गीता अध्याय 1 श्लोक 30 से 37
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गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥
हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ
॥30॥
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
॥31॥
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
॥32॥
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥
हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं
॥33॥
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं
॥34॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥
हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या है?
॥35॥
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा
॥36॥
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
॥37॥
मोह से पीड़ित व्यक्ति की मानसिक स्थिति बिगड़ती जाती है, वो अधीर, चंचल, अस्थिर, व्याकुल होकर शक्तिहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसमें शारीरिक बल भी नहीं रह जाता। मन से कमजोर इंसान शरीर से भी प्रतिकार करने लायक नहीं रह जाता। यही कारण है कि हर प्रतिद्वंद्विता और प्रतिस्पर्द्धा में पहले विरोधी के मानसिक बल को तोड़ने की रणनीति बनाई जाती है और माना जाता है कि यदि आप प्रतिद्वंद्वी को मानसिक स्तर पर हरा देते हैं तो फिर शारीरिक स्तर पर हराना मात्र औपचारिकता भर होता है। दुर्गुण यानी आसुरी शक्तियाँ भी दैवी गुणों(सद्गुणों) के साथ की लड़ाई में यही करती हैं। आसुरी गुण यानी दुर्गुण झुण्ड में व्यक्ति के बुद्धि विवेक पर आक्रमण करती हैं। भ्रम, मोह, माया, क्रोध, निराशा, अहंकार ये सभी एक साथ हमारे विवेक को घेरती हैं, नतीजा ये निकलता है कि यदि हमारे सद्गुण कमजोर पड़े तो हम हतोत्साहित होकर मानसिक रोगी की तरह आचरण करने लगते हैं। तब हम अपनी स्थिति को सही ठहराने के लिए अपने ही विवेक से कुतर्क करना शुरू कर देते हैं। सत्य से भागा हुआ मन सामाजिक रूप से ये तो नहीं स्वीकारता कि वो असत्य और अन्याय का साथ दे रहा है किंतु उसके तर्क घुमा फिरा कर यही कहते हैं।
मोह से विचलित अर्जुन की भी यही स्थिति है। अपराध , असत्य, अन्याय को सिर्फ इस आधार पर माफी देने का मोह कि दोषी उसके परिवार के और मित्रगण हैं को अर्जुन सीधे सीधे नहीं स्वीकारता बल्कि कई तरह के कुतर्क देता है। उसे ज्ञान नहीं है लेकिन वह दिखाना चाहता है कि वह बड़ा ज्ञानी है।
अर्जुन के तर्कों का सारांश यही है कि जिनसे युद्ध करना है वो सभी उसके स्वजन हैं , मित्र हैं जिन्हें मारना उचित नहीं है। वह यह तर्क भी देता है कि यदि स्वजनों को गँवा कर राज्य मिल भी जाय तो ऐसे राज्य के भोग का वह क्या आनंद उठा पायेगा। उसे लगता है कि सुख और आनंद बाँटने के लिए उसके स्वजन और मित्र ही न हो तो फिर राज्य जीतने का क्या लोभ। इससे अच्छा तो उन्हें नहीं मारना है भले वे अर्जुन को मार डालें। अर्जुन यँहा तक कह जाता है कि उसके ये स्वजन भले ही आतताई हों लेकिन उन्हें मारने से तो अपने ही कुल का नाश होगा जिससे सुख नही मिलेगा। सो अर्जुन युद्ध से इनकार करता है।
इस प्रकार अर्जुन तर्क पर तर्क दिए जा रहा है और कृष्ण कुछ बोल ही नहीं रहें हैं। अर्जुन के इन तर्कों का यदि परीक्षण करें तो कई तथ्य खुलकर सामने आते हैं।
अर्जुन की नजर में अपराध से ज्यादा महत्व अपराधी का है। यदि अपराधी अपने कुल परिवार का है तो उसके सारे खून माफ कर दिए जाने चाहिए। यँहा तक कि यदि अपने कुटुम्ब के लोग आतताई भी हों अर्थात ऐसे लोग जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के साथ अन्याय पूर्वक हिंसा करते हों तब भी उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ देना चाहिए कि वे अपने परिवार के हैं, अपने मित्र, दोस्त, सम्बन्धी हैं। इस प्रकार अर्जुन एक ऐसी व्यस्था का समर्थन करने में लगा है जँहा न्याय पीड़ित को नहीं पीड़ा देने वाले को दिए जाने का सिद्धांत होता है। यदि कोई अपराधी आपके पिता की हत्या कर देता है और वो हत्यारा किसी मजबूत का कोई सम्बन्धी है तो उसे सजा नहीं दी जाय। ईद प्रकार लगातार अपराध की श्रृंखला तैयार होती जाएगी। लेकिन सम्बन्धों के मोह में पड़ा व्यक्ति निर्लज्जता से इस तर्क के पक्ष में खड़ा मिलता है। अर्जुन शासक वर्ग से आता है जिसे