गीता अध्याय 2 श्लोक 19
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य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
॥19॥
एक बार पुनः श्रीकृष्ण स्पष्ट करते है कि आत्मा अनश्वर और अविनाशी है। यह न मारता है न मरता है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा वास्तव में किसी भी तरह के कृत्य से मुक्त होता है। हम आप जो भी करते हैं उसमें हमारे आपके विशुद्ध स्वरूप यानी हमारे आत्मस्वरूप यानी सेल्फ का कोई योगदान नहीं होता। हम जो भी करते हैं उसकी जबाबदेही हमारे ईगो पर होती है जो हमारी शारीरिक, मानसिक/भवानात्मक और बौद्धिक गुणों का मिश्रण होता है। हम आगे चलकर पाएंगे कि हमारे कृत्य हमारे गुणों पर निर्भर करते हैं । लेकिन फिलहाल इस श्लोक से स्पष्ट है कि वस्तुतः आत्मा न तो कर्ता है न कारक। साथ ही स्पष्ट होता है जीवन समाप्त होता है न कि जीवन का सेल्फ।
हमारा अस्तित्व हमारा शरीर नहीं होता। पूर्व में ही स्पष्ट हो चुका है कि भौतिक स्वरूप का परिवर्तन अवश्यम्भावी है लेकिन सेल्फ में, आत्मस्वरूप में यानी आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है। तो फिर किसी की मृत्यु या जन्म के लिए आत्मस्वरूप को कर्ता नहीं ठहराया जा सकता।
आत्मा की उपस्थिति में ही सारी क्रियाएँ होती हैं लेकिन आपका सेल्फ/आपकी आत्मा उसमें लिप्त नहीं होती। इसे महसूस करने, समझने के लिए जरूरी है कि हम अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े आवरण को एक एक कर हटाएँ। ये कैसे कर सकते हैं इसे आगे समझेंगे। अभी तो इतना ही समझें कि जब श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने का आवाह्न करते हैं तो ये भी समझा देते हैं कि आत्मा का न तो आदि है न अंत, कोई स्वरूप परिवर्तन नहीं है। न ही आत्मा कुछ कर रहा होता है न इसपर कुछ हो रहा होता है।