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दैनिक असमानता के सवाल

   दैनिक असमानता के सवाल

हर रोज हमें अपने शहर/गाँव में किसी न किसी कारण से घर से बाहर निकलना होता है। ऐसा सभी घरों में होता है चाहे वो अमीर हों या गरीब। लेकिन क्या शहर में निकलने पर इस अमीर-गरीब, ऊँच-नीच का भेदभाव खत्म हो जाता है? 
      एक बार फिर से याद कीजिये कि वोटिंग के दौरान सरकार बनाने में हर अमीर और हर गरीब के वोट का महत्व एक था लेकिन जो सरकार बनती है क्या वह भी हर अमीर और हर गरीब को सड़क पर समान सुविधा देती है ? या फिर सड़क पर चलते आदमी को अपनी अमीरी, अपनी गरीबी की हैसियत के अनुसार ही यात्रा करनी पड़ती है? क्या आपको लगता है पैदल, साईकल, रिक्शा, ऑटो, बस, कैब, लोकल, मेट्रो , निजी वाहन से चलने वाले अलग अलग लोग इन साधनों का उपयोग अपनी मर्जी से करते हैं या फिर अपनी आर्थिक हैसियत की बाध्यता के कारण करते हैं?क्या हमारे पास ऐसा पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम होता है जिसका उपयोग सभी लोग बिना अपनी आर्थिक हैसियत से प्रभावित हुए कर सकते हों? क्या शहर के हर भाग में , चाहे वो गरीबों के मोहल्ले हों या अमीरों के या वीवीआईपी के सभी जगहों पर सड़क और नालों की सुविधा, उनकी गुणवत्ता और रख रखाव एक सा होता है, जबकि सरकार बनाने में सभी के वोट का महत्व समान रहता है? क्या यही हालात गाँवोँ में भी नहीं हैं जँहा आर्थिक वर्गीय हैसियत के साथ साथ जाति भी निर्णयायक भूमिका में आ जाती है ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था के निर्धारण में।  शहरों में भी अनुसूचित जातियों के मोहल्लों में भी ये विषमता होती है। क्या हमने कभी अपनी व्यवस्था से ये सवाल किए हैं? क्या हमने अपने म्युनिसिपेलिटी और पंचायत के स्तर पर इन सवालों को कभी उठाया भी है या सिर्फ व्यवस्था को कोस कर, अपना सिर धुन कर और होंठों में गालियाँ  बुदबुदाकर अपना दायित्व पूरा कर लिया है?
     इसी तरह क्या शहर के हर भूभाग में पर्यावरण की हालत एक सी होती है? आप देखते होंगे कि कुछ भागों में जँहा सत्ता के वाहकों के निवास स्थान होते हैं उन जगहों पर सरकारी खर्चे पर बाग बगीचे की विशेष व्यवस्था की जाती है, सड़कों की सफाई दिन में कई बार होती है, स्ट्रीट लाइट की जगमगाहट विशेष होती है। इन सब का खर्च सरकार या फिर लोकल बॉडीज उठाती हैं जिनके पास पैसा आम आदमी के टैक्स से आता है। क्या हमने कभी ये सवाल उठाया है कि आम आदमी के टैक्स के पैसे से किस आधार पर वीवीआईपी लोगों के रिहाइशी एरिया में ये सब सुविधा दी जाती है जबकि उसी शहर के अन्य भाग में रहने वाले लोगों के साथ जिनके राजनीतिक अधिकार समान हैं उनके साथ भेद भाव कर उनके रहने चलने की व्यवस्था वास्तविक अर्थों में ये तो अति साधारण रखी जाती है या फिर घटिया बना दी जाती है।
    ये लोकतंत्र के आम सवाल हैं जिनको हमें  बड़ी बड़ी बहसों के ऊपर तरजीह देना था लेकिन हमने कभी इन सवालों से आँख मिलाकर सामना ही नहीं किया है तो फिर किस मुँह से डेमोक्रेसी का दम भरते फिरते हैं, किस बात के मदर ऑफ डेमोक्रेसी की संतान होने का ढिंढोरा  दुनिया में पीटते फिरते हैं जबकि घर में ही लोकतंत्र की, समानता की, डिग्निटी की माँग नहीं कर पाते हैं।
     

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