गीता अध्याय 1 श्लोक 41 से 44
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अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥
हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है
॥41॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं
॥42॥
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
इन वर्णसंकरकारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं
॥43॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥
हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं
॥44॥
अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से कोई समर्थन न पाकर विचलित होता दिखाई दे रहा है। लेकिन उसके पास श्रीकृष्ण को समझाने का कोई और उपाय नही रह गया है। सो वो अपने पिछले तर्क को ही नए तरह से धर्म की आड़ लेकर फिर से कहता है। जब दो जनों में वाद विवाद होता है और जब एक के पास समझ और तर्क खत्म होने लगते हैं लेकिन वो हार मानने के लिए तैयार नही होता तो फिर से अपने पुराने तर्कों को ही नए ढंग से कहने का प्रयास करता है। सत्य को स्वीकारने के लिए जिसमें न तो साहस हो न ही ज्ञान वो असत्य के समर्थन में कोई न कोई नया तर्क खोजेगा ही। इसी कारण अब अर्जुन अपने तर्क को नई भाषा देता है कि युद्ध में अगिनत लोगों के मारे जाने से समाज में स्त्रियों का चरित्र गिरेगा, जिससे वर्णसंकर पैदा होंगे। इससे पारिवारिक परम्परा का लोप होगा, पिंडोत्तक क्रिया समाप्त होगी, पितर रुष्ट होंगे, और परिणाम में सनातन धर्म और जाति धर्म नष्ट होंगे। अर्जुन के तर्क प्रथम दृष्टया बहुत सही लगते भी हैं। लगता है अर्जुन हिंसा का घोर विरोधी है।आगे चलकर श्रीकृष्ण अर्जुन के इन तर्कों पर गहरा प्रहार करते हैं। अर्जुन का तर्क है कि जो पारिवारिक परम्परा है, उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन धर्म भ्रष्ट करता है। कुल ही धर्म का रक्षक है, वाहक है। उसके तर्कों के अनुसार यदि कुल में दुष्ट, अत्याचारी हों तो कुल की परम्परा, यानी कुलधर्म यानी सनातन धर्म को हानि नहीं होती बल्कि हानि तब होती है जब ऐसे दुष्ट, अनाचारी लोगों का अंत होगा क्योंकि इससे कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं और एक जाति की स्त्रियों का दूसरी जाति के पुरुष से सन्तान जन्म लेते हैं जो वर्ण संकर कहलाते हैं जिनमें किसी कुल की परंपरा नहीं होती। है न विचित्र तर्क ये!
इसी प्रकार अर्जुन जन्म आधारित वर्णव्यस्था का समर्थन भी करता है और स्पष्ट रूप से जन्म आधारित जाति व्यस्था, स्त्रियों की शुद्धता जैसी चीजों के समर्थन में खुलकर आता है। उसकी समझ है कि यदि कुल भ्रष्ट होता तो सन्तानें भी भ्रष्ट होंगी जिससे पूर्वजों द्वारा संचित की गई कीर्ति भ्रष्ट हो जाएगी। अर्जुन की नजर में स्त्रियों के शारीरिक रूप से भ्रष्ट होने से जाति और वर्ण की व्यवस्था समाप्त होती है जबकि पुरुषों के आतताई, अनाचारी, अन्यायी होने से कुल भ्रष्ट नहीं होता। साफ साफ दिखाई दे रहा है कि अर्जुन कुतर्क करने पर अमादा है। उसकी अहिंसा में अत्याचारी और अधर्मी की तो चिंता है लेकिन धर्म और आचार विचार की रक्षा की चिंता नहीं है। वह बार बार धर्म के भ्रष्ट होने की दुहाई तो दे रहा है लेकिन उसका धर्म विचित्र है जिसमें अधर्मी के नष्ट होने से धर्म खतरे में पड़ता दिखता है, कुल की परंपरा नष्ट होते दिखती है लेकिन अधर्म अनाचार के खात्मे के लिए क्या किया जाना उचित होगा, ऐसा क्या किया जाना जरूरी है जिससे समाज से आसुरी शक्तियो का प्रभुत्व खत्म हो इसके बारे में कोई तर्क नहीं है। बार बार स्त्री की शुद्धता और जाति की शुद्धता का ही तर्क है उसके पास। इस प्रकार उसकी अहिंसा में अनाचारी के हिंसा के प्रतिकार का कोई रास्ता नहीं है, बल्कि उसके सामने समर्पण की वकालत ही उसका तर्क है।
इसी प्रकार अर्जुन की नजर बृहत्तर समाज के बृहत कल्याण पर नहीं है बल्कि उसे कुल की रक्षा समाज की रक्षा से ज्यादा जरूरी लग रहा है।
यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जो स्वार्थ के अधीन होकर सिर्फ और सिर्फ अपना, अपने परिवार के कल्याण के बारे में सोचता है भले कुल की कीमत पर समाज को हानि ही क्यों न उठानी पड़े।