अनाचार को धर्म का नाम देकर ही ढकने की कोशिश करते हैं और एक अति अज्ञानी और दम्भी इंसान का आचरण का उदाहरण है अर्जुन का व्यवहार।
भ्रमित और अज्ञानी के  सारे तर्कों से जब काम नहीं चलता तो अंत में तीन तर्क बचते हैं, एक धर्म की आड़ में अधर्म की राह चुनना, आदर्श की आड़ में अनाचार की रक्षा करना और अंत में अहिंसा के नाम पर आत्महन्ता बन जाना। पहले दो तर्क तो अर्जुन आजमा चुका है लेकिन श्रीकृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। तब उस बच्चे की तरह जो अपना मनमाफिक खिलौना नहीं मिलने पर फर्श पर ही अपना सिर पीटने लगता है, अब अर्जुन उसी हरकत पर उतर आता है। अभी तक तो वह धर्म की दुहाई कर दुर्योधन से लड़ने से इनकार कर रहा था। अब एक कदम आगे बढ़कर अहिंसा की प्रतिमूर्ति बनने का स्वांग करता हुआ कहता है कि यदि कौरव पक्ष के लोग उस निहत्थे अर्जुन को मार भी देंगे तो भी अर्जुन यही मानेगा कि युद्ध के मुकाबले ये ज्यादा कल्याणकारी है।

      हम सब के मन में जीतने की ईक्षा होती है। यह प्रसंग युद्ध का है लेकिन हर प्रसंग में हम जीतना चाहते हैं। लेकिन जीत के लिए जब हम वास्तविक कर्म के मैदान में उतरते हैं तब हमें पता चलता है कि इस अपेक्षित और इक्षित जीत के लिए तकनीकी जानकारी के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कौशल की जरूरत होती है। अगर वो कौशल नहीं है तो आप तमाम तकनीकी जानकारियों के भी सफलता नहीं प्राप्त कर पाते। हो सकता है कि किसी लक्ष्य को पाने की तमाम तकनीकी जानकारी तो है आपके पास लेकिन जो मानसिक और आत्मिक कौशल चाहिए , जो साहस और सूझ बुझ चाहिए वह नहीं है तो जीतने और लक्ष्य को पाने की बात तो दूर ,आप वह कार्य शुरू ही नहीं कर पाएँ। 

     जब आप ऐसा नहीं कर पाते तब आपको अपनी झेंप मिटानी होती है। आपको दिखाना होता है कि आपके तकनीकी गुण पूर्ण हैं , आपमें किसी भी मानसिक कौशल का अभाव भी नहीं है लेकिन आप मानवता की सेवा के लिए ये सब त्याग देना चाहते हैं, कर्म छोड़कर मृत्यु की वरण करना उचित समझते हैं।  युद्ध की स्थिति या युद्ध जैसी स्थिति में आप इसे अहिंसा का नाम देते हैं। आप दिखाना चाहते हैं कि आप किसी का रक्त नहीं बहाना चाहते क्योंकि यह आपके धर्म के विपरीत है , मानवता के विरुद्ध है सो आप अपनी जान देकर चाहते हैं कि आप युद्ध रोकने का प्रयास कर अमर बन जाएं। 

     ये सोच भले ही समाज और व्यक्ति दोनों के लिए खतरनाक होती है किंतु भ्रम से भ्रष्ट बुद्धि समस्या का निराकरण करने में जब असमर्थ होती है तो व्यक्तिअपनी असमर्थता छुपाने वास्ते  आत्मबलिदान की मिसाल देने का ढोंग करता है। अपनी असफलता, अपने भ्रम से ऐसा इंसान जो क्षति समाज को पहुँचाता है वो इतना बड़ा होता है कि उसका आकलन करना भी मुश्किल होता है। अर्जुन के पास अब कुछ भी ऐसा सार्थक नहीं है जो वह कह सके सो आत्म बलिदान की या सही कहें हो आत्महत्या की बात करता है ताकि श्रीकृष्ण अब भी पिघल जाएं और उसे मानव इतिहास का सबसे बड़ा अपराधी होने से बचा लें।

        ध्यान दें अब तक के पूरे प्रसंग में अर्जुन शत्रु पक्ष की शक्ति से कँही भी डरा हुआ नहीं दिखता। वो डरता है तो धर्म की  अपनी गलत समझ से। जब हम सही और गलत को नहीं समझ पाते, जब हमारी बुराई हमारी अच्छाई पर भारी पड़ने लगती है तो विवेक नष्ट होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम ये  नहीं समझ पाते कि न्याय, धर्म, सत्य और अहिंसा अन्याय, अधर्म, असत्य और हिंसा से किस प्रकार भिन्न है। सो दिग्भ्रमित मन कमजोर पड़ जाता है, आत्मविश्वास डीग जाता है, और मन व्यथित और व्याकुल होकर अनर्गल निर्णय लेने लगता है। महाभारत का युद्ध बाहरी तो बहुत बाद का है, मानसिक और आत्मिक बहुत पहले से है। मन और आत्मा के स्तर पर जो इस युद्ध को जीतेगा बाहरी मैदान भी वही जीतेगा। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उस लक्ष्य के अनुरूप तकनीकी ज्ञान तो अनिवार्य है लेकिन वह तकनीकी ज्ञान तभी परिणाम देगा जब आत्मिक बल मजबूत है और आत्मिक बल तभी मजबूत होगा जब आपके अंदर आपके दैवी गुण उत्कृष्ट अवस्था में हैं।
प्रथम अध्याय का अंत आते आते अर्जुन बिना मैदान में लड़े थक कर शस्त्र रखकर शोक से बैठ जाता है। आपने अपना कर्तव्य अभी शुरू ही नहीं किया और हारे हारे से हो गए। ऐसा होता ही है। जीवन में कई अवसर ऐसे आते हैं जब आपको कुछ करना होता है, लेकिन जब आप उस काम पर निकलने वाले हैं तभी आपके मन में उस कार्य को लेकर संशय हो जाता है, आप समझ नहीं पाते कि उस कार्य को करें या न करें। आप तय नहीं कर पाते कि आपका कर्तव्य क्या है। आप अपनी भूमिका समझने से चूकने लगते हैं। मन उद्विग्न हो जाता, खिन्न हो जाता है। आप तो सभी को बता कर निकले थे कि मैं फलाना कार्य पर जा रहा हूँ और आप फँस गए अपने ही मानसिक और आत्मिक द्वंद्व में। अब आप निर्णय नहीं ले पा रहें हैं कि क्या करें। फिर आपको लगता है कि आपसे ये कार्य नहीं होगा। लेकिन इस स्थिति का सामना कैसे कीजियेगा क्योंकि आप तो चले थे कि इस कार्य को कर ही देंगे। तब आप सहारा लेते हैं झूठ का, झूठ से ओतप्रोत तर्को का। नतीजा होता है कि आप टूटकर बिखरने लगते हैं। 

