श्रीमद्भागवद गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण- अध्याय 2 भाग 2 -अनश्वरता और परिवर्तन श्लोक 11 से 15
गीता अध्याय 2 श्लोक 11
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( सांख्ययोग का विषय )
श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥
श्री भगवान बोले, हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी पण्डितजन शोक नहीं करते
॥11॥
शोकाकुल अर्जुन के दिलोदिमाग पर श्रीकृष्ण की पहली हीं पंक्तियाँ बहुत कड़ी पड़ती है। शब्दों के विन्यास से लगता है कि एक तरह की झिड़की मिलती है अर्जुन को कि वह वैसे लोगों के लिए दुखी हो रहा है जिनके लिए दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है। फिर एक बार और कड़े शब्द उसे सुनने को मिलते हैं कि वह बातें तो ज्ञानी सा कर रहा है पर है नहीं ज्ञानी , क्योंकि ज्ञानी न तो मरने वाले के लिए दुखी होते हैं न ही जीने वाले के लिए।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण पहली ही पँक्ति में अर्जुन की समझ को साफ साफ नकार देते हैं। जीने और मरने वालों के लिए दुख व्यक्त करना मूर्खता है। और अर्जुन की तरफ से जो भी तर्क अब तक दिए गए हैं श्रीकृष्ण उन सभी को बेकार ही मानते हैं।
अब सवाल उठता है कि श्रीकृष्ण ऐसा क्यों कह रहें हैं। अर्जुन तो युद्ध का, मार काट का विरोध ही न कर रहा है, वह तो युद्ध के पश्चात समाज में फैलने वाली परिस्थिति की ही न बात कर रहा है, वो यही न कह रहा है कि भीष्म और द्रोण जैसे महात्मनों को मारना उचित नहीं है । अब भला शांति चाहने और शांति का तर्क देने वाला अर्जुन गलत कैसे हो गया? इस तथ्य को समझना अति आवश्यक है क्योंकि इसे समझे बिना गीता की शिक्षा को समझा ही नहीं जा सकता है।
श्रीकृष्ण ने आगे के श्लोको और अध्यायों में इसी को विस्तार से समझाया है। यँहा ये समझने वाली बात है कि हम चीजों को , घटनाओं को वैसे ही देखते हैं जैसे हम खुद को समझते रहें हैं। हमारी खुद के प्रति समझ के तीन भाग होते हैं, शारीरिक, मानसिक/भावनात्मक और विवेकात्मक। हम खुद को तीन तरह से देखते हैं, एक अपने शरीर की तरह, एक अपनी भावना की तरह और एक अपनी बुद्धि, अपने विवेक की तरह और अपने इसी समझ के अनुसार हम सब अलग अलग तरीके से चींजों को देखते हैं। किसी की मृत्यु से कोई दुखी होता है तो किसी को खुशी होती है, किसी की सफलता से कोई खुश होता है तो किसी की आँखों में वो सफलता गड़ती है। कोई प्रश्न किसी के लिए असाध्य होता है तो किसी के लिए वही प्रश्न खिलौना की तरह होता है। तो क्या उस घटना का , उस वस्तु का अपना कोई स्वरूप नहीं होता कि उसका अस्तित्व हमारी अपनी समझ से निर्धारित होता है? ऐसे में एक सवाल तो उठता ही है कि क्या कोई स्थायी स्वरूप नहीं होता जो हर परिस्थिति में समान रहे? इस प्रश्न का उत्तर तो है लेकिन उस उत्तर तक पहुँचने के पूर्व ये जरूरी है कि हम पहले खुद को तो जाने कि हम कौन हैं। क्या हम नित्य बदलने वाले जीव मात्र हैं जिसकी अपनी समझ कोई नहीं होती बल्कि परिस्थिति जन्य ही हमारा अस्तित्व है? ये समझना इसलिए भी अनिवार्य है क्योंकि निरन्तर बदलते शारीरिक , भावनात्मक और बौद्धिक अवस्था से क्या सत्य निर्धारित हो सकता है।
श्रीकृष्ण इसी शाश्वत की समझ रखते हैं सो उनको अर्जुन का यह व्यवहार सत्य के विपरीत लगता है। अभी तक तो अर्जुन युद्ध के लिए तैयार था तो फिर अचानक भीष्म और द्रोण को देखते यह ज्ञान कँहा से आ टपका? क्या अर्जुन को युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व युद्ध की विभीषिका की जानकारी नहीं थी? क्या युद्ध उसके लिए कोई नई चीज थी? ऐसे ही तमाम सवाल हम अर्जुन को लेकर उठा सकते हैं। तो फिर ये असमंजस क्यों?
