गीता अध्याय 1 श्लोक 46
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यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्॥
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करने वाले को शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारक होगा
॥46॥
भ्रमित और अज्ञानी के सारे तर्कों से जब काम नहीं चलता तो अंत में तीन तर्क बचते हैं, एक धर्म की आड़ में अधर्म की राह चुनना, आदर्श की आड़ में अनाचार की रक्षा करना और अंत में अहिंसा के नाम पर आत्महन्ता बन जाना। पहले दो तर्क तो अर्जुन आजमा चुका है लेकिन श्रीकृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। तब उस बच्चे की तरह जो अपना मनमाफिक खिलौना नहीं मिलने पर फर्श पर ही अपना सिर पीटने लगता है, अब अर्जुन उसी हरकत पर उतर आता है। अभी तक तो वह धर्म की दुहाई कर दुर्योधन से लड़ने से इनकार कर रहा था। अब एक कदम आगे बढ़कर अहिंसा की प्रतिमूर्ति बनने का स्वांग करता हुआ कहता है कि यदि कौरव पक्ष के लोग उस निहत्थे अर्जुन को मार भी देंगे तो भी अर्जुन यही मानेगा कि युद्ध के मुकाबले ये ज्यादा कल्याणकारी है।
हम सब के मन में जीतने की ईक्षा होती है। यह प्रसंग युद्ध का है लेकिन हर प्रसंग में हम जीतना चाहते हैं। लेकिन जीत के लिए जब हम वास्तविक कर्म के मैदान में उतरते हैं तब हमें पता चलता है कि इस अपेक्षित और इक्षित जीत के लिए तकनीकी जानकारी के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कौशल की जरूरत होती है। अगर वो कौशल नहीं है तो आप तमाम तकनीकी जानकारियों के भी सफलता नहीं प्राप्त कर पाते। हो सकता है कि किसी लक्ष्य को पाने की तमाम तकनीकी जानकारी तो है आपके पास लेकिन जो मानसिक और आत्मिक कौशल चाहिए , जो साहस और सूझ बुझ चाहिए वह नहीं है तो जीतने और लक्ष्य को पाने की बात तो दूर ,आप वह कार्य शुरू ही नहीं कर पाएँ।
जब आप ऐसा नहीं कर पाते तब आपको अपनी झेंप मिटानी होती है। आपको दिखाना होता है कि आपके तकनीकी गुण पूर्ण हैं , आपमें किसी भी मानसिक कौशल का अभाव भी नहीं है लेकिन आप मानवता की सेवा के लिए ये सब त्याग देना चाहते हैं, कर्म छोड़कर मृत्यु की वरण करना उचित समझते हैं। युद्ध की स्थिति या युद्ध जैसी स्थिति में आप इसे अहिंसा का नाम देते हैं। आप दिखाना चाहते हैं कि आप किसी का रक्त नहीं बहाना चाहते क्योंकि यह आपके धर्म के विपरीत है , मानवता के विरुद्ध है सो आप अपनी जान देकर चाहते हैं कि आप युद्ध रोकने का प्रयास कर अमर बन जाएं।
ये सोच भले ही समाज और व्यक्ति दोनों के लिए खतरनाक होती है किंतु भ्रम से भ्रष्ट बुद्धि समस्या का निराकरण करने में जब असमर्थ होती है तो व्यक्तिअपनी असमर्थता छुपाने वास्ते आत्मबलिदान की मिसाल देने का ढोंग करता है। अपनी असफलता, अपने भ्रम से ऐसा इंसान जो क्षति समाज को पहुँचाता है वो इतना बड़ा होता है कि उसका आकलन करना भी मुश्किल होता है। अर्जुन के पास अब कुछ भी ऐसा सार्थक नहीं है जो वह कह सके सो आत्म बलिदान की या सही कहें हो आत्महत्या की बात करता है ताकि श्रीकृष्ण अब भी पिघल जाएं और उसे मानव इतिहास का सबसे बड़ा अपराधी होने से बचा लें।
ध्यान दें अब तक के पूरे प्रसंग में अर्जुन शत्रु पक्ष की शक्ति से कँही भी डरा हुआ नहीं दिखता। वो डरता है तो धर्म की अपनी गलत समझ से। जब हम सही और गलत को नहीं समझ पाते, जब हमारी बुराई हमारी अच्छाई पर भारी पड़ने लगती है तो विवेक नष्ट होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम ये नहीं समझ पाते कि न्याय, धर्म, सत्य और अहिंसा अन्याय, अधर्म, असत्य और हिंसा से किस प्रकार भिन्न है। सो दिग्भ्रमित मन कमजोर पड़ जाता है, आत्मविश्वास डीग जाता है, और मन व्यथित और व्याकुल होकर अनर्गल निर्णय लेने लगता है। महाभारत का युद्ध बाहरी तो बहुत बाद का है, मानसिक और आत्मिक बहुत पहले से है। मन और आत्मा के स्तर पर जो इस युद्ध को जीतेगा बाहरी मैदान भी वही जीतेगा। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उस लक्ष्य के अनुरूप तकनीकी ज्ञान तो अनिवार्य है लेकिन वह तकनीकी ज्ञान तभी परिणाम देगा जब आत्मिक बल मजबूत है और आत्मिक बल तभी मजबूत होगा जब आपके अंदर आपके दैवी गुण उत्कृष्ट अवस्था में हैं।