गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 9 & 10
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संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥
संजय बोले- हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान् से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
॥9॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
॥10॥
अब तक तो स्पष्ट हो चुका है कि अर्जुन अपनी ही बुद्धि के तर्कों के कारण शोक , भ्रम और अनिर्णय की स्थिति में है सो हथियार डालकर चुप हो जाने के सिवा उसके पास अपनी बुद्धि के अनुसार कोई और मार्ग बचा नहीं है सो वह वही करता है। लेकिन गीताकार ने शब्दों के चयन से कई तथ्यों को रेखांकित कर दिया है। अर्जुन को दो नामों से सम्बोधित किया गया है, गुडाकेश और परन्तप यानी निंद्राविजयी और शत्रुओं का दमन करने वाला अर्थात अर्जुन के वास्तविक चरित्र को गीताकार में दिखाया है और हम सभी को यह भी याद दिलाया है कि महाज्ञानी, महाशक्तिशाली भी भ्रम में पड़कर अनिर्णय की स्थिति में आ सकते हैं। ये हमारे लिए वार्निंग बेल के समान है, खतरे की घण्टी है जो हमें सचेत करती है कि यदि हम भ्रम, मोह, माया में पड़े तो तमाम क्षमता के बावजूद हम कृपणता और कायरता के शिकार होकर नपुंसकता को प्राप्त कर सकते हैं जिस अवस्था में हमसे निर्णय नहीं लिया जा पाता और हम तमाम तकनीकी ज्ञान के बावजूद भी प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं।
लेकिन इस अवस्था में अर्जुन किससे मदद माँग रहा है जरा इसपर भी देखें। श्रीकृष्ण की शरण में आया है अपनी बुद्धि शोधन के लिए और श्रीकृष्ण कौन हैं गीताकार के शब्दों में! वे हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी और गोविंद यानी सारी धरती उन्ही की है। अर्थात जब हमारा मन भ्रमित हो जाता है, जब हमें धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य का भान नहीं होता तब हमें किसके पास जाना चाहिए, किसकी मदद लेनी चाहिए इसपर विचार करना अत्यावश्यक है लेकिन उसके पहले हमें ये भी ध्यान रहे कि हम भ्रम में हैं इसकी स्वीकारोक्ति अनिवार्य है अन्यथा हम भी दुर्योधन की तरह अपने भ्रम और मोह , अहंकार और मूर्खता के प्रति बन्धे हीं रह जाएंगे जीवन भर। जिनको अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में आने भ्रम का अहसास तक नहीं होता वो खुद गुरुओं को ज्ञान देते फिरते हैं और अंत में नाश को प्राप्त होते हैं जैसा दुर्योधन ने किया और भोग। लेकिन भ्रम के प्रति शंका और उसकी स्वीकारोक्ति हमें अर्जुन की तरह बनाती है, हम भले ही कुछ समय के लियर भ्रमित होते हैं लेकिन इन भ्रम को जैसे ही पहचानते हैं हमें चाहिए कि हम शीघ्रताशीघ्र उसके सम्पर्क में आना चाहिए जिसे खुद अपने इन्द्रियों यानी अपने सेंसेस पर नियंत्रण हो और जो अपने शरीर का खुद स्वामी हो । यानी कृष्ण की शिक्षाओं की शरण में आना चाहिए।
जब हम स्वीकारोक्ति के साथ और पूर्ण समर्पण के साथ गुरु की शरण में आते हैं तब हमें ज्ञान मिलता है, तभी गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान हमारे अंदर टिकता भी है। हमारी इसी अवस्था में गुरु यानी श्री कृष्ण हमें ज्ञान देते हैं। अब चूँकि अर्जुन अपनी गलती को समझ कर पूर्ण समर्पण के साथ आ चुका है तो अब उसे परमगुरु यानी श्रीकृष्ण के द्वारा उसे दी गई शिक्षा भी मिलेगी। ज्ञान प्राप्त करने हेतु अपने अज्ञान को स्वीकारना और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही एक मात्र रास्ता है।