हम सभी अपने जीवन के अलग अलग प्रसंगों में इसी असमंजस में जीने के आदि हो गए हैं जिसके कारण हम अधिकांश समय तनाव और विषाद में ही बिताते हैं फिर चाहे हम घर में हों, विद्यालय में हों, दोस्तों के साथ हों , नौकरी व्यवसाय में हों या नितांत अकेले ही क्यों न हों। यदि हम आप अपने एक दिन का मानसिक अवस्था का टाइम चार्ट बनाएं तो पाएंगे कि हमारा अधिकांश वक़्त तनाव और चिंता में ही बीतता है । ऐसा नहीं कि जिनके पास कम ज्ञान है, कम साधन है सिर्फ उनकी ही स्थिति ऐसी रहती हो। जिनके पास प्रचुरता है वो भी तो ऐसी ही अवस्था में रहते हैं। सो तय है कि हमारे तनाव और विषाद का कारण बाहर की दुनिया में कम और अपने भीतर की दुनिया में अधिक होता है। संसाधन की आवश्यकता तो है लेकिन संसाधन ही हमारी संतुष्टि और प्रसन्नता का निर्धारक हो ये कतई जरूरी नहीं।। होता यह है कि हम अपना अधिकांश समय बाहरी कारकों के प्रति प्रतिक्रिया को जीने में गुजरते हैं बिना ये जाने बुझे कि हम वास्तव में कौन हैं और बिना ये समझे कि बाहरी कारक हमपर उतना ही प्रभाव छोड़ सकते हैं जितना हम खुद को समझते हैं। दुनिया के आर्थिक विकास और संसाधनों के सबसे ऊँचे पायदान पर खड़े देशों, समाजों के लोग जरूरी नहीं कि सबसे खुशहाल जीवन जी रहें हों। हाल में विकसित किया गया हैप्पीनेस इंडेक्स इसकी तकसीद भी करता है। सो सबसे जरूरी है कि सबसे पहले हम ये समझें कि हम वास्तव में कौन हैं, हमारी क्रियाएँ क्या हैं? श्रीकृष्ण इसी सत्य की तरफ इशारा कर रहें हैं जिसे वे आगे स्पष्ट करते जाएंगे।
इस सत्य को श्रीकृष्ण अनश्वरता और परिवर्तन, आत्मा, कीर्ति, कर्म, धर्म, दैवी और आसुरी गुण, भक्ति आदि माध्यमों से अर्जुन के माध्यम से हम सभी के समक्ष रखेंगे।
गीता आध्याय 2 श्लोक 12
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त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे
॥12॥
अर्जुन के विषाद को अकारण होने का कारण बताते हुए श्रीकृष्ण पहली बार आत्मा की अमरता और अजरता की तरफ अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान खींचते हैं जिसे आगे और स्पष्ट भी करते हैं। विषाद या दुख किसके लिए हो सकता है? दुख या विषाद हमें तब होता है जब हमें लगता कि कोई चीज हमसे छूट रहा है या छूट गया है या छूट जाएगा। विलगाव का भय हमें दुखी करता है। अर्जुन को भी इसी से दुख है। लेकिन श्रीकृष्ण का कथन है कि हम जिसे विलगाव होना समझ रहें हैं वो दरअसल विलगाव है ही नहीं। निरन्तरता ही सत्य है भले स्वरूप भिन्न हो। हम स्वरूप को ही प्राथमिक समझते हैं , हमें लगता है कि जिसका आकार है, जिसमें स्पंदन है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता है वही मात्र जीवन की पहचान है।
हमारा ज्ञान इतना भर ही है कि शरीर की समाप्ति के साथ जीव का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। यह सोच यह समझ पूरी तरह से सिरे से गलत है। स्वरूप या शरीर का खत्म होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन जब हम गहराई से सोचते हैं तो पाते हैं कि शरीर हमारी पहचान नहीं है। कुरूप से कुरूप व्यक्ति भी अपनी अभिव्यक्ति से अपने रूप से भिन्न हो सकता है। वस्तुतः अपने या अन्य के होने का भान यानी ईगो यानी अहम स्थूल शरीर, भावना और बुद्धि से मिलकर बनता है जबकि अभिव्यक्ति तो आत्मस्वरूप यानी सेल्फ से होता है जो आकारविहीन है। हम आप जानते हैं कि हर चीज मैटर से बना होता है, और मैटर अंततः परमाणु से बना होता है। मैटर और ऊर्जा आपस में परिवर्तनीय होते हैं। ऊर्जा का न तो निर्माण होता है न ही विनाश, बस उसका स्वरूप परिवर्तन ही हो सकता है। हमें भ्रम होता है कि हमने विधुत पैदा कर लिया, ऊष्मा पैदा कर दिया, प्रकाश ला दिया आदि आदि। ये सब हमारा भ्रम मात्र है। हम ऊर्जा को नहीं बनाते अपितु उसका स्वरूप बदलते हैं। इसी प्रकार हम मैटर का नाश नहीं कर पाते। मैटर समाप्त नहीं होता वह तो ऊर्जा का रूप ले लेता है। इसी प्रकार जीव का नाश नहीं होता , उसका स्वरूप बदलता है। यही कारण है कि श्रीकृष्ण कहते हैं कि समय के हर काल में कृष्ण भी रहें हैं, अर्जुन भी रहा है और अन्य सभी भी रहे हैं और ये सब हमेशा रहेंगे, स्वरूप चाहे जो हो।