दण्ड देने का अधिकार है। यदि शासक ही ऐसा मानेगा तो प्रजा का क्या हाल होगा आप खुद अनुमान कर लें। लेकिन मोह से घिरा मन इस अनीति इस अन्याय को नहीं समझ कर इसे ही नीति का नाम दे देता है। राजनीति की ये धारा आज भी है क्योंकि मोह तो आज भी जिंदा है। जँहा मोह होगा वंही अन्याय का वास भी होगा। ऐसी स्थिति से समाज में अनाचार का प्रभुत्व बढ़ेगा, अपराध और अन्याय बढ़ेगा। हम सभी अपने अपने मोह में यही करते रहते हैं। अपनी अपनी स्थिति, अपने अपने हैसियत के अनुसार अपने परिजनों और मित्रों के कुकर्मों को नजरअंदाज करते रहते हैं। नतीजा में एक ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था का निर्माण होता है जिसमें बेखौफ अपराधियों का भाई भतीजेवाद के बल पर प्रभुत्व कायम रहता है और सामान्य जन इन चंद लोगों के रहमो करम पर रहने के लिए विवश होते हैं। इस सोच से घोर अस्मांतावादी समाज बनता है जिसमें ताकतवर के सभी दोष सिर्फ इसलिए माफ कर दिए जाते हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध सत्ता में बैठे लोगों से होता है। परिणामतः समाज में हर तरह के अपराध, अन्याय, असत्य अवगुण का राज स्थापित हो जाता है। अनीति को, अन्याय को , अत्याचार को बर्दाश्त करने की सीख अर्जुन दे रहे होते हैं। जब हम अन्याय, अनाचार , अत्याचार को बर्दाश्त करते हैं तो हम उनको बढ़ावा दे रहें होते हैं। अन्याय के प्रति सहनशीलता समाज में अराजकता को जन्म देती है। सो ये जरूरी होता है कि अन्याय, अत्याचार , अधर्म और अनीति को बर्दाश्त नही कर उनका सक्रिय प्रतिकार किया जाए ताकि समाज में नीति का राज और शांति की व्यवस्था कायम की जा सके।
दूसरी बात कि मोह से घिरा मन चालाकी से अपने अज्ञान को ही ज्ञान बताकर प्रचारित करता है। अर्जुन राज्य त्याग की बात कर ये दिखाता है कि वह तो महान त्याग परम्परा का सन्त है जिसे राज पाट से कुछ लेना देना नहीं है बल्कि उसके अंदर तो सन्यास भाव है। हम में से कई लोग , विशेषकर समाज के ताकतवर लोग इस तरह का ढोंग खूब करते हैं और खुद को साधु, सन्त, फकीर कहते नही अघाते और गीताज्ञान से वंचित जनता उनके बहकावे में आकर उनपर भरोसा कर उनको पूजने भी लगती है। दरअसल ध्यान देने की बात है कि अर्जुन क्या तर्क दे रहा है। उसका कहना है कि बन्धु, बाँधवों, मित्रों को गंवाकर प्राप्त राज्य का वह क्या करेगा जब उसका सुख भोगने के लिए ये बंधु बाँधव मित्र ही न हो उसके साथ। मतलब साफ है कि अर्जुन को राज पाट तो चाहिए लेकिन दुर्गुणों से भरे दोस्त मित्र और सम्बन्धी भी चाहिए। या यूं समझें कि अर्जुन को राज पाट सब चाहिए बस उसके माथे इन इष्ट मित्रों परिजनों की हत्या का दोष न लगे। मतलब साफ है। गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज करें! यह भला कौन सा सन्यास है जो सुविधा की शर्त पर टिका हुआ है। आज भी ऐसे ढोंगी सन्यासी खूब मिलते हैं जो इसी तर्क के बल पर समाज के औराधियो को संरक्षण देकर उसकी कीमत में भौतिक सुख सुविधा और सत्ता का सुख उनसे लेते हैं।
अर्जुन के इन तर्कों से समाज में अपराध और सत्ता के गठबंधन की नींव पड़ती है।
महाभारत का युद्ध आंतरिक युद्ध पहले है, बाहरी युद्ध बाद में है। हमारे अंदर की बुरी प्रवृत्तियाँ जब अच्छी प्रवृत्तियों पर हावी होती हैं तो भ्रम उनका अगुआ होता है जो मोह को हमारे विवेक के ऊपर छोड़ता है। अगर मोह हावी हुआ तो बुद्धि और विवेक अपना प्रभाव खो देते हैं। ऐसी स्थिति में इंसान का व्यवहार ठीक शब्दसः वही होता है जो अबतक हम अर्जुन का देख रहें हैं। उसकी मानसिक हालत और उसके कुतर्क भी वही होते हैं। ऐसा नहीं कि इसका प्रभाव सिर्फ युद्ध जैसी स्थिति में ही होता है। जीवन के हर मोर्चे पर हमारे अंदर हमारी ही बुराई हमारी ही अच्छाई से लड़ रही होती है और जब जब बुराई हावी होती है हम भी इसी मानसिक शारीरिक बौद्धिक स्थिति में गिर जाते हैं और कुतर्कों का जाल बुनने लगते हैं खुद को सही ठहराने के लिए।
श्रीकृष्ण अभी तक चुप हैं। उनका चुप रहना एक मनोवैज्ञानिक योजना का अंग है। जब एक अच्छा भला इंसान किसी वजह से विवेक खो दे तो उसे पहले जी भर कुतर्क कर लेने दें ताकि वो अपनी बात कह कर खुद को मानसिक रूप से हल्का कर सके। तब ही उसे समझाना उचित होता है, अन्यथा वह आदमी अनावश्यक वाद विवाद में पड़ा रहेगा और आपको भी खींचता रहेगा।