गीता - अध्याय 1 श्लोक 24 एवं 25
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संजय उवाचः
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥
संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा कहे अनुसार महाराज श्रीकृष्णचंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा कर इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख
॥24-25॥
श्रीकृष्ण अर्जुन के कहे अनुसार रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले आकर खड़ा करते हैं। अर्जुन को गीताकार ने गुडाकेश नाम से सम्बोधित किया है। गुडाकेश का अर्थ है जिसने निंद्रा पर विजय प्राप्त कर लिया हो। यह वर्णन युद्ध क्षेत्र का है सो युद्ध के अनुरूप अर्जुन के जो गुण हैं उनका वर्णन गीताकार के द्वारा यथा स्थान किया गया है। निंद्रा को कठोर परिश्रम से ही जीता जा सकता है। निंद्रा अंधकार का प्रतीक है, मन मस्तिष्क के सुप्तास्था का परिचायक है । निंद्रा के समय हमें बोध नहीं होता, हम सचेत नहीं होते। लेकिन युद्ध क्षेत्र में निरन्तर सजग और सावधान रहने की जरूरत होती है। यह तभी सम्भव है जब हम निंद्रा पर जीत हासिल कर पाएं हों। कभी भी , कँही भी जब हम बड़ी चुनौती से आपने सामने होते हैं तब हमारी सजगता अति उच्च स्तर की होनी ही चाहिए। थोड़ी भी शिथिलता मंहगी पड़ सकती है, समस्या किसी भी कोने से अचानक आकर हमें घेर ले सकती है, सो हम निशिन्त होकर आरामतलबी होने का जोखिम नहीं ले सकते। सो इन तरह की स्थितियों में हमें गुडाकेश ही होना होगा। बड़ी चुनौती से हम तभी निपट सकते हैं जब हमारा परिश्रम, हमारी सजगता अति उच्च स्तर की हो।
निंद्रा यानी चेतना का अभाव तब भी होता है जब हमारी बुराइयाँ हमारी अच्छाइयों को ढँक लेती हैं और हम अपने दुर्गुणों के व्यसन में डूब अच्छे बुरे के भान से अनजान बन जाते हैं। इसके उलट यदि हम अपनी अच्छाइयों के बल पर हैं तो फिर हमारे सद्गुण हमें हमेशा सजग रखते हैं कि हम कँही भी , कभी भी अपनी अच्छाई से गिर कर दुर्गुणों के अंधकार में न चलें जाएँ। यहॉ सजगता हमें हमारे महान उद्देश्य में सफल बनाती है।
अर्जुन वीर होने के साथ साथ विवेकी और सच्चरित्र भी है, उसे अपने दुर्गुणों को काट कर अपने सदगुणों को बढाने आता है। इस दृष्टि से भी अर्जुन गुडाकेश है। हमें भी इस प्रकार निंद्रा विजयी यानी दुर्गुणों का विजेता होना चाहिए।
अब देखिए श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को कँहा ले आकर खड़ा करते हैं। दोनों पक्षों के बीच ठीक भीष्म और द्रोण के समक्ष। यदि कृष्ण चाहते तो रथ दुर्योधन के सम्मुख भी खड़ा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे सीधे भीष्म और द्रोण के सामने अर्जुन को ले आये। यदि सामने दुर्योधन रहता तो कदाचित गीता वाचन का अवसर भी नहीं आता और सीधे युद्ध प्रारम्भ हो जाता। दुर्योधन और अर्जुन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घोर वैर था। दुर्योधन ही वह प्रमुख कारक था जिसके कारण पांडवों को इतने कष्ट उठाने पड़े थे। लेकिन तब जो युद्ध होता उसमें धर्म का कोई स्थान नहीं होता। वह युद्ध दुर्योधन के लालच रूपी अधर्म और अर्जुन के बदले की भावना रूपी अधर्म के बीच होता जिसमें मूल्यों का कोई स्थान नहीं होता। तब बुराई से अच्छाई नहीं लड़ रही होती बल्कि एक बुराई दूसरे बुराई से लड़ रही होती। इसके परिणाम स्वरूप बुराई ही अंत परिणाम के रूप में सामने आती। हम एक कि बुराई को दूसरे की बुराई से नहीं हरा सकते, क्योंकि कोई भी बुराई का परिणाम अच्छाई नहीं होती। तब एक कि बुराई दूसरे की बुराई से बस स्थान्तरित हो जाती है। एक अधर्म का स्थान दूसरा अधर्म ले लेता है। लालच और बदले की भावना में क्या हो जाता यदि एक का लालच हार ही जाता तो। बस यही होता कि बदले की भावना जीत कर प्रतिशोध का साम्राज्य कायम कर देती। तब वैमस्य का कँहा अंत होता। तब ये युद्ध धर्म युद्ध होता ही नहीं। हमें कभी भी एक बुराई को हराने के लिए दूसरे बुराई का सहारा नहीं लेना चाहिए।