   आखिर ऐसा क्यों होता है। स्पष्ट है कि या तो आपको सामर्थ्य नहीं है , बस आपका जोश बिना कौशल का है। या फिर सामर्थ्य तो है, कार्य निष्पादन की विद्या भी है लेकिन उस कार्य को करने के लिए जिन आत्मिक कौशल या गुणों को होना चाहिए वो नहीं है। हर इंसान के अंदर दो तरह की प्रवृत्तियाँ हमेशा रहती हैं, अच्छी(दैवी) और बुरी(आसुरी)। और ये कभी विश्राम की अवस्था में नहीं रहतीं। हमेशा आपस में लड़ती रहती हैं। एक महाभारत हमेशा आपके हृदय में चलते रहता है इनके बीच। जब जब बुरी प्रवृत्तियाँ मजबूत पड़ती हैं भ्रम तेज हो उठता है, उससे मोह का प्रताप बढ़ता है। नतीजा में बुद्धि और विवेक का ह्रास होने लगता है और धर्म, न्याय, सदाचार, और सत्य के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो जाती है। तब आसुरी निर्णय ही होते हैं। परिणाम में आदमी मन से थकने लग जाता है। आखिर अर्जुन अपने समय का सर्वक्षेष्ठ योद्धा है। उसके रणकौशल के बराबर कोई दूसरा नहीं है। एक बार तो उसने अकेले ही विराट के युद्ध में समस्त कौरव सेना को पराजित भी कर दिया था। अब जबकि वह अपनी विशाल सेना और श्रीकृष्ण के साथ कौरवों के विरुद्ध युद्ध के मैदान में खड़ा होकर शँख बजाकर युद्ध लड़ने की ईक्षा को जाहिर कर चुका है अचानक परिवार मोह में पड़ जाता है और फिर तो शुरू कर देता है युद्ध के विरुद्ध कुतर्क करना। लेकिन उसे अपने कुतर्को के प्रति श्रीकृष्ण का समर्थन नहीं मिल पाता। सो अपनी आसुरी प्रवृत्तियों के बोझ से वो थक जाता है। वह जो भी तर्क देता है खुद उन्हीं से संतुष्ट भी नहीं होता है। नतीजा शोक में डूब जाता है और शस्त्र छोड़कर बैठ जाता है।  जब भी इंसान की आसुरी शक्तियाँ मजबूत होती हैं इंसान खुद की अच्छाई को गंवा कर खुद से हार कर शोकाकुल हो मूर्क्षित सा हो जाता है। आप ही देखिए जिस अर्जुन को कभी भी युद्ध में कोई नहीं हरा सका था आज अपनी बुराई के सामबे  बिना लड़े लड़ाई के  कल्पित परिणामों से डर कर युद्ध छोड़कर भाग रहा है। जब भी आपको अपने कर्तव्य के उद्देश्य के बारे में भ्रम होगा आप कर्तव्य पूरा कर ही नहीं सकते। ये अकाट्य सत्य है जो सार्वभौमिक है। जँहा आप अपने कर्तव्य के परिणामों के चक्कर में पड़े, सम्बावित परिणामों के भय से आप जी हीं नहीं पाएंगे। अर्जुन को  युद्ध का उद्देश्य स्पष्ट  नहीं हो पा रहा है और  परिणाम की चिंता खाये जा रही है। नतीजा है बिना लड़े पराजय। "मन के हारे हार है मन के जीते जीत, करता चल पुरुषार्थ तू काहे है भयभीत।" 

    इस प्रकार श्रीमद्भागवद गीता का प्रथम अध्याय अर्जुन की निराशा पर आकर खत्म होता है। और यंही से प्रारंभ होती है गीता की यात्रा, योगेश्वर श्रीकृष्ण की वो शिक्षा जो आपको अद्भुत शक्ति प्रदान करती है, आप खोज पाते हैं कि आप कौन हैं, आपका क्या कर्तव्य है, उस कर्तव्य को कैसे पूरा करना है, स्वयं और समाज के प्रति आपकी क्या भूमिका है , उसे कैसे निभाना है और आपका अंतिम लक्ष्य क्या है। आप समझ पाते हैं कि बिना परिणाम  की चिंता किये अपना कर्तव्य कैसे पूरा करेंगे। 

         श्रीमद्भगवद गीता आपको धर्म के मार्ग पर चलकर कर्तव्य निर्वाहन का क्रियात्मक प्रशिक्षण देती है।
     किसी विषय का बड़ा से बड़ा जानकार, बहुत बड़ा विद्वान, व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत सफल आदमी भी जीवन में लड़खड़ा जाता है। आप अपने पारिवारिक, छात्र या व्यवसायिक जीवन में अचानक पाते हैं कि आप किसी बड़ी परेशानी में आ गए। ऐसा होता क्यों है कि बहुत ही जानकार आदमी भी समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या है? और दूसरे आपके टूटे हुए मनोभाव  को समझ जाते हैं? युद्ध कला में अर्जुन की कोई सानी नहीं। बड़े बड़े योद्धाओं को उसने पूर्व में पराजित भी किया है। उसकी धनुर्विद्या का लोहा सब मानते हैं। जीवन में उसने कई बुरे अनुभव भी पाए हैं और अपनी विद्या के बल पर, अपने सामर्थ्य के बल पर नाम भी खूब कमाया है लेकिन चिर प्रतीक्षित युद्ध जिसमें उसे बहुत कुछ करना है में आते लड़खड़ा जाता है। और लड़खड़ाता भी ऐसा है कि संजय भी समझ जाता है कि अर्जुन बुरी तरह व्यथित, दुखी और अनिर्णय की स्थिति में है, यानी उसकी दयनीय हालत जगजाहिर है, ठीक वैसे ही जैसे हम मुँह लटका कर बैठे हों और हर कोई समझ लेता है कि हम तो हैरान परेशान हैं , समझ ही नहीं पा रहें हैं कि आखिर करना क्या है।  अर्जुन की युद्ध में ये हालत विरोधियों और अपने पक्ष में लड़ने आये उन लोगों को देख कर होती है जिनको वो शत्रु या मित्र की तरह नहीं देखता, जिनको वो धर्म और अधर्म के रक्षकों की तरह नहीं देखता बल्कि उनको परिजनों, गुरुजनों और मित्रजनों की तरह देखता है।  अर्जुन की कमी व्यवसायिक ज्ञान यानी उज़के मामले में युद्ध कौशल में कमी नहीं है, उस कार्य में वह पूर्ण दक्ष है लेकिन सही गलत , अच्छा बुरा, धर्म अधर्म, न्याय अन्याय की समझ समाप्त होना उसकी कमी है। उसकी कमी है उसकी अच्छाई पर उसकी बुराई यानी भ्रम, मोह, असत्य आदि का हावी होना।  यही हाल हर उस इंसान का होता है जो अपनी बुराई को खुद पर हावी होने देता है।  उस समय आपकी व्यवसायिक दक्षता धरी की धरी रह जाती है।

जब भी कोई कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं और सही और गलत, जैसे धर्म और अधर्म/सत्य और असत्य/न्याय और अन्याय/सदाचार और अनाचार के अंतर को भूलकर अन्य बाहरी स्थितियों के प्रभाव मैं आ जाते हैं हम विचलित, दुखी और असहाय हो कर दुखी स्थिति में पहुँच जाते हैं , निर्णय नहीं ले पाते। घर हो विद्यालय हो, समाज हो या हमारे नौकरी पेशा की जगह हो कँही भी हम यदि अपने से बाहरी माहौल से यदि प्रभावित होकर व्यवहार करने लगते हैं तो हमारा व्यवहार हमारी क्षमता के अनुसार नहीं होकर बाहरी कारणों से प्रभावित होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम एक मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगते हैं। एक बहुत काबिल सर्जन आपके अपेंडिक्स का ऑपरेशन करने वाला है और चीरा लगाने के पश्चात उसके मन में अपेंडिक्स के प्रति मोह जागृत हो जाये कि ये अपेंडिक्स तो बेचारा शरीर में जन्म से ही है तो वो इसे क्यों हटाने की कोशिश करने में लगा है, तब उस सर्जन के मन में बीमार वयक्ति की वृहत्त अच्छाई के बदले पेट दर्द का कारण बने अपेंडिक्स के प्रति करुणा का उतपन्न होना उस बीमार का अहित कर देगा। करुणा दर्द से पीड़ित के प्रति न होकर दर्द के कारण के प्रति होना  भ्रम है और इस भ्रम से नुकसान उस व्यक्ति का है जो बीमार है। 

