कोविड के दौरान सकारात्मक कैसे रहें
(इस आलेख में सिर्फ मनोवैज्ञानिक पक्ष को रखा गया है, अन्य पक्षों को जानबूझ कर अलग रखा गया है क्योंकि इसका उद्देश्य मानसिक शक्ति को मजबूती देना है। जो इंफ्रास्ट्रकचरल मुद्दे हैं वे अलग हैं)
आज हम सभी जिस भय के माहौल में जी रहें हैं उसमें यदि संयोगवश हम कोविड से बच भी जाएं तो भयजनित अवसाद से बचना मुश्किल है। इस स्थिति से हम कैसे खुद को कोविड के साथ साथ इसके भय के अवसाद और अपने प्रियजनों को हो रही क्षति के अवसाद से बचा पाएं ये एक महत्वपूर्ण सवाल है। कोविड के प्रेस्क्रिप्शन्स तो चारों तरफ घूम रहे हैं , मीडिया के हर अवतार हमें कोविड से बचने का चिकित्सीय तरीका बता रहें हैं लेकिन क्या अवसाद पर भी उसी प्रकार ध्यान दिया जा रहा है? उत्तर है , नहीं।
तो हमें क्या करना चाहिए?
हमारे समाज में एक खासियत रही है कि हम (1) इतne कठिन और अनिश्चित माहौल में जीने के आदि होते हैं कि स्वाभाविक रूप से अवसाद के प्रति भारतीयों में रेजीलिएन्स कुछ ज्यादा होता है, और(2) ईश्वर के प्रति हमारी गहरी आस्था, और हर छोटी बड़ी बात के लिए ईश्वर पर हमारी मानसिक निर्भरता भी हमें कई अवसरों पर मजबूती भी प्रदान करती है।
तो क्यों नहीं इन दो चीजों को जो हमारे समाज में पहले से मौजूद हैं उनको सही वैज्ञानिक ज्ञान से जोड़कर हम खुद को और मजबूत बनाएं मानसिक तौर पर?
तो आइए देखते हैं कि हम क्या कर सकते हैं
1. कोविड के प्रति अंधविश्वासी जानकारी से पीछा छुड़ायें।
2.कोविड के सम्बंध में सही जानकारी प्राप्त करें।
3.इस बात का ध्यान रखें कि कभी भी, किसी भी परिस्थिति में यदि आप किसी पीड़ित की कोई भी मदद कर सकते हैं तो खुद को सुरक्षित रखने की व्यवस्था के साथ उसकी मदद अवश्य करें
4. समाचारों को सुनकर अपना रक्तचाप नहीं बढ़ाएं, बल्कि उस हद तक आप क्रियाशील रहें जिस हद तक आपसे कुछ हो सकता है। सारी समस्या का निदान आपके पास ही है, ऐसा न सोचें।
5.प्रियजनों और अनजान लोगों को , भगवान न करें , कोई क्षति हो तो उनका , उनके परिवार को सम्बल प्रदान करें और उस क्षति को होने से रोकने के लिए आपसे जो हो सकता है, उतना अवश्य करें।
6.इस बात पर भरोसा बनाएं रखें कि आपके अधिकार में जो है उतना करने के लिए ही आप सक्षम हैं, उससे ज्यादा की खुद से भी उम्मीद न करें।
7.मित्रों और परिजनों से निरन्तर सम्पर्क बनाएं रखें, उनसे मिलना जुलना भले सम्भव न हो लेकिन उनसे बातचीत का सम्बन्ध कदापि टूटने न दें।
8.एकाकी जीवन से बचें।
9.इस बात पर भरोसा रखें कि यदि आप वैज्ञानिक पद्धति से अपना जीवन जी रहें हैं, और नैतिक रूप से आप कर्मशील बने हुए हैं तो न तो आप दोषी हैं और न हीं गलत हैं।
10.सही जानकारी रखें और हर सूचना को सही मानकर न चलें। ये युग इंफोडेमिक की महामारी का भी है, सो सूचनाओं के जंगल में जाने से बचें और विश्वसनीय स्रोतों पर ही भरोसा रखें।
11.सत्य से कदापि पीछे नहीं हटे ताकि बाद में सत्य का साथ नहीं देने का अफसोस न हो।
12.सकारात्मकता के नाम पर सत्य को कदापि नहीं अस्वीकारें, भले सत्य कितना भी कड़वा क्यों न हो और इस बात पर भरोसा बनाये रखें कि आप सत्य के मार्ग से ही सही मंजिल तक पहुँच सकते हैं।
13.इसकी पूरी संभावना है कि अविश्वसनीय रूप से बड़े स्तर पर लोगों को बीमार होते और मरते देख सुनकर आपके सेंसेज आपको बुरी तरह झझकोर दें। इस स्थिति में बीमार होने पर (ईश्वर न करें कि ऐसा हो) विशुद्ध वैज्ञानिक पद्धति का सहारा इस विश्वास के साथ लें कि इससे आप ठीक हो जाएंगे। इसके साथ ही आवश्यक उपायों की जानकारी इकठ्ठा कर के रखें। अपनी स्थिति से मित्रों परिजनों को अवगत कराते रहें ताकि समय पर आपको मदद मिल सके।
14.इस कठिन घड़ी में आप कदापि अपने अंदर की अच्छाई को मरने न दें, ये बहुत जरूरी है। यदि आपके अंदर इंसानियत के प्रति लगाव और भरोसा बना रहेगा तो आपको जीत जरूर मिलेगी, इस बात पर भरोसा रखें।
15. अपने जीवन की सामान्य दिनचर्या को बनाएं रखें, और दिनभर बीमारी की चर्चा में ही व्यस्त न हों। इसका एक बेहतरीन तरीका है, खाली समय में दोस्तों और परिजनों के साथ अन्य विषयों में समय व्यतीत करें अथवा खुद को ज्ञान प्राप्ति में लगाएं। आज की तारीख में आपको अपने पसन्द के किसी भी विषय पर पेड/अनपेड दोनों माध्यमों से इंटरनेट के द्वारा ढेरों जानकारी प्राप्त करने का अवसर है। आप अपना समय पुस्तकों के साथ भी व्यतीत कर सकते हैं। बस इतना ध्यान रखें कि हर समय बीमारी की चर्चा न करें।
16.यदि इलाज की प्रक्रिया कठिन दौर में आ जाये तब भी इस बात पर विश्वास बनाये रखें कि आप बीमारी से बाहर आने वाले हैं और इस स्थिति में चिकित्सा विज्ञान पर पूरा भरोसा रखें।
17.ध्यान रहे हर परिणाम आपके हाथ में नहीं है। आपके हाथ में इलाज कराना, खुश रहना, खुश रखना है। जो आपके हाथ में है, जो आपके वश में है उसे अवश्य करें।