श्रीमद्भागवद्गीता के आईने से कर्मशीलता
अगर आपने श्रीमद्भागवद्गीता को ठीक से पढ़ा है तो कुछ बातों के सम्बंध में आपके विचार स्पष्ट होंगे । कुछ विचारकों का मत है कि श्रीमद्भागवद्गीता भारतीय अकर्मण्यता की जननी है। ये एक धूर्त धारणा है जिसे बहुत ही करीने से फैलाने की पुरजोर कोशिश रही है। सम्पूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता के केंद्र में कर्मयोग ही रहा है। ध्यान रहे कि अपने काल खंड के अनुरूप इसकी भाषा में धार्मिक शब्दावली का प्रचुर प्रयोग हुआ है। लेकिन भावार्थ स्पष्ट है। श्रीमद्भागवद्गीता ने मानव जीवन के मोक्ष के लिए जिन दो कारकों को अनिवार्य बताया है उनमें पहला है कि बिना कर्म किये मोक्ष सम्भव नही और दूसरा है बिना कर्मफल की चिंता को त्यागे मोक्ष सम्भव नहीं। मोक्ष को सिर्फ धार्मिक आध्यात्मिक रूप के अलावे भी समझना होगा। मोक्ष को जीवन के अंतिम लक्ष्य की अंतिम प्राप्ति के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। यह अंतिम उद्देश्य है।
जो लोग श्रीमद्भागवद्गीता को अकर्मण्यता की जननी करार देते हैं उन्होंने बड़ी चालाकी से पहले शर्त को गायब कर दिया है और तब दूसरी शर्त की उलूल जुलूल व्याख्या की है। पहली शर्त है कर्म करो। अब सवाल उठता है कि श्रीमद्भागवद्गीता किस कर्म की वकालत करता है। यँहा भी सबकुछ स्पष्ट है कि वही कर्म करो जो तुम्हारी क्षमता के अनुसार हो, जिससे समाज के व्यापक हित का नुकसान न हो और न ही तुम्हारे मनोबल में कोई कटुता आये। तो फिर इस कर्म से अकर्मण्यता कँहा आई? हाँ श्रीमद्भागवद्गीता ने उस कर्म की जरूर भर्त्सना की है जिससे खुद अपना मनोबल तो दूषित होता ही है साथ ही जो दूसरों के साथ अन्याय भी करता है। ऐसे कर्म जरूर वर्जित हैं श्रीमद्भागवद्गीता में।
दूसरी शर्त है कि कर्मफल की चिंता न हो। तो ये कैसे गलत हो गया? आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि कोई व्यक्ति तभी सफल हो पाता है जब वह जो प्रयास करता है उससे obsessed नहीं होता है। जब ध्यान परिणाम पर होता है तो कर्म में प्रयुक्त साधन की शुचिता से ध्यान हट जाता है और परिणाम ज्यादा जरूरी हो जाता है। तब सफलता के लिए हर गलत काम करने की अनैतिक शक्ति आ जाती है, तब चोरी, हत्या और लूट भी सही लगता है। लेकिन श्रीमद्भागवद्गीता के कर्मयोग की दूसरी अनिवार्य शर्त इस प्रवृत्ति को जन्मने से रोकती है। तो क्या यह अकर्मण्यता हो गई?
18वी और 19वी सदी में जब भारत में अंग्रेज़ी हुकूमत की ताकत बढ़ रही थी तब भारतीय दर्शन को पश्चिमी दर्शन के सामने बौना दिखाने के उत्साह में श्रीमद्भागवद्गीता के सम्बंध में ये गलत धारणा फैलाने की कोशिश शुरू हुई। ज्ञान न पूरब का है न पश्चिम का , ज्ञान तो पूरी मानव जाति का है। एमानुएल कांट भी अपने दर्शन में श्रीमद्भागवद्गीता के समीप आये और बुद्ध को बहुतों ने अपनाया। ज्ञान तो विचारों के संश्लेषण से ही निकलता है।