श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57
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यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
॥57॥
4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो।
यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी कि सुख की प्राप्ति की ओर संकेत किया है। हम स्नेह और लगाव से सुख पाने के लिए इस संसार के द्वारा प्रशिक्षित किये गए होते हैं किंतु इसी लगाव के कारण हमारे अंदर आसक्ति का जन्म होता है जो सारे दुखों का जड़ होता है। श्रीकृष्ण तो ये समझा रहें है कि हमारे अंदर न तो लगाव हो न विलगाव। सांसारिक रूप से हर अच्छे या बुरे को, शुभ और अशुभ को बिना उस अच्छा या बुरा की प्रकृति से प्रभावित हुए जस का तस स्वीकार करना चाहिए। ये हमारा इगो है जो कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा की संज्ञा देता है , हम अपनी पसंद और नापसन्द के कारण अच्छे और बुरे से प्रभावित होते हैं। लेकिन कर्मयोग की बुद्धि से युक्त स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि इन बाहरी कारकों से अप्रभावित रहती है और वह चीजों के रूप रंग प्रकृति से अप्रभावित रहते हुए उनको जस का तस ही लेता है। चूँकि वह तो अपने आत्मस्वरूप में ही अवस्थित रहता है, बाहरी परिणामों से अप्रभावित होता है, समत्व के भाव में बना रहता है, श्रद्धा के साथ रहता है और परिणाम को समान रूप से लेता है सो सांसारिक शुभ से खुश नहीं होता है और सांसारिक दुख से दुखी नहीं होता। उसके लिए तो सभी समान रूप से अपनी प्रकृति के अनुसार हैं। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी कारणों से निर्धारित ही नहीं होती है , वह तो अपनी ही आत्मा में लीन प्रसन्न रहता है।
तो क्या इस स्थिति में व्यक्ति पलायनवादी नहीं हो सकता है? अर्जुन भी तो सब कुछ छोड़ देने की बात कर रहा था, तो फिर अर्जुन की प्रतिक्रिया और श्रीकृष्ण की शिक्षा में अंतर कँहा है? वस्तुतः पलायन विलगाव के कारण नहीं होता बल्कि उसके अंदर एक भय की भावना होती है, जो उसे भागने के लिए प्रेरित करती है। वह तो परिणामों का दास है तभी तो परिणामों से भागकर एकांत में चला जाना चाहता है अथवा आत्महन्ता बनने का विचार करता है। कर्मयोगी तो परिणामों का सामना करता है, बस उसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि परिणामों से और यँहा तक कि उसे अपने कर्मों से कोई लगाव नहीं होता, वह किसी कारण वश कुछ करता ही नहीं। वह तो वही करता है जो उसके स्वधर्म यानी उसकी स्थिति से निर्धारित है और इस कारण उसे परिणामों के स्वरूप से कोई लगाव नहीं होता। जब हमें अपने कर्म से लगाव होगा तब हम परिणाम की चिंता करेंगे। जब हम कर्म करते वक़्त कोई मकसद रखेंगे तब मकसद को पूरा होने पर खुश होंगे, उसे शुभ मानेंगे और मकसद के पूरा नहीं होने पर दुखी होंगे और इसे अशुभ मानेंगे।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर कर्म में स्वधर्म के अनुसार, श्रद्धा और समर्पण से बिना परिणाम से बंधे कर्म करता है तो उसे स्नेह या दुराव कैसा।