      इस प्रकार से विचलित मन ही चाहे वो जिसका हो एक मनोरोगी  का ही है। सब सामर्थ्य रहते हुए भी मन की पीड़ा के कारण कार्य नहीं हो पा रहा है। ऐसी अवस्था में गुरु कौन हो सकता है, मार्गदर्शक कौन बन सकता है? वह जो इस तरह के दुष्ट मनोभाव को नष्ट करता हो। श्रीकृष्ण ने मधु नाम के राक्षस का वध किया था सो मधुसूदन कहलाये। आपके अंदर के इस भ्रम रूपी राक्षस को मारने वाले में मधुसूदन की क्षमता होनी जरूरी है, यानी आपके गलत विचारों के नाश करने की ताकत और समझ होनी जरूरी है। हर कोई हमारी इस मनोदशा को खत्म भी नहीं कर सकता।

    सो  हम सभी को चाहे हम जिस आयु वर्ग में हों, चाहे हमारी कोई भी पृष्ठभूमि हो हम सब को चाहिए कि अपनी बाहरी परिस्थितियों का आकलन करते समय हम उन्हीं से प्रभावित होकर अपना सयम खो कर सही गलत समझने की अपनी क्षमता ही नहीं खो दें।
        तरह तरह से युद्ध के विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा था, और अपने ही तर्कों में बुरी तरह उलझा उसका मन व्यथित हो जाता है। परंतु श्री कृष्ण कुछ बोल नहीं रहें है, चुपचाप ध्यान से उसकी बात को सुन रहें हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण  की तरफ से अपने तर्कों को सांकेतिक समर्थन भी न पाकर और भी व्यथित, दुखी और विचलित हो रहा है।

      याद करें श्रीकृष्ण प्रथम अध्याय में अर्जुन को उसी के निदेश पर दोनों  सेनाओं के मध्य ले आ कर खड़ा कर मात्र इतना ही कहें हैं कि, "पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥" यानी कि "हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख"।  उसके पश्चात अर्जुन जो भी कह रहा होता है वह उसकी मनोस्थोति है। वह जिस दृष्टिकोण से युद्ध को देख रहा होता है उसी के अनुसार उसकी मनःस्थिति हो रही है। उसका दृष्टिकोण तात्कालिक परिस्थितियों पर उसकी समझ की व्याख्या है। हम जो समझते हैं, परिस्थितितियों का आकलन करते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कितने विवेक से अपने दैवी गुणों अथवा अपने आसुरी गुणों के अनुसार उपयोग में लाते हैं। एक ही परिस्थिति को अलग अलग इंसान अपने अलग अलग दृष्टिकोण की वजह से अलग अलग तरह से देखते हैं। जब हम परिस्थिति का आकलन/मूल्यांकन अपने भ्रम, मोह, असत्य, अहंकार के अनुसार करते हैं तो वह परिस्थिति प्रतिकूल नजर आती है, जबकि यदि उसी को यदि हम विवेक, स्तय, न्याय आदि की दृष्टि से देखते हैं तो उस परिस्थिति को हम अपने अनुकूल पाते हैं।

        जब हम भ्रम में मनोरोग की अवस्था तक चले जाते हैं तो मनोचिकित्सक शॉक ट्रीटमेंट देता है, ठीक वही शॉक ट्रीटमेंट श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहें हैं। 

        इंसान का भ्रम उसकी कमजोरी है। भ्रम से उतपन्न मोह अविवेक को बढ़ाता है। इस अवस्था में हम अपने ही ज्ञान को भूल जाते हैं। तब हम जो करते हैं वह हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के लिए हानिकारक ही होता है। यह परिस्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में उतपन्न हो सकती है। जैसे ही हम भ्रम और भ्रम जनित मोह में फंसते हैं हम अपना ही भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों बिगाड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।  

      एक ज्ञानी व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह खराब स्थिति को भी अपनी समझ से अनुकूल कर सकता है लेकिन अज्ञानी तो अनुकूल को भी प्रतिकूल कर सब का नाश कर देता है। यँहा देखते हैं कि श्री कृष्ण अर्जुन के सारे तर्कों यथा कुलधर्म ही सनातन धर्म है, कुलधर्म नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट होगा, समाज में वर्णसंकर पैदा होंगे जो पितरों को रुष्ट करेंगे आदि आदि को श्रीकृष्ण एक झटके से नकार देते हैं और अर्जुन की भर्त्सना करते कहते हैं कि ये सब तर्क अज्ञान हैं जो मोह से उतपन्न है। मोह से इंसान का अतीत, वर्तमान और भावी तीनों खराब होता है। हर इंसान तीन बातों से उत्प्रेरित होकर अपना कार्य करता है। वह चाहता है कि उसके कार्यों से उसके खानदान का नाम रौशन हो (अतीत) , उसका  नाम रौशन हो(वर्तमान) और उसका और उसकी आने वाली पीढियीं को अच्छी व्यवस्था मिले(भविष्य)। लेकिन मोह और भ्रम वश जो कार्य किये जाते हैं उनसे ये तीनों लक्ष्य पूरे नहीं होते हैं। अन्याय एवम अनाचार को सहना अज्ञान ही है । जीवन की किसी भी परिस्थिति में जब हमारा कार्य मोह और भ्रम से उतपन्न मनोभाव पर आधारित होता है तो फिर वह निर्णय उचित नही होता है। परिवार के मामले हों , व्यवसाय के मामले हों, सामाजिक मामले हों , छात्र जीवन के मामले हों या फिर कुछ और, जब हम अपना कर्तव्य व्यक्ति/वस्तु/विचार  विशेष के प्रति मोह  से निर्धारित करते हैं तो फिर हमारा वो कर्तव्य हमें रास्ते से भटकाने वाला होता है, जिसके परिणाम में हम लक्ष्य से भटक जाते हैं। आसुरी गुण यानी भ्रम और मोह से किसी भी व्यक्ति का चरित्र यानी उसकी अपनी शख्सियत यानी उसका अपना स्व(सेल्फ) समाप्त हो जाता है और वह उटपटांग और आत्मघाती निर्णय लेता है।

    ध्यान दें कि श्रीकृष्ण के कथन को गीताकार ने भगवान उवाच का नाम दिया है, न कि श्रीकृष्ण उवाच। अर्थात गीताकार का मानना है कि श्रीकृष्ण उसी स्तर के साधक हैं जिस स्तर पर ईश्वर स्वम् हैं।  श्रीकृष्ण उस समस्त ज्ञान, विभूति और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं जिसे प्राप्त कर इंसान हर चीज को साध लेता है।

     श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि , एक तो हमें भ्रम और मोह के प्रभाव में निर्णय नहीं लेना चाहिए। दूसरे कि हमें अन्याय , अनाचार का समर्थन नहीं करना चाहिए। तीसरे कि हमें कुरूतियों से बचना चाहिए। चौथा जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वो ये है कि व्यक्ति का सेल्फ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति का आकलन उसके कार्यों के अनुसार होता है न कि उसके साथ हमारे सम्बन्ध से। इसी प्रकार किसी भी स्थिति में स्थूल का महत्व उसके द्वारा किये गए कार्य के मूल्यांकन से होता है। किसी भी स्थिति में हमें चाहिए कि हम अपने विवेक पर माया , मोह, भ्रम को हावी नहीं होने दें क्योंकि इससे हमारी स्वाभाविक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और तब हम निराशा में डूब जाते हैं।
      श्रीकृष्ण अपनी बात आगे बढाते हुए अर्जुन को  चार बातें कहते कहते हैं

