विकास की अगली सीढ़ी:आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस
बहुत जल्दी बहुत ज्यादा जान लेने की हड़बड़ी, सब कुछ को अपने हाथों में ले लेने की हड़बड़ी इंसान की उसी पाश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं जिसकी वजह से इंसान ने जमीन, संसाधन, सम्पत्ति और औरत पर कब्जा करने के लिए कई हिंसक और खतरनाक लड़ाइयों लड़ी हैं। जानकारी और विज्ञान में बढोत्तरी के साथ ही अब तकनीक, सूचना और आँकड़े मुख्य हथियार बन चुके हैं। इसी का परिणाम है कि आज इंसान ने अपने सबसे नायाब हथियार को एक ऐसा रूप देने का प्रयास किया है जिसे प्रकृति ने किसी अन्य जीव को नहीं दिया है और उसी के बल पर इंसान ने अबतक किसी भी जीव के मुकाबले सबसे सफल ढंग से संसार पर राज किया है। प्रकृति प्रदत्त इंसान का सबसे मजबूत पक्ष है इंटेलिजेंस। लेकिन आपसी प्रतिद्वंद्विता में जीत हासिल कर सबसे अधिक कब्जा करने की होड़ ने इंसान को "इंटेलिजेंस" बनाने को प्रेरित किया । नतीजा में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस सामने आया। इंटेलिजेंस का कोई भी रूप यदि इंसान के अतिरिक्त किसी भी अन्य सजीव या निर्जीव में आता है तो वह अन्य स्वाभाविक रूप से इंसान का प्रतिद्वंद्वी होगा। आदमी आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस विकसित करते समय तो इस भ्रम में रहा है कि भले इंटेलिजेंस को वो बना रहा है लेकिन इंटेलक्ट यानी विवेक तो उसी के पास रहेगा, किन्तु इंसान इस तथ्य को भूल गया कि कोई भी चीज जब बनती है तो वह सर्वाइवल का प्रयास करती है, यदि वो चीज बच गई तो उसे बचाने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है उस चीज में विकसित होने की क्षमता। आदमी ने ढेरों मशीन बनाये और ढेरों आविष्कार किये लेकिन उनमें से एक भी ऐसा नहीं रहा है जो इंसान के इंटेलिजेंस पर कब्जा कर सके। आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस अपने लगभग असीम प्रोसेसिंग क्षमता के कारण इस स्थिति में अवश्य होगा कि वह इंसानी इंटेलिजेंस को टक्कड़ दे सके और कालांतर में हो सके तो उसका विवेक भी प्राप्त कर ले। इस प्रकार आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस वो पहला आविष्कार है जिसमें इंसानी बुद्धि और विवेक पर कब्जा करने की क्षमता हो सकने की संभावना है। और ये सब सम्भव हो पाया है इंसान के अंदर के उस पाश्विकता के कारण जिसके चलते उसे हर वो चीज पाने की जिद्द मची हुई रहती है कि जो भी उसकी इक्षा हो, जो उसे जँचे उसे वो हासिल कर ले।
आज की तारीख में हम उस दुनिया की कल्पना कर सकते हैं जिसमें इंसानों के संसार में मशीनों का कब्जा हो और इंसान उनके दास। ये विकास के उस स्वाभाविक सिद्धान्त से भी विचारणीय लगता है जिसमें आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस ह्यूमन इंटेलिजेंस के बाद उसे और परिष्कृत होने के लिए विकसित किया गया हो। व्यक्ति और प्रकृति के विभाजन को विलोपित कर दोनों को यदि एक ही शक्ति आज हम मान लेते हैं तो विकास की अगली सीढ़ी आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस से लैस मशीन मानव होता प्रतीत होता है।