सारांश
अध्याय 2 श्लोक 39 से 53
अर्जुन के विषाद, दुख, भ्रम को दूर करने के लिए अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे सही मार्ग अपनाने की शिक्षा दे रहें हैं। इस क्रम में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परम् सत्य से अवगत कराया जो आत्मा का ज्ञान कहलाता है और जिसे भारतीय दर्शन में साँख्ययोग का नाम दिया गया है। श्रीमद्भागवद गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक इस साँख्ययोग की शिक्षा दी गई है। इस ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग कर्मयोग है जिसकी प्रारम्भिक शिक्षा श्रीकृष्ण ने द्वितीय अध्याय के श्लोक 39 से 53 तक दिया है । कर्मयोग के माध्यम से प्राप्त शिक्षा का सारांश यही है कि हमें कर्मविशेष का निष्पादन हमको एक विशेष दृष्टिकोण से ही करना चाहिए। इस मार्ग पर जब हम चलते हैं तो पूर्ण समर्पण से बिना परिणाम से प्रभावित हुए कर्म करते हैं। इस मार्ग पर चलने से परिणाम से विरागरत होते हैं हम जिससे परम् शांति और चिर प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस शांत चित्त की परमानंद की अवस्था में ही समाधि की प्राप्ति होती है जिसमें हमें परम् आत्मा यानी अपने सेल्फ अथवा आत्मा का ज्ञान होता है।
आगे श्रीकृष्ण अर्जुन के आग्रह पर बताते हैं कि जब व्यक्ति समाधि की परमानंद अवस्था को प्राप्त होता है तो उसकी प्रकृति किस प्रकार की होती है।
कर्मयोग की बुद्धि से युक्त कर्म से जो परिणामों के प्रभाव से मुक्त होता है जो शांति मिलती है वही स्थिति होती है जब मन शांत होता है और कर्म करने से ही आनंद मिलता रहता है। निष्काम कर्मयोग के मूल में दो बातें हैं, पहला की कर्म तो करना ही है, बिना कर्म किये कल्याण नही है। दूसरी बात है कि जब हम कर्म करते हैं तो कर्म के परिणाम से असम्बद्ध होते हैं क्योंकि परिणाम पर हमारा कोई वश नही होता है। चूँकि हम परिणाम से असम्बद्ध होते हैं सो परिणामों के भले या बुरे प्रभाव से हमारी मनःस्थिति अप्रभावित होती है। हम कर्म करते हैं और उसी में श्रद्धा रखते हैं यानी पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं।
कर्मयोग की बुद्धि को मात्र पढ़कर नहीं प्राप्त किया जा सकता है। द्वितीय अध्याय के श्लोक 39 से 53 तक का बार बार अध्ययन करना होता है और उसको अपने व्यवहार में उतारना होता है। बार बार किये गए अभ्यास से ही इस बुद्धि में महारत हासिल होती है। एकबार पढ़ लेने से यह ज्ञान आत्मसात नहीं होता है। इसके साथ साथ हमें बार बार अपना पुरमूल्यांकन भी करते रहना चाहिए कि हम इस बुद्धि को कितना व्यहार में उतार पा रहें हैं। बारम्बार किये गए अभ्यास से हम एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जब हमें इस बुद्धि में क्रियात्मक दक्षता हासिल हो जाती है। तब हम समाधिस्थ हो जाते हैं। इस अवस्था में हमारा व्यवहार कैसा होता है इसकी व्यख्या श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के 55वें श्लोक से करना प्रारम्भ करते हैं ।