     ---नपुंसकता को मत प्राप्त हो

     ----नपुंसकता तुम्हारे लिए उचित नहीं है

     ----- हृदय की दुर्बलता को छोड़ो

     -------युद्ध के लिए उठ खड़े हो जाओ

         अर्जुन युद्ध नहीं करने के तमाम तर्क प्रस्तुत कर चुका है।  बन्धु बाँधवों से युद्ध करना, भले ही वो आतताई ही क्यों न हों, उचित नहीं , क्योंकि इससे कुलधर्म यानी सनातन धर्म नष्ट होगा, स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर जनमेंगे जिससे पितर नाराज होंगे, जो सम्पत्ति और राज मिलेगा उसे साथ  भोगने वाले बन्धु और मित्र नहीं होंगे आदि आदि उसके तर्क रहें हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की सोच नपुंसकता दर्शाती है जो अर्जुन जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। ये हृदय की कमजोरी की निशानी हैं सो अर्जुन का आह्वान करते हैं कि इसे छोड़कर वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाये।

        विषयगत प्रसंग युद्ध का है सो चर्चा युद्ध की है। जैसा हम देख चुके हैं कि हर परिस्थिति में जब भ्रम और मोह हावी होते हैं तो विवेक नष्ट होता है जिससे निर्णय लेने की हमारी क्षमता प्रभावित हो जाती है। कार्य करने की तमाम तकनीकी योग्यता और ज्ञान रहने के बावजूद हम कार्य करने से भागते हैं क्योंकि हम मानसिक तौर पर उस कार्य को करने के योग्य नही रह जाते, भ्रम और मोह जनित मनोविकारों के। तब हम बहाने बनाने लगते हैं। परिवार, व्यवसाय, छात्र जीवन, समाज हर जगह लोग इस बीमारी के शिकार बराबर होते रहते हैं। ऐसे ही लोगों को श्रीकृष्ण सम्बोधित कर रहें हैं। अर्जुन तो शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं है तब श्री कृष्ण उससे नपुंसक बनने की बात भला क्यों कहते हैं। नपुंसकता तो यही है कि जिस कार्य को करने के लिए आपको स्वाभाविक रूप से सक्षम होना होता है उसी में आप अक्षमता का प्रदर्शन कर रहें हैं। जैसे सैनिक लड़ने से डरे, छात्र पढ़ने से भागे, व्यवसायी का मन व्यवसाय में न लगे तो ये सभी उनके स्वाभाविक गुण से भिन्न ही तो है।।निर्धारित भूमिका को निभाने की अक्षमता ही नपुंसकता है क्योंकि इस अक्षमता से आगे बढ़ पाने का रास्ता बन्द हो जाता है।  ये आता कँहा से है? जब हम अपने सेल्फ यानी स्व को नहीं पहचानते यानी अपनी ही आत्मा को जानने से इनकार कर देते हैं तो नपुंसकता का जन्म होता है। अर्जुन युद्ध भूमि में अन्याय अधर्म का प्रतिकार करने आया है और लगता है आतताइयों की रक्षा का उपाय करने। तो स्वाभाविक है कि यह तो नपुंसकता ही है। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा है कि हमें कभी भी अपने निर्धारित कर्तव्य से नहीं मुँह मोड़ कर भागना चाहिए चाहे जीवन का कोई भी प्रसंग हो। यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हमें उस कार्य को करने की पूर्ण तकनीकी योग्यता और सामर्थ्य भी हो। इसीलिए ये आचरण हमारे अनुकूल नहीं होता। अर्जुन तो युद्ध विद्या के साथ साथ शास्त्रों का भी ज्ञाता है, पूर्व में कई बार अपनी योग्यता का परिचय दे चुका है , उसे पता है कि उसकी क्षमताएँ क्या हैं तो फिर नपुंसकता का आचरण उसके लिए कैसे अपेक्षित हो सकता है। इस प्रकार श्री कृष्ण अर्जुन को उसके सेल्फ की याद दिलाने की कोशिश करते हैं।  

     फिर हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके तर्कों और उसके मनोभावों को क्षुद्र यानी नीच श्रेणी का मानते हैं  और इसे उसकी हृदय की दुर्बलता कहते हैं। विवेक और भावना दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं जो हमारे कार्य करने की प्रवृत्ति को निर्धारित करते हैं। जब विवेक से लिये गए निर्णय में भावना को भी स्थान मिलता है और  भावना भी विवेक से संचालित होती है तो  फिर हम संयमित निर्णय पर पहुंचते हैं। लेकिन यदि ये दोनों अपनी मात्रा में असन्तुलित हो जाते हैं तो फिर हमारा निर्णय, कार्यप्रणाली भी असंयमित हो जाती है। यही हमारे हृदय की दुर्बलता है, यही हमारी नीचता है। उदाहरण स्वरूप  जीवन में अधर्म, अन्याय के पक्ष में खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और अनुराग अहिंसा नहीं नीचता है , ज्यादा अंको के लिए छात्र का चोरी करते पकड़ कर उसे अपना सम्बन्धी जानकर छोड़ देना नीचता है, एक अपराधी को अपने लाभ के लोभ में बख्शना नीचता है। यही नीचता हमारी दुर्बलता का परिचायक है। श्री कृष्ण इस नीचता से उबरने की सलाह देते हैं।

    और तब कहते हैं कि नपनुसकता और हृदय की नीचता को छोड़कर अर्जुन यानी हम सब खड़े हो जाएं, हताश न हों और युद्ध करें यानी अपने कर्तव्य निर्वाहन के लिए तैयार हो जाएं। 

         जीवन में जब कभी भी हमें लगे कि हमें अपने दायित्वों को निभाने में हिचक, निराशा, भय हो रहा है तब तब हमें स्मरण करनस चाहिए कि हम वास्तव में क्या हैं, हमारी क्षमताएँ क्या हैं और हमें श्री कृष्ण की इस शिक्षा को याद कर आगे बढ़ना चाहिए।
      श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को समझाना चाहा है तो अर्जुन पुनः प्रतिवाद करता है और वह स्पष्ट कहता है कि चूँकि भीष्म और द्रोण उसके लिए पूजनीय हैं सो वह उनसे युद्ध नहीं कर सकता है। श्रीकृष्ण को वह मधुसूदन और अरिसूदन नामों से सम्बोधित करता है जिसका अर्थ होता है शत्रुओं का नाश करने वाला। उसका तर्क है कि  आप तो शत्रुहन्ता हैं , शत्रुओं को मारने वाले हैं लेकिन भीष्म मेरे पितामह और द्रोण गुरु हैं मेरे जो मेरे लिए पूजनीय हैं तो भला मैं उनसे कैसे युद्ध कर सकता हूँ। अर्जुन कोई नई बात नहीं कह रहा है, बस अपने पुराने तर्कों को दुहरा रहा है। श्रीकृष्ण के समझाने का स्पष्ट रूप से उसपर कोई असर नहीं हुआ है। जब हम सामने वाले को अपने ही स्तर का समझदार समझते हैं तो उसकी सलाह भी नहीं मानते। अगर वो कुछ कहता भी है तो उसकी समझ को ही चुनौती दे डालते हैं। जब तक आप अपने सलाहकार की बुद्धि पर भरोसा नहीं करते उसके सुझाव को नहीं मान सकते। तभी तो श्रीकृष्ण के कठोर वचनों को भी अर्जुन गम्भीरता से नहीं लेकर अपने पुराने तर्क ही प्रस्तुत कर देता है। 

