गीता अध्याय 2 श्लोक 52
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यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥
जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
॥52॥
जब व्यक्ति परिणामों से विच्छेदित होना सिख लेता है तब उसमें मोह नहीं रह जाता। जब आपका मोह समाप्त हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि तब आपको परिणाम से लगाव नही। रह जाता। परिणामों के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति को किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। तो क्या ये सम्भव है? सुनने में तो ये सम्भव नहीं लगता कि परिणाम के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त होकर भूत , वर्तमान और भविष्य की सारी आसक्तियों से मुक्त भी हुआ जा सकता है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि परिणाम के प्रति आकर्षण बना हुआ है। लेकिन जैसे जैसे अभ्यास करते जाते हैं धीरे धीरे परिणाम की चिंता कम से कमतर होती जाती है। कर्मयोग की बुद्धि का निरन्तर अभ्यास परिणामों के प्रभाव को कम करता है। इस बुद्धि को , यानी इस ज्ञान को सतत स्मरण में रखिये। कर्म की महत्ता को समझने से परिणाम की चिंता कम होती है। जब व्यक्ति की कर्मयोग की बुद्धि व्यक्ति के अंदर के परिणाम से लगाव की आसक्ति को पार कर जाती है तो भूत, वर्तमान और भविष्य की समस्त आसक्ति समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति इस अवस्था में पहुँचता है तब माना जाता है कि वह वैराग की अवस्था में आ गया है।
यहाँ सावधानी बरतने की जरूरत है। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण ने अभी जिस वैराग्य की चर्चा की है वह किस चीज से है? भोगो से वैराग्य की बात कही गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। भोग परिणाम ही हैं कर्म के। परिणाम के प्रति समत्व में स्थित व्यक्ति को जब परिणाम प्रभावित करने में असमर्थ हो जाते हैं तो वह वैराग्य की अवस्था है। सनद रहे इस वैराग्य में कँही भी कर्म से वैराग्य की बात नहीं की गई है, अतएव हमें इस भ्रम में कभी भी नहीं पड़ना चाहिए कि श्रीकृष्ण कर्म से विरत होने को कह रहे हैं, वे मात्र कर्म के परिणाम में समत्व की ही शिक्षा दे रहें हैं। इस अवस्था में मन शांत हो चलता है और तब हम इस अवस्था में आ जाते हैं कि हम सेल्फ को यानी अपने वास्तविक रूप को समझ पाए कि दरअसल हम कौन हैं। स्वयम को जान लेना ही सबसे बड़ा ज्ञान है क्योंकि स्वयं का ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान होना है। व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य भोगों ( धनात्मक और ऋणात्मक दोनों,) को ही भोगना नहीं है। जब हम कर्म करते हुए परिणाम के प्रति समत्व की भावना रखते हूं अर्थात अच्छे परिणाम से प्रसन्न नही। होते और बुरे परिणाम से दुखी नहीं होते बल्कि दोनों को समान भाव रखते हैं तो मन शांत होता है। इस अवस्था में जीवन में मिल चुके, मिल रहे और मिल सकने वाले भोगों से भी नही। प्रभावित नहीं होते। ये वैराग्य की अवस्था है, जिसमें मन, चित्त शांत होता है, आनंदित रहता है और यही सत्य की अवस्था है अर्थात हमारा सच्चिदानंद स्वरूप इसी अवस्था में हमें मिलता है।
ये बातें थोड़ी रहस्यमयी लग सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे जब तक हम मोह में लगे हैं , परिणाम में हमारी आसक्ति बनी हुई है तभी तक ये बातें रहस्यमयी प्रतीति होती हैं । जैसे ही कर्मयोग के अभ्यास से हम परिणाम जनित प्रभाव से हम खुद को अलग करते हैं प्रसन्नता अनुभव करते हैं , मन शांत और हल्का हो जाता है। दैनिक जीवन के एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आप छोटे बच्चों के साथ खेल रहें हैं और बच्चे आपको हरा देते हैं। आप हार कर भी दुखी नही होते। उसी प्रकार यदि आप बच्चों को हरा देते हैं तो भी आप फरव नहीं करते। बल्कि आप तो दोनों परिणामों को समान रूप से लेते हैं और परिणाम के प्रभाव में नहीं होते। इसे विस्तारित करने पर हम अपने कर्म में इसे देख समझ सकते हैं। मनुष्य का जीवन ही अपने स्व की प्राप्ति के लिए हुआ है। यदि हम आप कर्म में स्वधर्म और समर्पण से रत हैं और परिणाम के प्रभाव से मुक्त हैं तो इसी वैराग्य की अवस्था में हैं। वैराग्य के लिए न तो कोई उम्र निर्धारित है, न ही विशेष भेषभूषा या कोई विधि विशेष हीं। वैराग्य को श्रीकृष्ण ने जिस तरह यँहा प्रस्तुत किया है वह एकदम अनुकरणीय है बशर्ते कि कर्मयोग का अभ्यास करते करते हम अपनी बुद्धि पर पड़े माया और मोह के आवरण को हटा सकें। कर्मयोग का आचरण करने पर ऐसा होगा ही ये भी निश्चित ही है।