गीता अध्याय 2 श्लोक 33
--------------------------------------
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा
॥33॥
कर्तव्यपालन के दायित्व से भागने वाले को हानि ही हानि मिलती है। श्रीकृष्ण के अनुसार हानियों की श्रृंखला लम्बी है। इनका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्तव्य पालन से भागने के कारण निम्न हानि होते हैं---
स्वधर्म से च्युत होना
---------------------------
अपने स्वभाव/गुण के अनुसार जो हमारे कर्तव्य हैं उनको हम गँवा देते हैं जिसके कारण गुणों की वर्तमान अवस्था से हम आगे नहीं बढ़ पाते, बल्कि उससे नीचे ही गिरते हैं। स्वभाव में। दैवी सम्पद कम होने से आसुरी गुणों में वृद्धि ही होती है जिसके कारण साधना की उच्च अवस्था से निम्न अवस्था में हमारी अवनति होती है।
इस कारण से सांसारिक/भौतिक रूप से हमारी पहचान भी प्रभावित होती है । हम जिस मेधा के लिए जाने जाते हैं उसका क्षरण होता है। ये तथ्य समाज के हर स्तर पर हर व्यक्ति के साथ लागू होता है।
अपकीर्ति प्राप्त होना
----------------------------
जब हम स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार क्रियाशील नहीं होते तो न सिर्फ साधना की अवस्था से गिरते हैं बल्कि इस पतन के कारण बढ़े हुए आसुरी गुण हमारी अपकीर्ति को ही बढ़ाता है। साधना की अवस्था के अनुसार कर्तव्य का निर्वहन कीर्ति देता है लेकिन इसका प्रतिकूल होने पर अपकीर्ति मिलती है।
भौतिक संसार में भी जब हम अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार कार्य नहीं करते हैं तो हमारी बदनामी होती है। व्यक्ति विशेष से उस व्यक्ति की क्षमता के अनुसार समाज को हमसे कर्तव्य पालन की उम्मीद होती है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम जिस अवस्था में होते हैं , जिस सोपान पर होते हैं उसी के अनुसार बदनामी भी मिलती है हमें।
पाप प्राप्त होना
----------------------
पाप और पुण्य की अवधारणा हमारे स्वभाव के गुण की अवस्था पर निर्भर करती है। स्वभाव यह स्व गुण की अवस्था के अनुसार हमारे जो कर्तव्य होते हैं उनका निर्वहन ही पूण्य है और उनका निर्वहन नहीं करना ही पाप है। जब हम कर्तव्य का पालन करते हैं तब हमारे अंदर दैवी गुण बढ़ते हैं , आसुरी गुण कम होते हैं , हम साधना की उच्चतर अवस्था में प्रवृत्त होते हैं अर्थात पूण्य को प्राप्त होते हैं। यदि इसके विपरीत होता है तो आसुरी गुण बढ़ते हैं जिससे पाप की वृद्धि होती है।
भौतिक /सांसारिक समाज में भी इसी को दुहराया जाता है। यदि हम अपने निर्धारित कर्तव्य को करने में असमर्थ होते हैं तो हमारी जगहँसाई ही होती है। कर्तव्य से गिरा इंसान ही पापी कहलाता है।
प्रस्तुत स्थिति युद्ध की है सो श्रीकृष्ण युद्ध के सम्बंध में कह रहे हैं, अन्य स्थितियों में भी यही बात लागू होती है। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के आंतरिक युद्ध में जब हम गुणों के अनुसार आचरण कर दैवी सम्पदाओं की वृद्धि करने में असमर्थ होते हैं हमारे अंदर आसुरी गुणों की वृद्धि होती है जिससे पाप वृत्ति की बढ़ोत्तरी होती है। समझने वाली बात यही है कि व्यक्ति का जो कार्य उसके कर्तव्य से परे है वही उस व्यक्ति के लिए पापकर्म है।
उपरोक्त तीनों अधोगति अपरिहार्य युद्ध सहित किसी भी निर्धारित कर्तब्य से मुँह मोड़ने पर प्राप्त होता ही है।
इस बात का ध्यान रहे कि पाप और पुण्य कोई बाहरी सत्ता निर्धारित नहीं करती है। हम स्वयम के कर्मों का ही परिणाम भुगतते हैं। पाप और पुण्य, कीर्ति और अपकीर्ति हमारे अपने ही कर्मों के स्वाभाविक परिणाम होते हैं। सो हमें इस बात पर ध्यान रहे कि किसी भी परिस्थिति में हम कर्तव्यच्युत नहीं हों अन्यथा हमें जो भुगतना होगा भुगतेंगे हीं साथ साथ हमारी वजह से समाज में भी अनाचार, अत्याचार, असत्य, हिंसा, घृणा जैसे आसुरी प्रवित्तियों का जोर बढ़ेगा जिसकी कीमत समाज और प्रकृति को भुगतना ही होगा। आप स्वयं देखें कि आज की परिस्थिति में हमारी कमजोरी के कारण ही समाज और उसके भौतिक , प्राकृतिक और बौद्धिक वातावरण की क्या दुर्गति हो रही है। हम आप सभी यदि खुद का आत्मपरीक्षण करें तो पाते हैं कि हम तो अपने निर्धारित कर्तव्य से विमुख होकर जो कर रहें हैं उसे हीं वापस पा रहें हैं। बोया पेड़ बबूर का तो आम कँहा से पाओगे।