श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 56
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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
॥56॥
2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।
वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।
जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।
इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।
3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है।
और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा।
और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।
लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।