आपने कभी गौर किया है कि सरकारें ही विषमता पैदा करती हैं? कभी आपने सोचा है कि जो पानी आपके जीवन के लिए अनिवार्य है, जो हवा आपके जीवन के लिए अनिवार्य है, जो धूप आपको जरूर मिलनी ही चाहिए, उनकी साफ सफाई की क्या हालत होती गई है? कभी आपको लगा है कि साफ हवा , खिली धूप और साफ पानी पर जनता के रूप में जो आपका हक है उसमें एलीट और मासेस का, जातिगत विभेद का, वर्गीय असमानता का बोल बाला है? और ये सब क्यों है?
भूगर्भीय जल के बेतहाशा शोषण, जलाशयों की भारी कमी, जल स्त्रोतों का प्रदूषण, खतरनाक स्तर तक का वायु प्रदूषण, भयंकर रूप से बड़े स्लम, ये सब उन्हीं के कारण हैं जिनपर इनको बचाने के नियम बनाने और लागू करने का जिम्मा है? साफ चमकदार धूप की भारत में कोई कमी तो नहीं है लेकिन क्या शहरों के कबूतरखानों में ये उपलब्ध है, क्या भारी और खतरनाक वायुप्रदूषित शहरों में इसे पाने की उत्कंठा भी हो सकती है?
भारी भरकम, दुनिया भर की जानकारी से लैस नौजवान जब भारतीय शासन तंत्र का कर्णधार बनता है आईएएस की परीक्षा पास कर तो उससे भी ये उम्मीद की जा सकती है कि वो नौजवान/नवयुवती ऐसे सरकारी नियम बनाएंगे और लागू करेंगे जिनसे इन प्राकृतिक संसाधनों के वितरण में एकरूपता हो, लेकिन क्या वे ऐसा करते हैं और क्या उनके पोलिटिकल बॉस उनसे ये सब करने की अपेक्षा करते हैं? साफ और स्वक्ष हवा, पानी और धूप के वितरण में असमानता से बीमारियों की लंबी श्रृंखला तैयार होती है और बीमारियों से लड़ते लड़ते वर्गीय स्थिति में पतन होता जाता है और जातीय असमानता गहराती जाती है?
अगर आपने नहीं सोचा तो फिर आप किस लोकतंत्र की तरफदारी कर रहें हैं जो आपको इतना भी देने के लिए प्रतिबद्ध और कटिबद्ध नहीं है?