गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 7
----------------------------------------कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
॥7॥
जब हमें आभास हो जाता है कि हम भ्रम में जी रहें हैं और इस भ्रम के कारण हम सही निर्णय नहीं ले पा रहें हैं तब हमारे अंदर सत्य जानने समझने की ईक्षा उतपन्न होती है और तब हम ऐसे व्यक्ति को खीजते हैं जो हमारे भ्रम को दूर कर हमें सही मार्ग दिखा सके। अर्थात तब हम गुरु की शरण खोजते हैं। जब तक ये भान नहीं होता कि हम अलग हैं परमात्मा अलग तब तक उस परम पिता परमात्मा से मिलने की उत्कंठा उतपन्न नहीं होती। जब तक हमें भ्रम का ज्ञान नहीं होता हमारे अंदर सच के प्रति अनुराग नहीं उतपन्न होता। जब ऐसा होता है तब हम ज्ञान, परमात्मा, सत्य आदि के लिए लालायित हो उठते हैं। तभी हमें गुरु यानी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो हमारेआ मार्गदर्शन कर हमें ज्ञान, सत्य और परमात्मा से मिला सके।
लेकिन इस स्थिति में हम आते कब हैं? यह स्थिति तब आती है जब हम महसूस करते हैं कि हमारा ज्ञान अधूरा है, जब हम ये समझते हैं कि हमारे पास क्षमता तो है लेकिन अपने अज्ञान के कारण हम अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं कर पा रहें हैं, जब हमें लगता है कि हमारा आचरण और हमारा स्वभाव में मैंन नहीं बैठ रहा है। अर्थात जब हमें अपनी अज्ञानता, अपने भ्रम का भान होने पर ही हमारे अंदर ज्ञान, सत्य, धर्म, और परमात्मा के प्रति अनुराग होता है, उसके पहले नहीं। परिवार, समाज, छात्र जीवन, व्यवसाय किसी भी क्षेत्र को ले लें हम तभी सत्य के प्रति , तभी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होते हैं जब हमें लगता है कि हम जो हो सकते हैं, हम जो कर सकते हैं वो वास्तव में हम हो नहीं पा रहें हैं, कर नहीं पा रहें हैं। ऐसी स्थिति में हम किसी ज्ञानी, अनुभवी की शरण में जाना चाहते हैं। इसी तड़प से सन्मार्ग का मार्ग खुलता है।
युद्ध क्षेत्र में किसी पक्ष के किसी भी योद्धा को भ्रम नहीं हुआ है। भ्रम का शिकार मात्र और मात्र अर्जुन ही हुआ है जिसके टक्कर का योद्धा विरले ही है कोई। अर्जुन के अंदर अनुराग है, उसे तमाम ज्ञान और शक्ति हासिल होने के पश्चात भी अहंकार नहीं है। बल्कि उसे तो लगता है कि उसके ज्ञान और शक्ति का सही उपयोग होना चाहिए। सो उसे जितना सही लगता है उतना तर्क करता है लेकिन चूँकि उसके अंदर सत्य और धर्म के प्रति गहरी आस्था है सो वह चाहता है कि उसे वह सलाह मिल सके जिससे सत्य और धर्म का उसका मार्ग विचलित न हो। इसी कारण से उसे अपने मत पर भरोसा नहीं होता। हम सभी को भी चाहिए कि हम खुद से जरुर प्रश्न करें कि जो हम करने जा रहें हैं क्या वह सत्य और धर्म के अनुरूप होगा।
आखिर इस धर्म का तातपर्य है क्या। वस्तुतः धर्म कोई सम्प्रदाय नहीं। अब तक अर्जुन ने जो कुछ भी धर्म , सनातन धर्म या कुटुम्ब धर्म के बारे में कहा है यह उसकी परम्परागत सोच का परिणाम है। लेकिन धर्म की समझ के लिए हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। आगे श्रीकृष्ण बताएंगे कि धर्म है क्या। अभी तो इतना ही समझना जरूरी है कि एक जागरूक विद्यार्थी की भाँति अर्जुन अपने ज्ञान के प्रति शंकालु है और चाहता है कि उसकी शंका का समाधान हो। जब हमारे अंदर शंका समाधान की ईक्षा उतपन्न होती है तब हम गुरु की शरण में जाते हैं।
ध्यान दें कि अर्जुन श्रीकृष्ण से अनुरोध करता है कि वे उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें। वह श्रीकृष्ण को गुरु नहीं कहता बल्कि खुद को उनका शिष्य बताता है। अभिव्यक्ति की यह भाषा बताती है कि अर्जुन में सत्य और धर्म को, अपने कर्तव्य कों समझने और जानने की अद्भुत बेचैनी है। यही बेचैनी हमारे अंदर आ जाये तो हमारा अहंकार मिट जाए। जैसे ही हम स्वीकार करते हैं कि हमें सत्य नहीं पता और हम सत्य का ज्ञान चाहते हैं वैसे ही हमारा भ्रम और भ्रम जनित अहंकार समाप्त हो जाता है। यंही से सत्य का मार्ग प्रशस्त होता है।