SHRI MADBHAGWAD GEETA PREPERATION FOR GEETA GYAN(JUST BEFORE STARTING FROM 11TH SHLOKA OF SECOND CHAPTER)
गीताज्ञान प्राप्त करने की तैयारी(11वे श्लोक से आगे बढ़ने के पूर्व)
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श्रीमद्भागवद्गीता के द्वितीय अध्याय के 11वें श्लोक से श्रीकृष्ण अर्जुन को शिक्षा देना प्रारंभ करते हैं। प्रथम अध्याय के 23वें श्लोक से द्वितीय अध्याय के 10वें श्लोक तक, बीच में दो तीन श्लोक छोड़कर अर्जुन ही लगातार बोले जा रहा है। भ्रम और अपने मोह में फंसा हुआ अर्जुन युद्ध की तमाम क्षमताओं के रहते हुए भी युद्ध नहीं करने के ढेरों तर्क तो देता है लेकिन अपने ही तर्क से अपने ही असन्तुष्ट होकर फिर श्रीकृष्ण की शरण में सही मार्ग जानने के लिए आ भी जाता है। जब हमें लगता है कि हमारी बुद्धि भ्रम का शिकार हो रही है तभी हम गुरु की शरण में जाते हैं। बिना अपनी गलती का भान हुए कोई अपनी गलती सुधारने का प्रयास भी नहीं कर सकता।जब आपको अहसास होगा कि आप गलत हैं या गलत हो सकते हैं तभी तो आप सही को खोजियेगा अन्यथा दुर्योधन की तरह अहंकार में पड़े पड़े अपने अज्ञान पर इतराते नष्ट ही हो जाइयेगा। सो ज्ञान , धर्म, सत्य का मार्ग वही पकड़ पाते हैं जो ये जानते हैं कि उनकी गलती क्या है या जिनको लगता है कि वे गलत हो सकते हैं। अज्ञान का प्रायश्चित ज्ञान ही है। सो जब अर्जुन अपने अज्ञान के प्रायश्चित के लिए खुद को प्रस्तुत कर श्रीकृष्ण के मित्र से शिष्य की भूमिका में आता है तभी श्रीकृष्ण उसे शिक्षा देना प्रारम्भ करते हैं , उसके पूर्व नहीं।
सो यदि हम आप सत्य का मार्ग पकड़ना चाहते हैं तो जरूरी है कि हमारे अंदर असत्य और अज्ञान से छूटने की बेचैनी आनी चाहिए। हम किस स्तर के ज्ञानी हैं इसका कोई अर्थ नहीं। अर्थ है तो मात्र इस तथ्य का कि हमें लग जाए कि हम गलत हैं या गलत होने की संभावना है। सो अपने अहंकार और मोह को छोड़कर आइये हम सब गीता के लिए प्रस्तुत हों।
श्रीकृष्ण की शिक्षा हमारा परिचय हमी से कराएगी। हम देखेंगे कि श्रीमद्भागवद्गीता स्वयम को खोज लेने का प्रशिक्षण देती है। इसमें धर्म का किसी सम्प्र्याय वाला स्वरूप नहीं मिलेगा, कोई कर्मकांड नहीं मिलेगा, कोई ऐसा शार्ट कट नहीं मिलेगा जिससे तुरत फुरत हमें मन वांछित चीज मिल जाये। इसके विपरीत श्रीकृष्ण की शिक्षा हमें प्रशिक्षित करेगी कि किस प्रकार हम स्वयम की वास्तविकता को जान कर अपना कर्तव्य निर्धारित कर पाएंगे।
ध्यान रहे हर ज्ञान की अपनी शब्दावली होती है जो कई बार उन शब्दों के प्रचलित अर्थों से भिन्न होती है। श्रीमद्भागवद गीता के साथ भी हमें यही मिलेगा। सो कई बार हम शब्दों के प्रचलित शाब्दिक अर्थों से बाहर भी जाएंगे।
यह भी ध्यान रखें कि गीता संसार त्यागने की कुंजी नहीं है बल्कि संसार में रहकर संसार में अपने कर्तव्यों को निर्धारित करने की विधि का प्रशिक्षण है। इसीलिए जीवन के हर पग पर गीता की शिक्षा व्यवहारिक भी मिलेगी और अनुकरणीय भी।
तो कल से हम सब गीता के 11वें अध्याय से श्रीकृष्ण की शिक्षा का प्रशिक्षण लेना प्रारम्भ करेंगे।