जीवन के प्रत्येक प्रसंग में अनश्वरता का बहुत महत्व है।कोई भी चीज नश्वर नहीं बल्कि मात्र परिवर्तनशील है। सो प्रत्येक समय हमें ये जानना समझना जरूरी है कि यदि कोई ऊर्जा हमें नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर रही है तो उसमें ऊर्जा की नहीं हमारे ईगो की भूमिका है। उससे सकारात्मकता म कैसे प्राप्त की जाए ये सेल्फ यानी आत्मबोध की समझ पर निर्भर करता है। ऊर्जा का स्वरूप परिवर्तनशील है।जब हम ये समझते हैं तो कोई विषाद नही हो सकता, कोई भ्रम नही हो सकता।
अनश्वरता की ये समझ हमें दार्शनिक स्तर के साथ साथ व्यवहारिक स्तर पर भी मदद पहुँचाती है। हर प्रसंग में निर्णय और निर्णय के अनुसार क्रिया के दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष हमें सत्य, न्याय, धर्म की तरफ ले जाता है और दूसरा ठीक इसके विपरीत असत्य, अन्याय और अधर्म की तरफ। युद्ध का मैदान तो एक ही है, साध्य यानी राज्य जिसे हासिल करना है वो हस्तिनापुर भी एक ही है लेकिन साधन भिन्न। अर्जुन अभी भी युद्ध की धार्मिकता, सत्यता और न्याय के पक्ष को समझने की कोशिश कर रहा है। योद्धा होने के नाते वह चाहता तो सीधे युद्ध की बात करता, साध्य को देखता, लेकिन वह युद्ध के पहले युद्ध के साधन को समझना है। युद्ध कला में दोनों पक्ष समान रूप से सामर्थ्यवान हैं लेकिन अर्जुन तमाम सामर्थ्य के बावजूद साधन की शुचिता को निर्धारित कर लेना चाहता है। इसके विपरीत कौरव पक्ष युद्ध के स्वरूप को ध्यान में नहीं रखता है, उसके लिए साधन की शुचिता मायने नहीं रखती।
हमें अपने अपने जीवन प्रसंगों में ऊर्जा की निरंतरता और अनश्वरता को समझना चाहिए। अति सामान्य शब्दों में समझें तो बात इतनी भर है कि सत्य हमेशा रहा है। यदि समय के किसी भी पहर में हम सनातन सत्य को वरण करते हैं तो असत को पराजित कर सकते हैं चाहे हमारे सामने असत का जो भी रूप हो, युद्ध हो , या कुछ और।
ध्यान देने की बात यह भी है कि ऊर्जा के इस सनातन प्रवाह को हमें अपने अंदर अनुभव करना होता है। बाहर नहीं। ये हमारे आत्मबोध के स्तर पर हो सकता है हमारे ईगो यानी स्थूल स्वरूप के स्तर पर नहीं। स्थूल का कार्य इतना भर है कि वो शरीर का आधार देता है जो परिवर्तनशील है लेकिन आत्मबोध सनातन है और इसी आत्मबोध की खोज हमारा युद्ध है। आगे श्रीकृष्ण इसे क्षेत्र क्षेत्रज्ञ की परिभाषा से समझायेंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 13
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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥
जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥
अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए श्रीकृष्ण पुनः समझाते हैं कि शरीरों की मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसपर अस्वाभाविक प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त की जा सकती है। जन्म के पश्चात शरीर की जो विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं उनमें बाल्यावस्था, युवावस्था, बृद्धावस्था तो हैं ही मृत्यु भी एक अवस्था ही है जैसे जन्म और जन्म के पश्चात की अन्य अवस्थाएँ। देह की समाप्ति से कुछ होता नहीं है। जन्म होने के पश्चात हमारी आपकी एक सामाजिक पहचान