नेतृत्व की लोकतांत्रिक विधा
यदि नेतृत्व करने वाला अपने आचरण और अपनी उपलब्धियों के उदाहरण को अपने अनुयायियों के समक्ष रखकर उनसे उस मार्ग का अनुसरण करने की अपेक्षा करता है तो उसके अनुयायी स्वतः उसके द्वारा बताए मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। ऐसा श्रेष्ठ व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणा स्रोत बन जाता है, उसे लोग रोल मॉडल के रूप में स्वीकार करने लगते हैं और उस व्यक्ति के नेतृत्व में समाज में सद्भाव और उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है और संघर्ष की मात्रा का ह्रास होता है।
यही तो नेतृत्व का लोकतांत्रिक सिद्धान्त है जिसमें persuation का विशेष महत्व होता है और दमन का कोई स्थान नहीं होता है। हमें ऐसा लगता है कि यह लोकतांत्रिक व्यवहार आधुनिक दर्शन की देन है लेकिन यदि हम गौर करें तो पाते हैं कि इस लोकतांत्रिक नेतृत्व कला को श्रीमद्भागवद्गीता में बहुत पहले निरूपित किया जा चुका है। श्रीमद्भागवद्गीता के कई श्लोकों में श्रीकृष्ण नेतृत्व की इस विधा को समझाते हैं यथा तीसरे अध्याय के 26 और 29 वाँ श्लोक। इन श्लोकों में श्रीकृष्ण अर्जुन को इसी नेतृत्व कला की जानकारी खुद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर के देते हैं। जिनको कर्म के मार्ग का ज्ञान नहीं होता है वे तो मन की इक्षाओं की पूर्ति के लिए ही कर्म करते हैं। इक्षाओं कि पूर्ति की आवश्यकता से प्रेरित कर्म करने वाले सदा ही कर्मफल से बन्धें होते हैं। कर्मफल से बंधे होने के कारण उनको इक्षाओं से आगे कोई मार्ग नहीं सूझता। ऐसे लोग ही अज्ञानी कहे जाते हैं। ऐसा नहीं कि जो शिक्षित नहीं हैं वे ही अज्ञानी होंगे। जो कोई भी मात्र इक्षा पूर्ति के लिए जीवन जीता है , उसकी उपलब्धि चाहे जो हो वह अज्ञानी ही होता है। इसके विपरीत ज्ञानी वो है जिसे कर्मफल में कोई आसक्ति नहीं होती। समाज में दोनों तरह के लोग होते हैं। ज्यादातर लोग तो कर्मफल में ही बंधे होते हैं। तो प्रश्न उठता है कि फल में आसक्त लोगों के साथ अनासक्त व्यक्ति का व्यवहार कैसा होना चाहिए, क्या ऐसे ज्ञानी व्यक्ति को अज्ञानियों के साथ कोई जोर जबरदस्ती करनी चाहिए या उनको उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए? वस्तुतः यह ART OF PERSUATION है जो समाज में बिना संघर्ष उतपन्न किये समाधान की ओर ले जाता है। वस्तुतः ऐसे ज्ञानी लोगों को चाहिए कि वे फल में आसक्त लोगों को धीरे धीरे यकीन दिलावें कि कौन सा मार्ग जीवन के बृहत्त लक्ष्य के अनुरुप है। हमें स्मरण रहे कि इसके पूर्व भी श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि श्रेष्ठ जनों को चाहिए कि वे अपने आचरण के उदाहरण से लोगों को प्रेरित करें कि लोगों को किस प्रकार से कर्म करने हैं। ये विधि सामान्य लोगों में कर्म करने के अनासक्ति के तरीके में विश्वास दिलाता है। जब कोई श्रेष्ठ व्यक्ति अपने अनुयायियों को किसी बात में यकीन दिलाना चाहता है तो उस श्रेष्ठ व्यक्ति के भाषण से ज्यादा उसके आचरण का प्रभाव पड़ता है। बुद्ध और गाँध में भी इसी नेतृत्व क्षमता को पाते हैं। इतने और अन्य प्रमाणों से जाहिर होता है कि नेतृत्व की सर्वश्रेष्ठ विधा लोकतांत्रिक ही होती है। जो जबरन अपनी बात मनवाने की चेष्टा करता है वह नेता हो ही नहीं सकता।