श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 उपसंहार
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युद्धक्षेत्र में अपने विरोध में अपने बंधु बांधवों, इष्ट मित्रों को देखकर व्यथित अर्जुन जब युद्ध करने से मना कर श्रीकृष्ण से उसे उचित मार्ग बताने को कहता है तब श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन का लक्ष्य और उसे प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं। वस्तुतः द्वितीय अध्याय एक तरह से गीता का सारांश है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन की समस्त शिक्षा का निचोड़ प्रस्तुत करते हैं और तत्पश्चात आगे उनकी व्यख्या करते हैं। द्वितीय अध्याय में संक्षिप्त में दी गई शिक्षा का क्रम निम्न है
1.सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन के लक्ष्य को बताते हैं और इस क्रम में उसे आत्मा यानी सेल्फ का अर्थ समझाते हुए उसे ही प्राप्ति योग्य लक्ष्य बताते हैं।
2. तत्पश्चात उसे प्राप्त करने का मार्ग यानी कर्मयोग का ज्ञान देते हैं। यह स्वाभाविक भी है कि जब तक लक्ष्य पता न हो चलने का औचित्य क्या!
3. फिर श्रीकृष्ण त्याग, उपासना, वैराग्य और सन्यास को समझाते हैं जिससे होते हुए हम अंतिम लक्ष्य यानी अपनी आत्मा तक पहुंचते हैं
4.श्रीकृष्ण व्यक्ति के पतन का कारण भी बताते हैं और लक्ष्य सिद्ध व्यक्ति यानी ENLIGHTENED MASTER की खूबियों को भी बताते हैं।
5. और अंत में श्रीकृष्ण इस सिद्धपुरुष को मोक्ष प्राप्ति होने की बात भी बताते हैं, जिस काल में सिद्धपुरुष सबकुछ सांसारिक करते हुए भी अपनी ही आत्मा यानी सेल्फ में अधिष्ठापित होकर ब्रह्म की स्थिति को प्राप्त हो जाता है।
और ये सारी प्रक्रिया जीवन काल में ही होती है, मृत्यु के पश्चात नहीं।
यँहा कुछ तथ्यों पर ध्यान देना आवश्यक है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने गीता की शिक्षा युद्धक्षेत्र में युद्ध से विमुख हुए अर्जुन को युद्ध में प्रवृत्त करने के लिए दी गई है किंतु हम पाते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन को न तो उसपर और उसके परिवार पर हुए अत्याचार को ही याद दिलाते हैं और न ही उसे युद्ध में जाने के लिए कहते हैं। श्रीकृष्ण तो बहुत शांति से उसे आत्मा, स्वधर्म, परिणाम से असंगति, श्रद्धा और समर्पण, वैराग्य और समाधि और अंततः मोक्ष प्राप्ति, की शिक्षा देते हैं जो सभी पूर्ण मानसिक शांति की अवस्था होती है।
अस्तुतः श्रीकृष्ण अर्जुन को परम मोक्ष यानी निर्वाण का मार्ग बता रहें हैं । श्रीकृष्ण बता रहें हैं कि कर्मयोग की बुद्धि से लैस होकर कर्म कर के ही हम संसार के बंधन से निकल सकते हैं। कर्म ही एकमात्र मार्ग है। युद्ध एक अवसर मात्र है जो अर्जुन की तत्कालिक अवस्था के अनुसार उसका स्वधर्म है किंतु युद्ध को , उसमें प्राप्त हो सकने वाले विजय को, उससे मिल सकने वाले ऐश्वर्य और साम्राज्य को लक्ष्य नहीं बताया गया है। लक्ष्य तो आत्मसाक्षत्कार है जिसका मार्ग कर्मयोग है।