बनती है और हम जीवन भर उसी सामाजिक पहचान को जीते हैं एक ईगो यानी अपना एक अहम लेकर। लेकिन इस ईगो यानी अहम के अतिरिक्त एक आत्मबोध भी होता है, एक SELF भी होता है जो हमेशा एक सा ही रहता है चाहे जो अवस्था हो। मृत्यु के पूर्व हमारा स्व एक शरीर विशेष में होता है जिससे हम खुद को बाहरी तौर पर पहचानने का दावा करते हैं। लेकिन शरीर की बनावट से हमारे स्व यानी सेल्फ कों कोई लेना देना नहीं होता। वह तो शरीर की बनावट , उसके रूप रंग से मुक्त होता है। बचपन में हमारा शरीर कुछ और होता है, जवानी में कुछ और और बुढापा में कुछ और परन्तु हर अवस्था में हमारा सेल्फ बदल नहीं जाता। उसी प्रकार मृत्यु के पश्चात भी मात्र शरीर का परिवर्तन होता है, हमारी आत्मा का नहीं, हमारे सेल्फ का नहीं, हमारी उर्जा का नही। वह तो फिर नए शरीर को धारण कर लेती है।
अर्जुन युद्ध में मृत्यु के विषय को लेकर ही चिंतित है। युद्ध के अन्य कारणों और परिणामों पर उसका ध्यान नहीं गया है सो श्रीकृष्ण भी उसे सबसे पहले मृत्यु के विषय में बात कर रहें हैं, किंतु आगे वे जीवन के वृहत्तर प्रश्नों को लेते हैं जिससे इसका समाधान होता है कि जीवन और मृत्यु से अधिक महत्वपूर्ण हमारे कर्मों का लेखा जोखा है जो शरीरों के परिवर्तन की श्रृंखला को रोक देते हैं। वस्तुतः मृत्यु एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे होना है। जिसका होना निश्चित है उसके लिए विषाद कैसा। वो आज हो या कल क्या फर्क पड़ता है। सो श्रीकृष्ण आगे चलकर जीवन के प्रश्नों को लेते हैं, उन प्रश्नों को खुद उठाते हैं क्योंकि अर्जुन की नजर वँहा तक नहीं जा पा रही है।
हम सभी नष्ट होने के भय में जी रहें है। अपने शरीर के अंत के भय में, अपने प्रियजनों के शरीर के अंत होने के भय में। ये भय ही हमें जीने नहीं देता, और इसी जीवन मृत्यु की नासमझी के कारण हम सभी तरह के गलत कार्य करते रहते हैं। क्या दुर्योधन को राज पाट मिल भी जाता तो उसे वह अनंत काल तक भोग पाता? नहीं। फिर उसका भी अंत हो जाता। फिर जो आता वो भी नष्ट हो जाता। तो फिर इतना भ्रम , इतना मोह क्यों? क्योंकि जीवन का वास्तविक अर्थ ही समझ में नहीं आया मृत्यु के भय से।
हम सब इसी भय में जी रहें हैं। आज ये खत्म हो गया, कल वो बिछड़ गया , कल वो खत्म हो जाएगा। कितनी चिंता है हमें खत्म होने के डर से। लेकिन फिर भी हम इस शरीर रूप को खत्म होने से नहीं रोक पाते। इसी भय में हम जीना छोड़ देते है। जबकि ये सत्य बना रहता है कि जो मृत हुआ उसका स्व बना हुआ है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 14
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मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर
॥14॥
परिवर्तन संसार का नियम है। आत्मा की अजरता अमरता बताने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन को निरन्तरता के महत्व को समझाते हैं। इस संसार में जो भी भौतिक है वह समय के साथ परिवर्तनशील है। इसका अनुभव हमें हमारी इन्द्रियाँ यानी हमारे सेंस कराते हैं। रूप, स्वर, घ्राण, स्वाद और स्पर्श हमारी इन्द्रियों से व्यक्त होती है जो क्रमिक रूप से आँख, कान, नाक जिह्वा और त्वचा से महसूस की जाती हैं। हमारी इन्द्रियाँ भौतिक वस्तुओं को इन इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करती हैं। तब मस्तिष्क इन अनुभवों की व्याख्या करता है और हम किसी भौतिक वस्तु के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हैं, जैसे यह सुंदर है, दूर है, उसकी आवाज कर्कश है, इसका स्वाद मीठा है, वह गर्म है इत्यादि। इन्द्रियाँ भौतिक तत्व को उसके गुण के अनुसार महसूस तो कर लेती हैं लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक अवस्था अपने अनुसार इस अनुभव को व्यक्त करता है। जैसे कोई वस्तु देखने में किसी को सुंदर लगती है तो किसी को सामान्य, कोई तीखापन को बर्दाश्त भी नहीं कर पाता तो किसी के लिए यही स्वादिष्ट होता है, किसी का स्पर्श हमें आनंद देता है तो उसी का स्पर्श अन्य के मन में दूसरे तरह की भावना को जगाता है। इन्द्रियों ने तो सभी में एक ही भाव पाया किन्तु हमारी भावना की अभिव्यक्ति अलग अलग हो जाती है।