     हमारा मन उसी को सत्य मानता है जो हम बचपन से देखते सुनते समझते आये हैं। जो नीति अनीति सीखे हैं उससे बाहर की बात सुनना हमें मंजूर नहीं होता भले समझाने वाला कितना भी ज्ञानी क्यों न हो।

      बड़ों का और गुरु का सम्मान कँही से भी गलत नहीं सो एक दफा तो लगता है कि अर्जुन ठीक ही कह रहा है कि वह भला पितामह और गुरु से कैसे लड़े।  लेकिन ध्यान देने की बात है कि पितामह और गुरु एक पद हैं जो किसी व्यक्ति के द्वारा किसी समय विशेष में धारित किये जाते हैं। अगर किसी अन्य समय या परिस्थिति में वही व्यक्ति किसी अन्य भूमिका में हो तो क्या वह इस पद के सम्मान का अधिकारी है?  और हमारा खुद का पद अथवा स्थिति यानी स्टेटस उस समय विशेष या परिस्थिति विशेष में क्या पहले वाला ही है? वंश परम्परा में भीष्म अर्जुन के पितामह तो हैं, गुरु शिष्य परम्परा में द्रोण उसके गुरु भी हैं लेकिन जब भीष-द्रोण एक पक्ष ले कर एक सेना के साथ आ गए और अर्जुन एक अन्य पक्ष लेकर दूसरी सेना में आ गया और दोनों पक्षों के उद्देश्य, मान मर्यादा भिन्न हो गए तो क्या पुराने सम्बन्धों के अनुसार ही वर्तमान सत्य का निर्धारण हो पाना सम्भव है?  हर परिस्थिति में हमारी भूमिका बदल जाती है। भीष्म और द्रोण अधर्म, असत्य, अनाचार, अन्याय का पक्ष ले चुके हैं। उन्होंने अपनी भूमिका तय कर ली है कि वे दुर्योधन के अनाचार के समर्थन में पांडवों के सत्य, न्याय के आग्रह का विरोध करेंगे ही तो क्या सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े अर्जुन को इस बात की आजादी हो सकती है कि वह अपने सत्य और न्याय के आग्रह को छोड़कर भीष्म और द्रोण की पूजा सिर्फ इसलिए करे कि वे पितामह हैं, वे गुरु हैं?  इतनी समझ अर्जुन को क्यों नहीं आ रही है?

   जीवन में यही असमंजस हमें परिस्थिति के सत्य से विचलित कर देती है। और हम नहीं जानते हुए भी गलत के साथ खड़े हो जाते हैं। भ्रम से उपजे ज्ञान में अहंकार की मात्रा सबसे अधिक होती है। इस अहंकार की धुंध में सच नहीं सूझता और हम अपनी रूढ़ियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते। उसी रूढ़ि की वजह से हम नहीं समझ पाते कि हमारा विस्तार परिवार और परिवारजन्य संस्थाओं और मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है। मूल बात सम्बन्धों से नहीं तय होते बल्कि मूल बात तय होते हैं सत्य के प्रति हमारे आग्रह से। रक्त सम्बन्ध से सत्य तय नही होते, मित्रता और सम्मान के सम्बन्धों से सत्य नहीं तय होते। सत्य तो शाश्वत है, ये हमपर निर्भर करता है कि हम किधर जाना तय करते हैं। एक बलात्कारी सम्बन्धी का समान आवश्यक है या पीड़िता के पक्ष में खड़ा सत्य है ये हमें तय करना होता है। हमारे इसी निर्णय से तय होता है कि समाज में भविष्य में शांति होगी या अशांति, अनाचार फैलेगा या सदाचार। यदि हम भ्रम और अहंकार से निकल कर अपने को सदाचार, सत्य, , न्याय के प्रति समर्पित करेंगे तो हो सकता है कि हमें उन लोगों के खिलाफ भी खड़ा होना हो जो हमारे प्रिये तो हैं लेकिन असत्य और अन्याय अनाचार के साथ खड़े हैं। ये तय करने की जबाबदेही हमारी है कि हम व्यक्ति और व्यक्तिगत सम्बन्धों को ज्यादा महत्व देंगे या फिर उस  सत्य को जिससे समाज में न्याय की स्थापना होने में मदद मिलेगी। ये तय तभी कर पाते हैं जब हम भ्रम से बाहर निकल कर निर्णय लेते हैं। परिवार हो , मित्रमण्डली हो, सामाजिक या व्यवसायिक रिश्ते हों हर जगह दो पक्ष मिलते है। अब उन परिस्थितियों में ये तय करना हमारी जबाबदेही है कि हम किस पक्ष में जाते हैं। यदि क्षुद्र स्वार्थ वश हम गलत का साथ देते हैं तो अंततः स्वयम भी उसी गलत के शिकार हो जाते हैं। यदि सही का साथ देते हैं तो कुछ देर के विप्लव के पश्चात हम भी उस सामाजिक उन्नति का लाभ लेते हैं जो हमारे सत्य का साथ देने से उतपन्न होती है। लेकिन पहले भ्रम और भ्रम जनित अहंकार से तो खुद को निकालें, माया , मोह के मकड़जाल को तो तोड़ें।
    जब भी हम किसी कार्य को करने के लिए प्रवृत्त होते हैं तो उस कार्य करने का उद्देश्य हमारे मानस पटल पर स्पष्ट होना अति आवश्यक होता है अन्यथा हम विभन्न प्रकार के संशय के शिकार हो जाते हैं। यदि हमारे कार्य करने का उद्देश्य निजी और अल्पकालीन स्वार्थ होता है तो कार्य का परिणाम कुछ और निकलता है और यदि उसी कार्य का उद्देश्य व्यपक सामाजिक हित हो तो परिणाम एकदम भिन्न होता है। इसके साथ ही हमारे उद्देश्य की प्रकृति के कारण हमारे कार्य करने का उत्साह और तौर तरीके भी भिन्न हो जाते हैं। अर्जुन युद्ध में क्यों खड़ा है? क्या ये तथ्य अर्जुन को स्पष्ट है? यदि अर्जुन का उद्देश्य राज्य और राजपाट से मिलने वाले सुख भोग हैं तो बात और हो जाती है और यदि अर्जुन का उद्देश्य अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असत्य का विरोध करना होता है तो दूसरी बात होती है। अर्जुन के तर्क को देखें तो पता चलता है कि उसे लगता है कि वह तो युद्ध में मात्र राजपाट और राजपाट से मिलने वाले सुख, और भोग के लिए आया है। अगर उद्देश्य ये सब हैं तो अर्जुन का तर्क कि भीष्म और द्रोण सरीखे महान गुरुओं की हत्या कर राजपाट लेने से ज्यादा अच्छा तो भीख माँगकर जीवनयापन करना है। लेकिन क्या कुरुक्षेत्र का मैदान मात्र आपसी वैर का हिसाब किताब करने के लिए सजा है? आखिर इतने बड़े युद्ध का उद्देष्य क्या है? यही प्रश्न जीवन में हर घड़ी हम सब के सामने है। हम क्यों कुछ कर रहें हैं? हम क्यों पढ़ाई कर रहें हैं, क्यों नौकरी व्यवसाय कर रहें हैं , क्या कँही हम नौकरी या व्यवसाय या पढ़ाई करते वक़्त निजी सफ़लता को ही अपने जीवन की सफलता असफलता का पैमाना मान रहें हैं या वृत्तर उद्देश्य के प्रति सजग भी हैं आदि आदि। इन्ही सब उद्देश्यों से हमारे आचरण की परीक्षा हर पल हो रही है। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी गतिविधि में ये प्रश्न खड़ा है। अगर हमारी दृष्टि में व्यक्तिगत लाभ ही सब कुछ है , जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य है तो उद्देश्य के प्रति हमारा आचरण भिन्न हो जाता है और यदि उद्देश्य न्याय , सदाचार, सत्य जैसा बृहत्तर है तो आचरण भिन्न होता है। कार्य की महत्ता उसके उद्देश्य से निर्धारित होती है। अर्जुन अपने उद्देश्य के सम्बंध में भ्रमित है, हम सब भी अधिकांश समय अपने जीवन के उद्देश्यों के प्रति भ्रमित ही होते हैं। कौरव अपने उद्देश्य में निजी स्वार्थ को अधिक महत्व दे रहें है जबकि युद्ध शुरू होने के पूर्व तक पांडवों के लिए राज्य से अधिक न्याय और सत्य का महत्व अधिक था। इस दृष्टिकोण से जो कौरव पक्ष में है वह अन्याय और असत्य की रक्षा के लिए खड़ा है , फिर ये बात गौण हो जाती है कि कौन गुरु है कौन पितामह है। सभी असत्य के रक्षक ही तो हैं। ऐसी स्थिति में यदि अर्जुन को सत्य और न्याय की रक्षा करनी है तो उसे भीष्म और द्रोण से भी लड़ना ही होगा। भीष्म और द्रोण गुरु या पितामह की भूमिका में नहीं हैं। वे तो अन्याय और असत्य के रक्षक की भूमिका में हैं। लड़ाई भीष्म या द्रोण से नहीं है, उनकी प्रवृत्ति और उद्देश्य से है। हमारे जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हम किसके साथ खड़े हैं आसुरी प्रवृत्तियों के साथ या दैवी प्रवृत्तियों के साथ। जब हमको इसका ज्ञान हो जाता है तो फिर हम निर्णय भी सही ले पाते हैं। अन्यथा हमारा भी हाल भ्रम में फँसे अर्जुन जैसा ही होता है, माया मोह में लिपटा एक नपुंसक और क्षुद्र प्रवृत्ति वाला इंसान!
वस्तुस्थिति की स्वीकारोक्ति ही सत्य का मार्ग दिखाती है। हम सच को तब तक नहीं जान पाते जब तक अपने झूठ को नहीं पकड़ लेते। हम आप सही रास्ते पर तब बढ़ते हैं जब हमें पता हो कि दूसरा रास्ता गलत है। लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने के ठीक पहले तक हमारे अंदर ये द्वंद्व तो रहता ही है कि न जाने कौन सा रास्ता सही है। अर्जुन तमाम तरह के तर्क देकर अब थका हुआ प्रतीत होता है। मन में उपजा भ्रम जब आपकी योग्यता  पर और आपके तकनीकी ज्ञान पर हावी होता है तो  आप अपनी योग्यता या ज्ञान के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, बल्कि भ्रम और मोह के अनुसार निर्णय लेते हैं और अनिर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। भ्रम से कार्य के परिणाम की चिंता होती है। जैसे ही आप हम परिणाम के प्रति जागरूक होते हैं, हमारी कार्य दक्षता गिरने लगती है। आप जब इस मनोस्थिति में आते हैं कि आपके फलाना काम का क्या पता क्या परिणाम निकलेगा, अच्छा होगा या बुरा तब आप उस काम को करने से हिचकिचाने लगते हैं। परिणाम की चिंता आपके ज्ञान और दक्षता पर हमेशा ही भारी पड़ जाती है। नतीजा में हम निष्क्रिय होने लगते हैं। क्रियाशीलता का स्थान कुतर्क ले लेता है। यही वह स्थिति होती है जँहा से हम दो में एक मार्ग चुन सकते हैं, भ्रम को सदा सदा के लिए मिटा भी सकते हैं और सदा सदा के लिए अपना भी सकते हैं।

