Skip to main content

कोविड महामारी के दौर में डेटा और इलाज व्यवस्था का खेल

कोविड महामारी के दौर में डेटा और इलाज  व्यवस्था का खेल

इधर कुछ चन्द दिनों से भारत में कोविड का ग्राफ अचानक बहुत तेजी से गिरने लगा और अब ये कहा जा रहा है भारत में कोविड 2 का पिक आकर गुजर 
गया यानी अधिकतम मामलों के सामने आने का समय आकर चला गया है, और संक्रमण के मामले लागातार कम होते जाएंगे। यंहा यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि जैसे ही विदेशी मीडिया में भारत के कोविड 2 के सम्बंध में जबरदस्त ढंग से खबरें आनी शुरू हुईं और प्रधान मंत्री श्री मोदी की खुलकर फजीहत के स्तर तक अलोचना होनी शुरू हुई, भारत में पिक भी  आ गया और केसों की संख्या अचानक से गिरने भी लगी। अब एक बात जो समझ में नहीं आ रही है, उस बात को तीन तथ्यात्मक वक्तव्यों  में तोड़कर व्यक्त किया जा सकता है,
(1) भारत में कोविड के मामले घट रहें हैं, यानी दूसरी लहर अब पिक के बाद फीकी पड़ रही है।
(2) कोविड का प्रसार अब ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत तेजी से हो रहा है
(3) ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा की  संरचना कमजोड है और टेस्टिंग कम हो है।
        अब इन तीनों वक्तव्यों को मिलाकर देखा जाए कि जब अधिसंख्य आबादी वाले  नए क्षेत्रों में कोविड का प्रसार बहुत तेजी से होने लगा है, जिनको जाँचने और इलाज करने के पर्याप्त साधन नहीं मौजूद हैं तो फिर कौन सा पिक आया और गया? मजे की बात ये है कि हमारे पास इकठ्ठे इस जानकारी को हासिल करने का कोई तरीका नहीं है कि किन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कितनी टेस्टिंग हुई, कितने कनफर्म मामले आये, इस टेस्टिंग को कवर करने वाली आबादी कितनी बड़ी है, उसमें पहले से संक्रमित कितने हैं,  संक्रमण जाँचने वाली सुविधा वाले लेब्रोटरी के कैचमेंट एरिया में कितनी की आबादी है, कितनों की जाँच हुई, जाँचे गए लोगों का उम्र और जेंडर वार वर्गीकरण क्या है, उस जाँच फैसिलिटी सेंटर के कैचमेंट में बीमारों के इलाज की क्या सुविधा मौजूद है, आदि आदि। ऐसे अनेकों सवाल हैं जो पब्लिक हेल्थ स्ट्रेटेजी के लिए बहुत ही आवश्यक हैं क्योंकि इन डाटा के अभाव में जो भी पालिसी होगी वो अंधेरे में तीर मारने सदृश्य ही होगी।
      अब इस पृष्ठभूमि में हम एक और सवाल का सामना कराना चाहेंगे। हर एक आदमी आज ये बात कहते मिल जाएगा कि भारत में पब्लिक हेल्थ स्ट्रक्टर की खास्ता हालत है। ये बात सुदूर ग्रामीण भारत का सबसे पिछड़ा व्यक्ति भी कहता है और दुनिया के पटल पर छाई शीर्षस्थ एजेंसियाँ और मीडिया भी कहती हैं, सिर्फ एक भारत की राज्य सरकारों और केंद्रीय सरकार को छोड़कर। और परिवर्तन या सुधार की जबाबदेही और उसके लिए आवश्यक संसाधन, जिनकी वैधानिक प्राधिकार और शक्ति दोनों शामिल हैं वो होती हैं सरकारों के पास। अब जरा समझने की कोशिश कीजिये कि  जिसे हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्रचर में  सुधार  लाने और  उन्नत करने का अधिकार हासिल है वो मान ही नहीं रहा है कि इस तरह की कोई समस्या है तो आप या कोई और क्या कर सकता है?
      एक तीसरा सवाल स्ट्रेटेजिक है कि भारत में सारे अधिकार केंद्र और राज्यों के पास हैं । लोकल सेल्फ बॉडीज किस लिए हैं इसका ज्ञान भारत की जनता को कभी नही हो पाया है, सिवाए इन बॉडीज के लिए प्रतिनिधियों के चयन के लिए होने वाले चुनावों में भाग लेने के। और ये स्थिति और गम्भीर तब लगती है जब स्वास्थ्य के मामले में हम पाते हैं कि इन बॉडीज के पास कोई भी न तो संसाधन हैं, न अधिकार हैं, न जबाबदेही है। मात्र शहरी क्षेत्रों में इनके सदस्यों की संख्या लगभग 1 लाख है पूरे देश में और ग्रामीण क्षेत्रों में तो कई लाख में ये संख्या है। लेकिन राज्य सरकारों ने कभी भी कोई पहल नहीं कि की इन संस्थाओं को कैसे मजबूत किया जाए। आज प्रधान मंत्री जी आह्वान कर रहें है कि ग्रामीण पंचायतों के प्रतिनिधि इस दिशा में कार्य करें। ये बात ढोल पीटने से अधिक कुछ भी नहीं है क्योंकि उनको भी बखूबी पता है कि जिनका वे आवाह्न कर रहें हैं उनको प्रभावकारी नियंत्रण करने का अधिकार तो सरकारों ने दिया ही नहीं है बल्कि विधायक और सांसद  इन प्रतिनिधियों को अपने प्रतियोगी के रूप में ही लेते रहें है और इस कारण इन संस्थाओं को मजबूत करने के हर प्रयास का खुलकर विरोध करते रहें हैं। यही रवैया सरकारी सेवकों का भी रहता आया है। अगर हम लोकल बॉडीज को मजबूत रखे होते तो आज सिस्टम को सही ढंग से चला पाने की स्थिति में होते।

Popular posts from this blog

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 47

गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो  ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।        श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।       ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?      इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे  विषाद  हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या  हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...
It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.