जन्म आधारित पहचान
क्या व्यक्ति की कोई धार्मिक पहचान हो ही जरूरी है? इतिहास के कुछ कारागार आज भी जीवित हैं और धार्मिक पहचान भी उन्हीं कारागारों में से एक है, अन्य हैं राष्ट्रीय पहचान, नस्लीय पहचान, जातीय, लैंगिक पहचान , इत्यादि। जो पहचान जन्म की घटना पर आधारित होते हैं वे व्यक्ति की स्वतंत्रता को , उसके निजित्व को और उसके सामाजिक स्वीकार्यता को प्रभावित करते हैं। आप जीवन भर उस घटना का भार ढोने के लिए विवश कर दिए जाते हैं जिसके घटित होने में आपका कोई न तो योगदान रहा है और न ही आपकी सहमति या असहमति ही रही है। जिस चीज के लिए आप उत्तरदायी नहीं हैं उसके परिणामों को झेलने के लिए क्यों विवश कर दिया जाता है? इस तरह की व्यवस्था में हमेशा ही असमानता बनी रहती है और यह असमानता हर कदम पर, हर स्तर पर होती है। और व्यक्ति जन्म आधारित असमानता और आसमान अवसरों और असमान परिणामों से पिण्ड नहीं छुड़ा पाता है। भारतीय दर्शन में श्रीमद्भादगीता में श्रीकृष्ण ने जन्म के अवसर की निरर्थकता पर प्रकाश डालते हुए कुलधर्म की परिकल्पना को तो खारिज कर ही दिया है, साथ ही जिन चार वर्णों को प्रतिपादित किया है उनमें प्रवेश और उनकी प्राप्ति हेतु व्यक्ति के कर्मों को और उसके आत्मिक गुणों को पैमाना बताया है। लेकिन महाभारत की इस कथा में भले ही सिद्धान्त के स्तर पर जन्म के महत्व को खारिज किया गया हो, लेकिन व्यवहार में पूरी कथा में जन्म आधारित परिणामों को प्रमुखता से जगह दी गई है जैसे कर्ण और एकलव्य की कथा जबकि राजघराने की स्त्रियों को इससे इम्युनिटी प्रदान की गई है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सिद्धान्त के स्तर पर जन्म आधारित पहचान का विरोध मानव सभ्यता में बहुत शुरुआत से ही रही है। आज 21वी सदी में जब सामाजिक संरचना पर तकनीकी उपलब्धि महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रही है, धर्म, नस्ल और जाति अपने वास्तविक कार्यों से ज्यादा राजनीतिक और आर्थिक कार्यों में हस्तक्षेप की कोशिश कर रहें है उस समय जन्म आधारित पहचानों को फिर से निर्णायक चुनौती देने का समय आ गया है। जन्म आधारित पहचानों के ही परिणाम स्वरूप आर्थिक असमानता का दौर खत्म नहीं हो रहा है और इस असमानता के पक्ष में सर्वाधिक बौद्धिक प्रयास उन अर्थशास्त्रियों और राजनीतिज्ञों के द्वारा किया जाता है जो समृद्ध वर्ग के संस्थानों से जुड़े हुए होते हैं क्योंकि वंही पर उनके वर्गीय हित जुड़े होते हैं। शिक्षा , स्वास्थ्य, रोजगार, आमदनी में पैदा हो रहे और बढ़ रहे असमानता पर कोई निर्णायक करवाई करने में ये वर्ग कोताही बरतते रहता है और इसी जन्म आधारित असमानता के दुष्परिणामों को यथावत बनाये रखने के लिए शहरी और ग्रामीण भेद को भी बरकरार रखने की कोशिश की जाती है।
इस प्रकार जन्म आधारित पहचान के कारागार में बंद कर समाज के बहुत बड़े वर्ग को धार्मिक, नस्लीय, जातीय, लैंगिक बन्धनों में बांधकर उसे राजीनीति, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आमदनी के मोर्चों पर वंचित कर दिया जाता है।