      अर्जुन अब स्पष्ट रूप से मानसिक द्वंद्व के इस चरम पर पहुँचता दिख रहा है। वो साफ साफ स्वीकार करता है की  वो अनिश्चय और अनिर्णय की हालत में है, युद्ध करना या नहीं करना कौन सा मार्ग सही है उसके लिए वो नहीं समझ पा रहा है। अब तक तो वह युद्ध करने का ही विरोध कर रहा था। अब वह स्वीकार कर रहा है कि उसे नहीं पता कि युद्ध करना सही है कि नहीं करना सही है, क्योंकि परिणाम अनिश्चित है और मारना उनको है जिनके बिना(यानी भीष्म और द्रोण ) वह जीना भी नहीं चाहता। इससे स्पष्ट होता है कि 

    ---अर्जुन युद्ध से अधिक युद्ध के  परिणाम को लेकर चिंतित है और उसी सम्भावित परिणाम के अनुसार अपने कर्तव्य तय करना चाहता है, 

     --- वह युद्ध का  उद्देश्य  राज और सुख भोग की प्राप्ति समझ रहा है,

     ----सुख  भोग और राज पाट के लिए बन्धु बांधवों को मारना उसकी नजर में गलत है,

     -----इस प्रकार उसके मन में युद्ध को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियाँ हैं।

       अब आप अपने जीवन में घट रही घटनाओं की समीक्षा कीजियेगा तो पाइए कि हम जीवन का अधिकांश समय अर्जुन की तरह ही उहापोह में गंवा देते हैं। दोस्त, सम्बन्धी के कुकर्मों को जानते हुए  भी आँख बंद कर लेते हैं, उनका विरोध नहीं करते, जब कि कर्तव्य निर्वाहन का समय आता है नफा नुकसान का तराजू लेकर बैठ जाते हैं और भूल जाते हैं कि हमारे लिए क्या करना उचित है और अनुचित है।  हम सब अर्जुन की तरह दिग्भ्रमित  ही बने फिर रहें होते हैं जीवन भर। 

   लेकिन परिवर्तन का मार्ग तब खुलता है जब हमें अपने भ्रमों की स्वीकारोक्ति होती है। 
जब हमें आभास हो जाता है कि हम भ्रम में जी रहें हैं और इस भ्रम के कारण हम सही निर्णय नहीं ले पा रहें हैं तब हमारे अंदर सत्य जानने समझने की ईक्षा उतपन्न होती है और तब हम ऐसे व्यक्ति को खीजते हैं जो हमारे भ्रम को दूर कर हमें सही मार्ग दिखा सके। अर्थात तब हम गुरु की शरण खोजते हैं। जब तक ये भान नहीं होता कि हम अलग हैं परमात्मा अलग तब तक उस परम पिता परमात्मा से मिलने की उत्कंठा उतपन्न नहीं होती। जब तक हमें भ्रम का ज्ञान नहीं होता हमारे अंदर सच के प्रति अनुराग नहीं उतपन्न होता। जब ऐसा होता है तब हम ज्ञान, परमात्मा, सत्य आदि के लिए लालायित हो उठते हैं। तभी हमें गुरु यानी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो हमारेआ मार्गदर्शन कर हमें ज्ञान, सत्य और परमात्मा से मिला सके। 