इसी प्रकार समय के साथ इन्द्रियों से प्राप्त भाव भी भिन्न भिन्न हो जाते हैं। जो आज हमें प्रिय है हो सकता है कल अप्रिय हो जाये, जो अभी प्रिय है वह अगले कुछ समय में अप्रिय हो सकता है। इसका उल्टा भी हो सकता है। जिस बच्चे के प्रति माँ की ममता सम्भाले नहीं संभलती वही बच्चा बड़ा होकर माँ के लिए दुखदाई भी हो सकता है।आज हमें चाय का स्वाद अच्छा नहीं लगता, कल चाय अच्छी लगने लग सकती है। इनसब में कुछ भी अनहोनी नहीं है।
इस प्रकार समय के साथ साथ हर भौतिक अभिव्यक्ति , हर प्राक्रतिक वस्तु में परिवर्तन अवश्यम्भावी है।कुछ परिवर्तन हठात होते हैं, कुछ क्रमिक। परन्तु बिना परिवर्तन के प्रकृति हो ही नहीं सकती। जीव जन्म लेता है, समय बीतने के साथ साथ उसमें परिवर्तन आता है, बड़ा होता है , बूढा होता है, फिर अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है। जैसे जन्म होना हुआ, उसी तरह से मृत्यु होना। मृत्यु भी मात्र एक परिवर्तन ही है। भौतिक रूप से सचेष्ट भौतिक रूप से निश्चेष्ट हो जाता है जैसे अन्य भौतिक या प्राकृतिक स्वरूपों के साथ होता ही है।
जब परिवर्तन इतना व्यापक और अवश्यम्भावी है तो फिर परिवर्तन आने पर हर्ष या विषाद क्यों होना? ये तो होना ही है। एकदम स्वाभाविक बात है।
अब प्रश्न उठता है कि जब परिवर्तन इतना ही निश्चित है तो ये हर्ष और विषाद क्यों परिवर्तन होने पर? दरअसल हमारी सोच इन्द्रियों की अनुभूतियों की हमारी व्यख्या पर निर्भर होती है, तभी हमें परिवर्तन पर हर्ष या विषाद होता है। किसी घटना को हम अपने से जुड़ा मान लेते हैं जबकि उस घटना का स्वतंत्र अस्तित्व होता है, जैसे किसी का मरना। कोई व्यक्ति जिसके प्रति हम कोई भावना नहीं रखते उसे भी प्रकृति के परिवर्तन के नियम के अधीन मरना ही है। लेकिन उसकी मृत्यु से हम पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन यदि उस व्यक्ति को हम खुद से जुड़ा मान लें तो उसकी मृत्यु से हमे कष्ट या प्रसन्नता होती है। मृत्यु तो तटस्थ है ,होना ही है। उससे दुखी या सुखी तब ही हुआ जाता है जब लगता है कि मृत व्यक्ति का हमसे कोई सम्बन्ध है। ये सम्बन्ध कोई वस्तुनिष्ठ चीज नहीं बल्कि हमारी अपने और पराये की समझ से उतपन्न भाव मात्र है।हम अपनी समझ , अपने भ्रम , अपने मोह के कारण ही एक तटस्थ और अवश्यम्भावी परिवर्तन को इतना बड़ा देते हैं कि हमें शोक या हर्ष होने लगता है।
परिवर्तन की अवश्यम्भावीता सिर्फ मृत्यु को लेकर नहीं है। यँहा प्रसंग युद्ध का है और अर्जुन को भी इसका भान अपने प्रिय पितामह और गुरु के सामने आने के कारण ही है। यदि अर्जन के समक्ष दुर्योधन या दुःशासन होते तो हो सकता था कि अर्जुन के भाव भी भिन्न होते। सो ये समझना जरूरी है कि हर उस जीव या वस्तु से जिसके प्रति हमारे अंदर भाव होता है उसके लिए भावना होती है। ये कुछ भी हो सकता है, मृत्यु सहित कुछ भी। किसी को धन से, किसी को पद से, किसी को नशे से, किसी को मित्र से, किसी को स्त्री या पुरुष से, किसी को नौकरी से , किसी को देश से, किसी को समाज से, किसी को कर्मकांडों से , किसी को पुस्तक या भवन या वाहन से , तातपर्य कि किसी भी भौतिक स्वरूप से भाव का सम्बंध हो सकता है तब इन्द्रियाँ उस भावयुक्त स्वरूप को जब मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं तो हमारी भावना फूट कर बह निकलती है।
