गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 2
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श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।
श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
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श्रीमद्भगवद्गीता में सर्प्रथम श्रीकृष्ण पूरे श्लोक में बोल रहे हैं। हमने देखा कि प्रथम अध्याय में अर्जुन तरह तरह से युद्ध के विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा था, और अपने ही तर्कों में बुरी तरह उलझा उसका मन व्यथित हो जाता है। परंतु श्री कृष्ण कुछ बोल नहीं रहें है, चुपचाप ध्यान से उसकी बात को सुन रहें हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से अपने तर्कों को सांकेतिक समर्थन भी न पाकर और भी व्यथित, दुखी और विचलित हो रहा है।
याद करें श्रीकृष्ण प्रथम अध्याय में अर्जुन को उसी के निदेश पर दोनों सेनाओं के मध्य ले आ कर खड़ा कर मात्र इतना ही कहें हैं कि, "पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥" यानी कि "हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख"। उसके पश्चात अर्जुन जो भी कह रहा होता है वह उसकी मनोस्थोति है। वह जिस दृष्टिकोण से युद्ध को देख रहा होता है उसी के अनुसार उसकी मनःस्थिति हो रही है। उसका दृष्टिकोण तात्कालिक परिस्थितियों पर उसकी समझ की व्याख्या है। हम जो समझते हैं, परिस्थितितियों का आकलन करते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कितने विवेक से अपने दैवी गुणों अथवा अपने आसुरी गुणों के अनुसार उपयोग में लाते हैं। एक ही परिस्थिति को अलग अलग इंसान अपने अलग अलग दृष्टिकोण की वजह से अलग अलग तरह से देखते हैं। जब हम परिस्थिति का आकलन/मूल्यांकन अपने भ्रम, मोह, असत्य, अहंकार के अनुसार करते हैं तो वह परिस्थिति प्रतिकूल नजर आती है, जबकि यदि उसी को यदि हम विवेक, स्तय, न्याय आदि की दृष्टि से देखते हैं तो उस परिस्थिति को हम अपने अनुकूल पाते हैं।
जब हम भ्रम में मनोरोग की अवस्था तक चले जाते हैं तो मनोचिकित्सक शॉक ट्रीटमेंट देता है, ठीक वही शॉक ट्रीटमेंट श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहें हैं।
इंसान का भ्रम उसकी कमजोरी है। भ्रम से उतपन्न मोह अविवेक को बढ़ाता है। इस अवस्था में हम अपने ही ज्ञान को भूल जाते हैं। तब हम जो करते हैं वह हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के लिए हानिकारक ही होता है। यह परिस्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में उतपन्न हो सकती है। जैसे ही हम भ्रम और भ्रम जनित मोह में फंसते हैं हम अपना ही भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों बिगाड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
एक ज्ञानी व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह खराब स्थिति को भी अपनी समझ से अनुकूल कर सकता है लेकिन अज्ञानी तो अनुकूल को भी प्रतिकूल कर सब का नाश कर देता है। यँहा देखते हैं कि श्री कृष्ण अर्जुन के सारे तर्कों यथा कुलधर्म ही सनातन धर्म है, कुलधर्म नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट होगा, समाज में वर्णसंकर पैदा होंगे जो पितरों को रुष्ट करेंगे आदि आदि को श्रीकृष्ण एक झटके से नकार देते हैं और अर्जुन की भर्त्सना करते कहते हैं कि ये सब तर्क अज्ञान हैं जो मोह से उतपन्न है। मोह से इंसान का अतीत, वर्तमान और भावी तीनों खराब होता है। हर इंसान तीन बातों से उत्प्रेरित होकर अपना कार्य करता है। वह चाहता है कि उसके कार्यों से उसके खानदान का नाम रौशन हो (अतीत) , उसका नाम रौशन हो(वर्तमान) और उसका और उसकी आने वाली पीढियीं को अच्छी व्यवस्था मिले(भविष्य)। लेकिन मोह और भ्रम वश जो कार्य किये जाते हैं उनसे ये तीनों लक्ष्य पूरे नहीं होते हैं। अन्याय एवम अनाचार को सहना अज्ञान ही है । जीवन की किसी भी परिस्थिति में जब हमारा कार्य मोह और भ्रम से उतपन्न मनोभाव पर आधारित होता है तो फिर वह निर्णय उचित नही होता है। परिवार के मामले हों , व्यवसाय के मामले हों, सामाजिक मामले हों , छात्र जीवन के मामले हों या फिर कुछ और, जब हम अपना कर्तव्य व्यक्ति/वस्तु/विचार विशेष के प्रति मोह से निर्धारित करते हैं तो फिर हमारा वो कर्तव्य हमें रास्ते से भटकाने वाला होता है, जिसके परिणाम में हम लक्ष्य से भटक जाते हैं। आसुरी गुण यानी भ्रम और मोह से किसी भी व्यक्ति का चरित्र यानी उसकी अपनी शख्सियत यानी उसका अपना स्व(सेल्फ) समाप्त हो जाता है और वह उटपटांग और आत्मघाती निर्णय लेता है।
ध्यान दें कि श्रीकृष्ण के कथन को गीताकार ने भगवान उवाच का नाम दिया है, न कि श्रीकृष्ण उवाच। अर्थात गीताकार का मानना है कि श्रीकृष्ण उसी स्तर के साधक हैं जिस स्तर पर ईश्वर स्वम् हैं। श्रीकृष्ण उस समस्त ज्ञान, विभूति और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं जिसे प्राप्त कर इंसान हर चीज को साध लेता है।
श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि , एक तो हमें भ्रम और मोह के प्रभाव में निर्णय नहीं लेना चाहिए। दूसरे कि हमें अन्याय , अनाचार का समर्थन नहीं करना चाहिए। तीसरे कि हमें कुरूतियों से बचना चाहिए। चौथा जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वो ये है कि व्यक्ति का सेल्फ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति का आकलन उसके कार्यों के अनुसार होता है न कि उसके साथ हमारे सम्बन्ध से। इसी प्रकार किसी भी स्थिति में स्थूल का महत्व उसके द्वारा किये गए कार्य के मूल्यांकन से होता है। किसी भी स्थिति में हमें चाहिए कि हम अपने विवेक पर माया , मोह, भ्रम को हावी नहीं होने दें क्योंकि इससे हमारी स्वाभाविक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और तब हम निराशा में डूब जाते हैं।