     लेकिन इस स्थिति में हम आते कब हैं?  यह स्थिति तब आती है जब हम महसूस करते हैं कि हमारा ज्ञान अधूरा है, जब हम ये समझते हैं कि हमारे पास क्षमता तो है लेकिन अपने अज्ञान के कारण हम अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं कर पा रहें हैं, जब हमें लगता है कि हमारा आचरण और हमारा स्वभाव में मैंन नहीं बैठ रहा है। अर्थात जब हमें अपनी अज्ञानता, अपने भ्रम का भान होने पर ही हमारे अंदर ज्ञान, सत्य, धर्म, और परमात्मा के प्रति अनुराग होता है, उसके पहले नहीं।  परिवार, समाज, छात्र जीवन, व्यवसाय किसी भी क्षेत्र को ले लें हम तभी सत्य के प्रति , तभी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होते हैं जब हमें लगता है कि हम जो हो सकते हैं, हम जो कर सकते हैं वो वास्तव में हम हो नहीं पा रहें हैं, कर नहीं पा रहें हैं। ऐसी स्थिति में हम किसी ज्ञानी, अनुभवी की शरण में जाना चाहते हैं।  इसी तड़प से सन्मार्ग का मार्ग खुलता है। 

   युद्ध क्षेत्र में किसी पक्ष के किसी भी योद्धा को भ्रम नहीं हुआ है। भ्रम का शिकार मात्र और मात्र अर्जुन ही हुआ है जिसके टक्कर का योद्धा विरले ही है कोई। अर्जुन के अंदर अनुराग है, उसे तमाम ज्ञान और शक्ति हासिल होने के पश्चात भी अहंकार नहीं है। बल्कि उसे तो लगता है कि उसके ज्ञान और शक्ति का सही उपयोग होना चाहिए। सो उसे जितना सही लगता है उतना तर्क करता है लेकिन चूँकि उसके अंदर सत्य और धर्म के प्रति गहरी आस्था है सो वह चाहता है कि उसे वह सलाह मिल सके जिससे सत्य और धर्म का उसका मार्ग विचलित न हो। इसी कारण से उसे अपने मत पर भरोसा नहीं होता। हम सभी को भी चाहिए कि हम खुद से जरुर प्रश्न करें कि जो हम करने जा रहें हैं क्या वह सत्य और धर्म के अनुरूप होगा। 

      आखिर इस धर्म का तातपर्य है क्या। वस्तुतः धर्म कोई सम्प्रदाय नहीं। अब तक अर्जुन ने जो कुछ भी धर्म , सनातन धर्म या कुटुम्ब धर्म के बारे में कहा है यह उसकी परम्परागत सोच का  परिणाम है। लेकिन धर्म की समझ के लिए हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। आगे श्रीकृष्ण बताएंगे कि धर्म है क्या। अभी तो इतना ही समझना जरूरी है कि एक जागरूक विद्यार्थी की भाँति अर्जुन अपने ज्ञान के प्रति शंकालु है और चाहता है कि उसकी शंका का समाधान हो। जब हमारे अंदर शंका समाधान की ईक्षा उतपन्न होती है तब हम गुरु की शरण में जाते हैं।

     ध्यान दें कि अर्जुन श्रीकृष्ण से अनुरोध करता है कि वे उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें। वह श्रीकृष्ण को गुरु नहीं कहता बल्कि खुद को उनका शिष्य बताता है। अभिव्यक्ति की यह भाषा बताती है कि अर्जुन में सत्य और धर्म को, अपने कर्तव्य कों समझने और जानने की अद्भुत बेचैनी है। यही बेचैनी हमारे अंदर आ जाये तो हमारा अहंकार मिट जाए। जैसे ही हम स्वीकार करते हैं कि हमें सत्य नहीं पता और हम सत्य का ज्ञान चाहते हैं वैसे ही हमारा भ्रम और भ्रम जनित अहंकार समाप्त हो जाता है। यंही से सत्य का मार्ग प्रशस्त होता है।
   प्रश्न प्रस्तुत हो तो उत्तर की उत्कंठा होती ही है। हर सोचने समझने, अच्छा बुरा की परवाह करने वाले के लिए ये जानना अति महत्वपूर्ण होता है कि अच्छा क्या है जो उसे करना होगा। हर विचारवान इंसान बुरा या गलत काम करने से बचना चाहता है और इसी कारण उसे जब भी कोई कार्य करना होता है तो वह पहले सोचता है कि उस कार्य को करना चाहिए या नहीं, उसके मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो वह करना है कँही वो कार्य ही तो गलत नहीं है। सो वह उस कार्य के प्रति तरह तरह से खुद से पहले तर्क करता है। यदि सन्तोषजनक उत्तर उसे अपने अंदर से ही मिल गया तब तो ठीक है, वह उसी के अनुरूप आगे बढ़ता है, लेकिन यदि वह अपने ही उत्तर से संतुष्ट नहीं हो रहा होता है तो वह किसी ज्ञानी को खोजता है जिसे वह गुरु मानकर उससे निर्देश माँगता है। यह प्रक्रिया उसी के मन में होती है जो सही गलत की परवाह करता है। एक पेशवर हत्यारा सुपारी लेकर हत्या करते वक़्त हत्या के सही या गलत होने की परवाह नहीं करता। उसी प्रकार एक ऐसा विद्यार्थी जिसे विषय का ज्ञान नहीं वह उस विषय के प्रश्न से विचलित ही नही होता क्योंकि वह तो पढा ही नहीं है तो फिर कौन सा उत्तर सही होगा, कौन गलत उसे क्या पता, सो जो समझ में आता है उसे ही उत्तर में लिख देता है।  एक जागरूक व्यवसायी या कृषक अपने हर कदम को परखता है तब आगे बढ़ता है। जब आपको एक महत्वपूर्ण पालिसी बनानी होती है तो आप उस ज्ञानी, जानकार विशेषज्ञ को खोजते हैं जिसे विषय के सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान हो। अब भला दुर्योधन को क्या दुविधा होनी है। वह तो सिर्फ एक ही काम जानता है कि छल से राज्य हड़पना है और यह नहीं हुआ तो मारकाट कर हड़पना है लेकिन अर्जुन को राज पाट से ज्यादा चिंता इस बात की है कि जिस विधि से राज पाट लेने के लिए  या उसे बचाने के लिए वह युद्ध के मैदान में शस्त्रों को धारण कर के आया हुआ है क्या वो विधी जायज है , धर्म संगत है , सत्य के अनुरूप है अथवा नहीं। उसके लिए साध्य(END) से ज्यादा महत्व साधन(MEANS) का है। उसके अनुसार यदि साधन गलत है तो साध्य भी गलत है।  सो वह साधन की शुचिता के बारे में चिंतित है, सो वह पहले तो खुद से , और श्रीकृष्ण को सुनाकर तर्क करता है , ताकि श्रीकृष्ण उसके मत का समर्थन कर दें। हर व्यक्ति यही चाहता है कि लोग बाग उसके ही तर्कों को सही मान लें। सो हर व्यक्ति अपने तर्कों को मित्रों आदि के समक्ष रखता ही है।लेकिन अपने सारे तर्कों से अर्जुन खुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है तो भला श्रीकृष्ण को क्या संतुष्ट कर पायेगा बेचारा।  वह खुद को खुद के तर्कों से संतुष्ट नहीं कर पाता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अपने सारे तर्कों का प्रयोग कर के भी उसे शांति नहीं मिल पा रही है, वह उसी तरह से उद्विग्न है जैसे प्रारम्भ में प्रश्न रखने वक़्त था। यदि उत्तर मिल गया होता , यदि वह अपने उत्तर से अपने को संतुष्ट कर लिया होता तो श्रीकृष्ण की तरफ कभी नहीं देखता। घरबपरिवार, समाज, कार्यक्षेत्र में हम भी तो यही करते है, ऐसे हीं करते हैं। जब सही या गलत हम अपने तर्कों से खुद संतुष्ट होते हैं तब निर्णय लेते वक्त कँहा किसी की परवाह करते हैं। लेकिन जब साध्य से अधिक साधन के महत्व और उसकी शुचिता की चिंता करते हैं तो हम अपने निर्णय को साफ सुथरा, सत्यनिष्ठ, और धर्म आधारित रखना चाहते हैं। इसी सोच का परिणाम है कि अर्जुन के मन में राजपाट, यँहा तक की स्वर्ग का राज मिलने से भी प्रसन्नता नहीं मिल पाने की बात है। यदि साध्य अर्थात लक्ष्य राजपाट होता, यदि लक्ष्य सुख सुविधा को हासिल करना होता तो फिर अर्जुन के मन में कोई शंका नहीं होती, जैसे दुर्योधन को नहीं है। लेकिन एक विचारवान व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को लगता है कि जब गलत साधन से राजपाट हासिल किया जाएगा तो फिर भला मन को शांति कँहा से मिलेगी। और जिस लक्ष्य को हासिल कर शांति नहीं मिल सकती उसे हासिल कर ही क्या मिल जाएगा भला। कोई भी वस्तु जो शांति नही दे पाती हो उससे सुख क्या मिलेगा और जिस कार्य स  शांति नहीं मिलने वाला उसे वह क्यों करे भला। अर्जुन तय नहीं कर पा रहा है कि वो जो कह रहा है वह सही है भी या नहीं। सो उसकी बेचैनी यथावत बनी हुई है। वह अपने ही तर्कों से हारा हुआ महसूस कर रहा है तभी तो उसकी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो रहीं है अर्थात उसके SENSES काम नहीं कर रहें हैं और वह अनिर्णय से ग्रस्त हो रहा है। अधूरा ज्ञान पूर्ण होने के लिए छटपटा रहा है ,उसे  गुरु की तलाश है जो उसके अधूरे ज्ञान को पूर्णता दे सके।