जब तक हमारा भ्रम जीवित है ये सुख और दुख होंगे ही। सो भ्रम की समाप्ति तक हमें अपने भ्रम के अनुसार अपने शोक और हर्ष को स्वाभाविक गति मानकर इनके प्रति निर्विकार होने की आदत डालनी चाहिए।
अभी तो श्रीकृष्ण परिवर्तन को एक निश्चित क्रिया मानकर इसे सहन करने को कह रहे हैं, आगे देखेंगे कि श्रीकृष्ण इस भावना से ही मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त कर देंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 15
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यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
॥15॥
अभी तक की व्याख्या में श्रीकृष्ण ने शोक,विषाद एवं हर्ष के कारणों को स्पष्ट कर दिया है। अब वे दो तथ्य और बताते हैं, पहला की किस प्रकार के व्यक्ति को हर्ष या विषाद नहीं हो पाता और दूसरा की इस प्रकार के व्यक्ति की क्या उपलब्धि होती है जीवन में।
हमने देखा कि जब इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति और भौतिक चीजों को महसूस करने और उस अनुभव को हमारे मस्तिष्क की अनुभूतियों द्वारा व्यख्या की जाती है तब हमें सुख या दुख का अनुभव होता है। इन्द्रियों को हम प्रकृति से जितना विलग करेंगे इस सुख दुख की अनुभूति से हम उतना ही दूर होंगे क्योंकि इन्द्रियाँ यानी सेंसेस ही सुख और दुख जैसी भावनाओं की उत्पादक और वाहक हैं। लेकिन ये अचानक नहीं हो सकता। इसके लिए सतत अभ्यास की जरूरत होती है। इन्द्रियों को उनके विषयों से समेटने का अभ्यास तब तक करना होता है जब तक इन्द्रियाँ बाह्य प्रकृति से स्वतंत्र न हो जाएं। जब तक ये अभ्यास पूरा नहीं होता तब तक पूरी सावधानी जरूरी है। साथ ही परिवर्तन के अपरिवर्तनिय सिद्धांत को याद रखना अनिवार्य है। याद रखना होता है कि हर वो चीज जो प्रकृति से निकलती है, हर वो चीज जो भौतिक है वो सतत परिवर्तनीय है । वो बिना परिवर्तित हुए नहीं रह सकता। और ये परिवर्तन अंततः स्वरूप परिवर्तन का कारण बनता है। ये सब इतना स्वाभाविक होता है कि इसपर हर्ष या विषाद करने का कोई कारण नहीं । जिसे बदलना है उसे बदलना ही है।
अब देखें कि इस स्थिति को जो इंसान हासिल करता है क्या वो पत्थर की तरह होता है। जी नहीं। अगर वो इंसान पत्थर की तरह हो गया तो फिर उसे ये भी नहीं पता चल सकता कि उसकी वास्तविक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। वस्तुतः ऐसा इंसान धैर्यवान होता है। दरअसल वो जानता है कि उसे करना क्या है। उसे पता होता है कि उसे परिवर्तन को स्वाभाविक रूप में लेना है और अपनी इन्द्रियों यानी अपने सेन्स को प्रकृति से किस तरह विलग रखना है।
जब हम अभ्यास कर इस परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को आत्मसात कर लेते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ वाह्य संसार से मुक्त हो जाती हैं, बाहरी प्रकृति से प्रभावित होकर न तो सुख दे सकती हैं न ही कोई दुख। यही वो अवस्था होती है जब इंसान प्रकृति से मुक्त हो जाता है। वो अपने जीवन काल में ही प्रकृति से मुक्त हो सकता है। प्रकृति से उसकी यही मुक्ति उसका मोक्ष कहलाता है। ऐसा इंसान वाह्य संसार से अपने को नहीं निर्धारित करता। इस स्थिति में उसका ईगो जो उसके शरीर, उसके इन्द्रियों/भावना और उसकी बौद्धिकता से बने होते हैं तिरोहित हो जाते हैं, उसका अहम और वहम दोनों समाप्त हो जाता और तब उसे मोक्ष यानी मुक्ति मिलती है।