सो कृष्ण अर्जुन को भीष्म और द्रोण के समक्ष ले जाते हैं। यँहा दोनों के बीच कोई वैमस्य नहीं है। यँहा एक सम्भावना है कि अर्जुन को अपने आदरणीय अंग्रजो को देख कर अपनी करुण भावनाओं , अपने मोह से संघर्ष करना पड़े। जब हमारे स्वजन, हमारे आदरणीय गलती करते हैं तो हम मोह वश उनकी गलतियों से आँख मोड़ना चाहते हैं। लेकिन ऐसा कर हम बुराइयों को प्रश्रय ही देते हैं। एक प्रकार से अधर्म के बढ़ोतरी में सहायक ही होते हैं। सो जब हमारे अंदर अच्छाई और बुराई का संघर्ष हो तो हमारी समझ इतनी होनी चाहिए कि हम बुराई का साथ न दें। यही बात हमारे कार्यक्षेत्र में भी लागू होती है। जो गलत के रास्ते पर है या जो अधर्म के रास्ते पर है, भले ऐसा करने वाला हमारा कितना भी प्यारा क्यों न हो, भले हमारा अपना ही अंग क्यों न हो, हमें अपनी मानसिक अवस्था इतनी मजबूत रखनी चाहिए की हम उसके बुराइयों का प्रतिवाद और प्रतिकार कर सकें।
भीष्म भ्रम और द्रोण गुरु होने के नाते द्वैत के प्रतीक हैं। अच्छे और बुरे के संघर्ष में अच्छाई का पहला सामना भ्रम से होता है। यह भ्रम अच्छाई को अपने मोह पाश में लेकर उसकी मति मारना चाहता है। तरह तरह के तर्क देता है, भय, लालच, अहंकार, असत्य , हिंसा इत्यादि को जन्म देता है। दूसरी तरफ गुरु हमें इस बात का भान दिलाता है कि यदि हमें जीत हासिल करनी है तो हमें सन्मार्ग पर बढ़ने का रास्ता चुनना होगा। जब भी हम बड़ी चुनौतियों से दो चार होते हैं तो सबसे पहले हमें अपने भ्रम को मारना होता है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। अच्छाई के प्रति, सही के प्रति हमारी परतबढता अटूट होनी चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को एक मौका देते है कि भीष्म यानी भ्रम के बहाने अर्जुन मोह से दूर होकर सत्य के प्रति परिबद्ध हो सके। अर्जुन का रथ भीष , द्रोण और पृत्वी के समस्त राजाओं के मध्य खड़ा है। हमारे सामने अभी अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ खड़ी हैं । जरूरी है कि हम अपनी प्रतिबद्धता अच्छाई के प्रति साबित कर सकें। हर बड़ी चुनौती सामबे आने पर हम सभी के सामने ऐसी हो परिस्थिति रहती है। यदि हम सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमारी मानसिक स्थिति भ्रम को काटने वाली होंनी ही चाहिए। किंकर्तव्यविमूढ़ता को हराये बिना हमारी नजर साफ ही नही हो पाती। श्रीकृष्ण अर्जुन को अच्छाई और बुराई के इस महाभारत में बुराई से लड़ने के लिए उज़के गुणों से तैयार करना चाहते हैं। हमें बुराई को हराने के लिए, अनीति को हराने के लिए सिर्फ शरीर से ही नहीं विवेक से भी मजबूत होना होता है और ये तभी होता है जब हम बुराई के बतरंजाल से उससे सीधे सीधे उलझ कर बाहर आते हैं।
अर्जुन के लिए पार्थ सम्बोधन श्रीकृष्ण प्रयोग में लाते हैं। कुंती का एक नाम पृथा भी है, अर्जुन को उसके माँ के नाम से जोड़कर श्रीकृष्ण सम्बोधित करते हैं। यानी माँ कुंती के सारे गुण अर्जुन में भी हैं ये इस तथ्य का प्रतीक है। पृथा पार्थिव का भी द्योतक है यानी जो मिट्टी का बना है अर्थात जो नाशवान है। मतलब जब जब हम अपने इस मिट्टी के नाशवान शरीर को ही बुराई से लड़ने का साधन बना लेते हैं तब हम पार्थ हैं। हमारा शरीर ही वो रथ है जिसपर सवार होकर हम सन्मार्ग पर चलते हैं।
अब देखें, अर्जुन को ये प्रेरणा कौन दे रहा है। ये प्रेरणा हृषिकेश दे रहे हैं यानी जो इन्द्रियों के स्वामी दे रहें हैं। मतलब की हमारी प्रेरणा का मूल स्रोत हमारा विवेक ही है। यही बतलताता है कि हमे क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है।
फिर श्री कृष्ण कहते हैं, युद्ध के लिए जूट हुए इन कौरवों को देख पार्थ। यानी अर्जुन को देखने का निर्देश श्रीकृष्ण दे रहें हैं। हमने पूर्व में देखा है कि कौरव पक्ष में ये निर्देश दुर्योधन देता है। वह अहंकार और बेचैनी में गुरु द्रोण को पांडवों वीरों को देखने के लिए कहता है। लेकिन इसके विपरीत यँहा हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण जो इन्द्रियों के स्वामी हृषिकेश हैं, विवेकी हैं वो अर्जुन को कह रहे है समस्त कुरुओं यानी कौरव और पांडव दोनो। को देखने के लिए कहते हैं। कौरव और पांडव दोनों ही कुरुवंशी ही हैं। श्री कृष्ण दुर्योधन की तरह योद्धा विशेष का नाम नहीं गिनाते। विवेक स्वाभाविक रुक से इंसान को यही समझाता है कि कोई भी कार्य करने के पूर्व उससे जुड़ी अच्छाई और बुराई, उससे जुड़े सद्गुण और दुर्गुण, उससे जुड़े सही और गलत दोनों को देखे। यदि हम कुछ करने जा रहें हैं तो हमें ठहर कर हर पक्ष का ठीक से अवलोकन कर लेना चाहिए। अन्यथा हम सही और गलत का निर्णय नहीं कर सकते और ऐसी स्थिति में सफलता के लिए कुछ भी गलत सही करने के लिए तैयार तैयार हो जाएंगे जिसके कारण बहुत ही विनाशकारी परिणाम भी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश विवेक का निर्देश ही तो है।