      हर समझदार को अपनी अज्ञानता की जानकारी होनी ही चाहिए। यदि हम खुद को ज्ञानी मानते हैं तो हमारा पहला फर्ज है कि हमें इसका भी ज्ञान हो कि हमारे ज्ञान की सीमा कँहा तक है और हमें गुरु की आवश्यकता कब होगी। हमें जानना चाहिए कि हम जो करने जा रहें हैं, कर रहें हैं क्या उस साधन की सत्यता और शुचिता प्रमाणित है कि नहीं। अगर नहीं जानते तो जानने के लिए किसी की शरण में जाना बुराई नहीं है। जाना ही होगा अन्यथा गलत निर्णय लिए जाने की आशंका बनी रहेगी। लक्ष्य वही सत्य है जिससे हमें आत्मिक शांति मिलती है। धन, सम्पदा शांति नहीं देते। वे शांति के अनिवार्य शर्त नहीं हो सकते यदि उनको पाने का रास्ता असत्य और अधर्म से होकर जाता हो तो ।  आप खुद देखिये , परखिये अपने जीवन में, समाज के अन्य भागों में कि क्या गलत ढंग से अर्जित सम्पति, मान सम्मान, पद  पदवी , डिग्री आदि से आपको या अन्य किसी को शांति नसीब हो रहा है। ये कोई सैद्धान्तिक या कागजी सत्य नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। आप खुद व्यवहार में देखें।
        अब तक तो स्पष्ट हो चुका है कि अर्जुन अपनी ही बुद्धि के तर्कों के कारण शोक , भ्रम और अनिर्णय की स्थिति में है सो हथियार डालकर चुप हो जाने के सिवा उसके पास अपनी बुद्धि के अनुसार कोई और मार्ग बचा नहीं है सो वह वही करता है। लेकिन गीताकार ने शब्दों के चयन से कई तथ्यों को रेखांकित कर दिया है। अर्जुन को दो नामों से सम्बोधित किया गया है, गुडाकेश और परन्तप यानी निंद्राविजयी और शत्रुओं का दमन करने वाला अर्थात अर्जुन के वास्तविक चरित्र को गीताकार में दिखाया है और हम सभी को यह भी याद दिलाया है कि महाज्ञानी, महाशक्तिशाली भी भ्रम में पड़कर अनिर्णय की स्थिति में आ सकते हैं। ये हमारे लिए वार्निंग बेल के समान है, खतरे की घण्टी है जो हमें सचेत करती है कि यदि हम भ्रम, मोह, माया में पड़े तो तमाम क्षमता के बावजूद हम कृपणता और कायरता के शिकार होकर नपुंसकता को प्राप्त कर सकते हैं जिस अवस्था में हमसे निर्णय नहीं लिया जा पाता और हम तमाम तकनीकी ज्ञान के बावजूद भी प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं।
लेकिन इस अवस्था में अर्जुन किससे मदद माँग रहा है जरा इसपर भी देखें। श्रीकृष्ण की शरण में आया है अपनी बुद्धि शोधन के लिए और श्रीकृष्ण कौन हैं गीताकार के शब्दों में! वे हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी और गोविंद यानी सारी धरती उन्ही की है। अर्थात जब हमारा मन भ्रमित हो जाता है, जब हमें धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य का भान नहीं होता तब हमें किसके पास जाना चाहिए, किसकी मदद लेनी चाहिए इसपर विचार करना अत्यावश्यक है लेकिन उसके पहले हमें ये भी ध्यान रहे कि हम भ्रम में हैं इसकी स्वीकारोक्ति अनिवार्य है अन्यथा हम भी दुर्योधन की तरह अपने भ्रम और मोह , अहंकार और मूर्खता के प्रति बन्धे हीं रह जाएंगे जीवन भर। जिनको अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में आने भ्रम का अहसास तक नहीं होता वो खुद गुरुओं को ज्ञान देते फिरते हैं और अंत में नाश को प्राप्त होते हैं जैसा दुर्योधन ने किया और भोग। लेकिन भ्रम के प्रति शंका और उसकी स्वीकारोक्ति हमें अर्जुन की तरह बनाती है, हम भले ही कुछ समय के लियर भ्रमित होते हैं लेकिन इन भ्रम को जैसे ही पहचानते हैं हमें चाहिए कि हम शीघ्रताशीघ्र उसके सम्पर्क में आना चाहिए जिसे खुद अपने इन्द्रियों यानी अपने सेंसेस पर नियंत्रण हो और जो अपने शरीर का खुद स्वामी हो । यानी कृष्ण की शिक्षाओं की शरण में आना चाहिए।
जब हम स्वीकारोक्ति के साथ और पूर्ण समर्पण के साथ गुरु की शरण में आते हैं तब हमें ज्ञान मिलता है, तभी गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान हमारे अंदर टिकता भी है। हमारी इसी अवस्था में गुरु यानी श्री कृष्ण हमें ज्ञान देते हैं। अब चूँकि अर्जुन अपनी गलती को समझ कर पूर्ण समर्पण के साथ आ चुका है तो अब उसे परमगुरु यानी श्रीकृष्ण के द्वारा उसे दी गई शिक्षा भी मिलेगी। ज्ञान प्राप्त करने हेतु अपने अज्ञान को स्वीकारना और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही एक मात्र रास्ता है। 
     
      
































Popular posts from this blog

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 47

गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो  ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।        श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।       ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?      इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे  विषाद  हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या  हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...
It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.