ध्यान दें कि ये शिक्षा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के परिपेक्ष्य में दिया है। लेकिन जब आप नितांत अकेले होते हैं, समाज में होते हैं, व्यवसाय में होते हैं, या किसी भी अन्य अवस्था में होते हैं अपनी इन्द्रियों के प्रकृति के संयोग के कारण हमें बराबर सुख और दुख मिलते रहते हैं, जिस कारण से हम हम अतिरिक्त तनाव या अत्यधिक लापरवाह और दम्भ की अवस्था में रहते हैं। इससे हमारा जीवन निरुदेश्य हो जाता है। हमें पहुँचना होता है कँही और पहुँच जाते हैं कंहीं। रास्ते से भटकना सिर्फ इसिलए हो पाता है क्योंकि हम सब वाह्य प्रकृति को खोज कर उसी के साथ हम अपने ईगो को जोड़ लेते हैं।
इससे मुक्ति ही मोक्ष है।
अर्जुन को श्रीकृष्ण ने पुरुष श्रेष्ठ कह कर सम्बोधित किया है। दरअसल हम खुद को वैसा ही देखते हैं जैसा लोग हमें देखते हैं। ये प्रवृत्ति हम सब में होती है जो हमारे सेन्स के दूसरों से सम्पर्क के कारण होता है। अतएव अगर हम किसी को प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम उसे अहसास दिलाये कि उस इंसान में बहुत अच्छी क्षमताएँ हैं। अगर उस व्यक्ति को खुद पर भरोसा बढ़ता है तो वह निश्चित ही अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित होता है।
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श्रीमद्भागवद्गीता
सारांश
श्लोक 11 से 15
अर्जुन के विषाद को और धर्म यानी सन्मार्ग की नासमझी को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने सर्प्रथम जिस शिक्षा को दिया है उसके महत्वपूर्ण तत्व निम्न लिखित हैं-----
1.इस भौतिक संसार में जो कुछ है वह नश्वर है।
2.ये नश्वरता अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त के कारण है, अर्थात प्रत्येक भौतिक वस्तु और जीव का स्वरूप परिवर्तन अनिवार्यतः होता ही है।
3.इस भौतिक संसार और इसके अवयवों को हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से समझते हैं यानी हमारी इन्द्रियाँ निरन्तर इस संसार और इसके अवयवों के सम्पर्क में आती हैं और इन्द्रियों द्वारा अपने गुणों के अनुसार इनका अनुभव किया जाता है जिसे हम अपना अनुभव कहते हैं।
4. जब परिवर्तन और स्वरूप परिवर्तन अवश्यम्भावी है ही तो फिर इन परिवर्तनों पर इन्द्रियों के द्वारा सम्प्रेषित सुख और दुख के अनुसार ही सुखी या दुखी होने का कोई कारण नहीं है। अर्थात हमें इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचना के प्रति स्थिर रहना चाहिए और सुखी या दुखी होने से बचना चाहिए।
5.परिवर्तन के सिद्धांत के अनुसार सुख दुख के ये सभी भाव अस्थाई ही हैं सो भी इनके प्रभाव से बचना चाहिए।
6. इन्द्रियों द्वारा प्रकृति के अनुभव किये जाने और उन अनुभवों से अपने को अप्रभावित रखने हेतु ताकि हम स्थिरचित्त बने रहें ये आवश्यक है कि हमारा नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर यानी अपने सेंसेज पर बना रहे।
7. इन्द्रियों की अनुभूति हमें अस्थिर न कर दे इसके लिए जरूरी है कि अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धांत को आत्मसात कर लें।
8. प्रकृति में हर क्षण होने वाले परिवर्तन को समझने के लिए ये जरूरी है कि हम स्वयम को चलायमान न होने दें। अगर हम स्वयम चलायमान होंगे तो फिर प्रकृति के परिवर्तन को समझ नहीं पाएंगे, उसकी गति और दिशा को नहीं जान पाएंगे और भ्रम में पड़ जायेंगे।
9.जिस इंसान में उपरोक्त क्षमताएँ विकसित अवस्था में हो जाती हैं उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अमृत अमरत्व प्रदान करता है। तो इसका अर्थ हुआ कि इस तरह का इंसान नश्वरता से और परिवर्तन अर्थात स्वरूप परिवर्तन से जीते जी मुक्त हो जाता है। उसका ईगो यानी उसका अहम समाप्त हो जाता है क्योंकि प्रकृति के परिवर्तनों से वह अप्रभावित होता है।
