गीता अध्याय 2 श्लोक 39
----------------------------------
( कर्मयोग का विषय )
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
॥39॥
अगर हमें कुछ प्राप्त करना होता है तो उसके निम्न चार चरण हैं
1.उद्देश्य का निर्धारण और उसकी समझ
2.उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग की जानकारी
3.उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग पर चलना
4.मार्ग पर अंत तक चलकर उस उद्देश्य को प्राप्त करना।
ये चारों चरण क्रमिक हैं, किसी को लाँघ कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
अर्जुन युद्धभूमि में युद्ध करने की तैयारी के साथ पहुँच कर दिग्भ्रमित और विषादयुक हो जाता है। उसे उद्देश्य का ज्ञान नहीं रहता है सो भटक जाता है। ऐसे में उसके अनुरोध पर श्रीकृष्ण उसकी रक्षा में आगे आते हैं, उसके भ्रम को समाप्त करने हेतु। अर्जुन की नजर में उसका उद्देश्य युद्ध है सो युद्ध की सम्भावित विभीषिका और परिणाम से वह व्यथित हो जाता है। तब श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं , ज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान उक्त चार चरणों में है। क्रमिक है।
सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके उद्देश्य से परिचित कराते हैं। उद्देश्य वही है जो सबका है, अर्थात आत्मसाक्षात्कार करना यानी अपनी आत्मा का बोध करना यानी सेल्फ को खोजना और उसे प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाना। युद्ध तो मात्र इस मार्ग के क्रम में घटित होने वाली घटना है जिसका निर्वहन अनिवार्य है ताकि क्रमिक रूप से आगे बढ़ा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नित्य नए नए अवसर आते रहते हैं जिनका उसे निर्वहन करना होता है, उनको छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। आपको पढ़ना है, परीक्षा उत्तीर्ण करनी है, कमाना है, आदि आदि। लेकिन ये सब आपके उद्देश्य नहीं हैं। आपका हमारा उद्देश्य है अपने स्व को पाना और उसे पाकर परमात्मा से मिल जाना। सर्वप्रथम इसी उद्देश्य को श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक परिभाषित करते हैं। यही साँख्य योग है। योग यानी खुद से जुड़ना। जब हम जन्म लेते हैं और धीरे धीरे बड़े होते हैं तो उस समय हमें अपने शरीर और बौद्धिकता का तो ज्ञान होता है लेकिन हम अपनी आत्मा से ,अपने स्व/सेल्फ से अनजान बने रहते हैं। जब हमें इसका भान होता है , जब हमें लगता है कि हमें ये पता नहीं कि हम वास्तव में कौन हैं तब हम अपने सेल्फ की खोज का उद्देश्य पाते हैं। आत्मसाक्षात्कार की यह पहली सीढ़ी है जिसपर हमें चढ़ना होता है। जीवन का लक्ष्य बड़ा पद, पैसा आदि ही होते तो हम उन्हें पाकर हमेशा सन्तुष्ट , प्रसन्न और सुखी होते। लेकिन ऐसा नहीं होता है अर्थात ये सब जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, बीच की अवस्थाएँ हैं। अंतिम लक्ष्य तो स्व की प्राप्ति और उस प्राप्ति के साथ परमात्मा से मिलन है। अर्थात सत् की प्राप्ति हमारा उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के साथ जीवन के प्रति हमारा भय समाप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण की यही शिक्षा सांख्ययोग है।
द्वितीय चरण में श्रीकृष्ण उस मार्ग का ज्ञान देते हैं जिससे इस सत् की प्राप्ति होती है। ये मार्ग योग और कर्म का है। इसे श्रीकृष्ण कर्मयोग कहते है । लेकिन उसके पूर्व द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए।
तब हम तृतीय चरण में प्रवेश करते हैं यानी अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं जो कर्मयोग के मार्ग से चलती है।
अंत में हम अपने उद्देश्य को प्राप्त करते हैं । उद्देश्य की प्राप्ति के साथ ही मार्ग से मुक्त हो जाते हैं। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!