क्या हम विभिन्न उपलब्धियों और कमियों , खामियों और खाशियतों, समस्याओं और निराकरणों को महज मिडिल क्लास की नजरिये देख कर कोई ऐरिहासिक भूल कर रहें है? वर्गीय चरित्र से निर्धारित हमारी सोच क्या समग्रता के साथ आगे बढ़ने दे रही है या फिर वर्गीय विभाजन की खाई को और गहरी कर रही? कँही ऐसा तो नहीं मिडिल क्लास की हमारी दृष्टि में मुल्क और मुल्क की पालिसी एकाँगी हुई जा रही है?
ये एक स्थापित सत्य है कि बौद्धिक और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार उच्च वर्ग के साथ साथ मध्यम वर्ग का होता है। किसी भी समाज में उच्च वर्ग संख्यात्मक दृष्टि से छोटा ही होता है लेकिन संसाधनों के साथ साथ सत्ता पर भी उसी का अधिकार होता है जिसका संचालन वो मध्यम वर्ग के बहुसंख्यक को अपने प्रभाव में लेकर करता है। यही मध्यमवर्ग उस उच्च वर्ग के हितों का वाहक बना होता है। लेकिन इन सब के बीच संसाधन विहीन निम्न वर्ग को लाभुक बना दिया जाता है। अर्थात जिन बौद्धिक और प्राकृतिक संसाधनों पर उनका नैसर्गिक अधिकार होना चाहिए वे संसाधन सत्ता के द्वारा अर्थात उच्चवर्ग और उसके संवेदक मध्यमवर्ग के द्वारा निम्न वर्ग को लाभ बता कर थोड़ी थोड़ी मात्रा में उपलब्ध कराए जाते हैं। ऐसी धारणा फैलाई जाती है कि निम वर्ग को सत्ता के द्वारा जो कुछ उपलब्ध कराया जा रहा है वो सब उनका मूलधन नहीं है अर्थात अधिकार नहीं है बल्कि वो सब तो लाभ हैं जो उनको दिया जा रहा है। मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग द्वारा की जाने वाली हर औपचारिक और अनौपचारिक चर्चा में यही समझाने का प्रयास होता है। शब्दावली पर ध्यान दें, गरीबी हटाव, गरीबों के कल्याणार्थ, योजनाओं के लाभुक/लाभार्थी , अनुदान इत्यादि। ये शब्दावलियाँ स्पष्ट रूप से यही दर्शाती हैं कि निम्न वर्ग इसके काबिल तो नहीं है, ये तो मध्यम और उच्च वर्ग अथवा सत्ता की दरियादिली है कि वह उनको कुछ दे रहा है।
जबकि सच्चाई तो ये है कि संसाधनों पर सभी का समान अधिकार होना चाहिए था। यदि किसी गरीब परिवार में कोई बच्चा जन्मता है तो पोषण , शिक्षा, स्वास्थ्य, और अवसर जैसे संसाधनों से या तो वो वंचित रह जाता है या उन संसाधनों तक उसकी वो पहुँच नहीं हो पाती जो उच्च/मध्यम वर्ग के एक बच्चे को होती है। दोनों बच्चे समान रूप से राष्ट्र के नागरिक बनते हैं लेकिन परिवारों के आर्थिक और सामाजिक हैसियत में अंतर के कारण संसाधनों तक पहुंच में एक बच्चा बिना अपने किसी दोष के दूसरे बच्चे से पिछड़ जाता है। ऐसी स्थिति में संसाधनों के वितरण में जन्म के आधार पर किये गया भेद भाव के लिए वो तो दोषी नहीं है लेकिन कालांतर में उसे ही दोषी बनाकर पेश कर दिया जाता है। अब उच्च/मध्यम वर्ग संसाधनों पर अपनी पकड़ को बनाये रखने हेतु अपने वर्गीय चरित्र के अनुसार उस बच्चे के विकास के लिए जो कुछ उपलब्ध कराता है उसे अनुदान, कल्याण, लाभ, आरक्षण जैसी शब्दावली देता है। जबकि सच्चाई तो ये है कि एक (बौद्धिक/भौतिक) उत्पादक नागरिक बनने तक की उसकी यात्रा तो शुरू से उसके जन्म के आधार पर भेद भाव पूर्ण रही होती है लेकिन मध्यम/उच्च वर्ग और सत्ता का आचरण ऐसा होता है मानों वह कोई उपकार कर रही हो। एक राष्ट्र में एक नागरिक को जब आप समानता का अधिकार देने की बात कहते हैं तो उस नागरिक का संसाधनो पर अधिकार वर्गीय स्थिति से भिन्न होना चाहिए।