10. जब इस प्रकार अप्रभावित होता है तो उस समय उसका स्व यानी उसका SELF उसके समक्ष उपस्थित होता है जो नितांत अपरिवर्तनीय, अनश्वर और सभी प्राणियों में एक समान होता है अर्थात हर किसी का SELF यानी स्व यानी आत्मबोध एक समान होता है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त व्यक्ति होता है। यानी मोक्ष जीवित रहते प्राप्त होता है न कि मरने के पश्चात।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने सभी को समान स्थिति में होने का रास्ता सुझाया दिया है।
इन शिक्षाओं की भाषा निश्चित रूप से हमारे दैनिक जीवन की भाषा से भिन्न है। लेकिन ये सीख सिर्फ उनके लिए ही नहीं है जो धर्म के मर्म को समझते हैं बल्कि ये शिक्षाएँ इतनी सरल हैं कि अगर हम आप मनोयोग से उन्हें सुने जाने तो हमें लगने लगेगा कि अभी तक हम सिर्फ इसलिए परेशान रहते आएं हैं क्योंकि हम खुद को इस सच्चाई से रूबरू नहीं होने दिए थे। हमारे जीवन में प्रयुक्त होने वाले अगितन मुहावरों, लोकोक्तियों में ये शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं , उनका कहने सुनने में हम उपयोग भी करते आये हैं लेकिन कभी ध्यान से इनका चिंतन नहीं किये। अगर किये रहते तो सुखी भी होते और खुश भो रहते। और तब लक्ष्य से दूर भी नहीं रह जाते।
ये सारी शिक्षा युद्ध के मैदान में युद्ध से विमुख अपने काल के एक सबसे बड़े योद्धा को दी गई है। प्रश्न उठता कि युद्धकाल की शिक्षा का अभी क्या महत्व हो सकता है। वजह दो हैं।
पहली वजह तो यही है कि ये शिक्षाएँ काल विशेष से बंधी नहीं हैं। वस्तुतः ये शिक्षाएँ समय की सीमा से बाहर हैं, सर्वकालिक हैं
दूसरी बात कि जीवन में हमारी व्यवसायिक सफलता चाहे जतनी बड़ी हो जीवन में शांति तभी मिलती है जब जीवन जीने का ढंग पता हो, दृष्टिकोण परिपक्व हो। ये परिपक्वता शैक्षणिक और तकनीकी ज्ञान की और आर्थिक संसाधनों की प्रचुरता से नहीं आती। इन प्रचुरताओं के बावजूद भी यदि जीवन को देखने का ढंग सही नहीं है तो हम बार बार कभी प्रसन्नता और कभी दुख के अतिरेक में फंस कर तनावग्रस्त हुए रहते हैं। तनाव हमारे मानसिक अवस्था को आंदोलित (agitated) करते रहता है जिससे हम बार बार अस्थिर होते रहते हैं। स्थायित्व का अभाव ध्यान बँटाता है। नतीजे में हम न केवल आत्मिक लक्ष्य से दूर होते जाते हैं बल्कि अपने भौतिक लक्ष्यों से भी भटकते हैं। इससे हमारी न केवल आत्मिक यात्रा दुष्प्रभावित होती है, बल्कि हमारी भौतिक यात्रा भी दुष्प्रभावित होती है।
के कारण हमारे अंदर इस प्रकार का आत्म
इन शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन के प्रसंगों में में लागू करके देखें। जीवन की हर छोटी बड़ी घटना के परिपेक्ष्य में देखें और इन शिक्षाओं को उन प्रसंगों की कसौटी पर कसें। घर की अच्छी बुरी बात हो, छात्र जीवन की सफलता असफलता हो, व्यवसाय की भली बुरी बातें हों, रिश्तों की बातें हों या अन्य कोई भी प्रसंग, हम पाते हैं कि ये शिक्षाएँ न सिर्फ व्यवहारिक हैं बल्कि हर प्रसंग में एक आत्मबल भी प्रदान करती हैं। ये हमें सुख में खुश होकर बौराने से बचाती हैं और दुख में निराश होकर बिखरने से भी बचाती हैं। ये शिक्षाएँ हमें हर परिस्थिति से अछूता रहकर साध्य की तरफ बढ़ने का रास्ता बताती हैं। मोक्ष परम् स्थिति है, जो निरन्तर अभ्यास से मिलती है लेकिन इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है । अभ्यास की पहली सीढ़ी अपने जीवन के दैनिक प्रसंग ही होते हैं। यदि हम अपने दैनिक प्रसंग में खुद को अनुशासित नही रख सकते तो फिर बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना भी असम्भव ही रह जाता है।अवश्यभावी परिवर्तन और नश्वरता के इस शिक्षा से हमारे अंदर अपने सेल्फ को खोज पा लेने के कारण हमें सत्य के प्रति जो लगाव मिलता है उससे हमें एक आत्मबल प्राप्त होता है । ऐसा क्षमता युक्त व्यक्ति अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय हो जाता है।