कोरोना के समय मृतक के अधिकार
गंगा नदी में तैरते लावारिस लाशें चीन या पाकिस्ता की करतूत नहीं है और न ही किसी आतंकी की। अगर इनकी कारिस्तानी होती तो अभी तक कितने राष्ट्रवादी भाषणबाजी हो चुकी होते। लेकिन जब ये लाशें यंही के माननीय लोगों की और उनके बनाये तंत्र की कारिस्तानी है तो मरघटी सन्नाटा पसरा हुआ है इन घटनाओं पर। बात बेबात ट्वीट करने वाले भाषनवीरों का कोई अता पता नहीं हैं। क्या अपने देश के नागरिकों की इस जघन्य मौत पर किसी का राष्ट्रप्रेम नहीं जग पा रहा है?
वस्तुतः देशवासी होने की आपकी उपयोगिता इतनी भर है कि आप माननीय बना दें, और राष्ट्रवाद का नारा ये माननीय लगा पाएं इसके लिए आप अपनी जान दे सकें।
ये लाशें जिन लोगों की हैं वे भी किसी हिंदुस्तानी के घर के ही हैं, उसी राष्ट्र के लोगों की हैं जिसके प्रेम में आप माननीय न जाने कितने घड़ियाली आँसू बहा बहा कर लोगों का वोट चूस चुके हैं और अब गुठली की तरह उन्हें फेंक कर अपना हाथ मुँह पोंछकर दाढ़ी मूँछ हिला रहें हैं।
जिन घरों के लोग मर कर लाशों के रूप में नदियों में तैरते इधर उधर भटक रहे हैं हो सकता है उन घरों को उनकी मौत की जानकारी भी न हो और अगर होगी भी तो वे क्या कर लेंगे आपका।
नदियों में लाशें दंगों और आतंकी/आपराधिक मामलों में हत्या के बाद ही फेके जाते हैं। इस तरह की मौत को आप क्या कहियेगा, क्या ये किसी आतंकी करवाई से कम है कि किसी की मौत के बाद उसका मृत शरीर घर वालों को न मिले या मिल भी जाए तो वे उसका अंतिम संस्कार नहीं कर पाए। व्यक्ति का अधिकार मरने के साथ सम्पूर्ण रूप से खत्म नहीं होता सरकार बहादुर, उसे अपनी मौत के बाद अपने अंतिम संस्कार का पूरा हक है और यदि ये हक छीना जाता है तो ये आपराधिक/आतंकी कार्रवाई ही मानी जानी चाहिए और जिम्मेदार पर उस निरपराध व्यक्ति को जबरन मौत देने और मौत के बाद अंतिम संस्कार का मौका नहीं देने के लिए कार्रवाई होनी चाहिए। कोविड ने कई नए सवाल खड़े किए हैं और ये भी सवाल खड़ा किया है कि क्या किसी भी इंसान को उसकी मृत्यु के बाद उसके रीति रिवाजों के अनुसार मान्य अंतिम संस्कार से किसी भी कारण से कोई भी वंचित कर सकता है क्या और।अगर करता है तो क्या वह समाज के साथ साथ कानून का दोषी नही है?
समझिये परिस्थिति को अन्यथा आपकी भी, हमारी भी किसी की यह दुर्गति हो सकती है।