विकास की डेमोक्रेसी बनाम डेमोक्रेसी का विकास
जो बात सबसे जरूरी है समझनी वह यह है कि किसी भी देश का आर्थिक विकास उस देश के शिक्षा के विकास, स्वास्थ्य सुविधा के विकास, परिवहन, संचार और ऊर्जा स्रोतों के विकास और भू सम्बन्धों और भूमि वितरण के स्वरूप में परिवर्तन और लैंगिक सम्मानता के विकास, नस्लीय/धार्मिक/जातीय समानता और गरिमा के विकाद के समानुपातिक ही होता है। कोई भी मॉडल की अर्थव्यवस्था हो उसका विकास तभी सम्भव है जब उपरोक्त कारकों का विकास आर्थिक विकास के प्रयासों के पहले शुरू हो सके। लेकिन भारत में आर्थिक नीतियाँ को बनाते हुए हमेशा इस सच्चाई को नजरअंदाज कर दिया गया है।
आज भी आर्थिक नीतियाँ की सोशल ऑडिट का प्रचलन नहीं है और न ही हम ये समझ पाते है कि चीन, द.कोरिया, सिंगापुर और यंहा तक कि यूरोप और उत्तर अमेरिका का विकास तब हीं सम्भव हुआ जब समाज के आर्थिक के विकास के पूर्व शिक्षा , स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्टर और लैंगिक समानता की अहर्ताओं की शर्त पूरी होने की शुरुआत हो चुकी थी। लेकिन जब समाज शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, और जेंडर /सोशल स्टेटस समानता के मुद्दों से निपट नहीं पाता हो, और समाज में इन विषयों के बदले धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय, और जातीय भेदभाव की वजह से तनाव बढ़ रहे हो और जब राजनीतिक जीत ही राजनीतिक दलों का एक मात्र लक्ष्य हो तो आप चाहे जितनी बढ़िया अर्थनीति बना लें अंततः वह अर्थनीति किसी भी तरह से सामाजिक समृद्धि नहीं ला सकती है। सनद रहे कि जब तक डेमोक्रेसी का विकास नहीं होगा विकास की डेमोक्रेसी नहीं आ पाएगी। राजनीतिक-समाजिक ऑटोक्रेसी आर्थिक ऑटोक्रेसी ही ला सकते हैं, जैसा अभी हो रहा है।