इंसान होने की मौलिकता ही बचा सकती है इंसानों को
कितनी आसानी से हम खुद के लालच, खुद की इक्षाओं और खुद की तथाकथित जरूरतों को पूरा करने के लिए बेजुबान, निरपराधों के वजूद को खत्म कर देते हैं। आज हम सब परेशान होकर खुद के परेशानियों में इस कदर डूबे हुए हैं कि हमको इसका इल्म भी नहीं कि कोई और भी है जो हमसे ज्यादा परेशान है,हमसे ज्यादा जरूरतमंद है। इंसान को, फिर चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने का हो, किसी भी धर्म या मजहब का मानने वाला हो उसे फिर से जरूरत है अपनी सभ्यताओं की शुरुआती दौर की कहानियों को पढ़ने जानने की। परेशानियाँ तो हैं लेकिन इन परेशानियों में भी कुछ लोग चालाकियों से बाज नहीं आते, फिर चाहे वो आपके पड़ोस का हो या किसी मुल्क का कोई ताकतवर राजा ही क्यों न हो। तारीख में ऐसे कई मक्कारों का जिक्र है जो अपने जमाने में शूरमा कहे जाते थे, लेकिन आज जब हम परेशानी में होते हैं, हिम्मत हारने को होते हैं तो हमारे सिर उन पुराने शरीफ बन्दों के सामने ही झुकता है जो खुद के जमाने में न तो ताकतवर थे, न राजे थे, न सिपाही। फिर चाहे आपका सिर मानसरोवर के किनारे बैठे रहने वाले शिव के सामने झुकता हो, या बरगद के नीचे धुनि रमाये बुद्ध के सामने, या फिर मोहम्मद साहब के सामने या फिर चरवाहे कहलाने वाले उस महान यीशु के सामने, सब के सब फक्कड़, दूसरों के लिए हमेशा हाज़िर रहने वाले। लेकिन अपनी हवस में हमने दुनिया को क्या बना डाला है कभी सोचा है हमने? बेजुबान पेड़ों की क्या बिसात जो इंसानों के बड़े बड़े मशीनों का सामना कर पाते, सो कटते गए, लेकिन उन्हीं पेड़ों के अकाल ने तुमको आज नंगा कर दिया है, तुम पेड़ों को लगाने का उत्सव मनाते फिरते हो। तुम्हारी एटमी ताकत से अथाह ऊर्जा पैदा होती है न! क्या मिल जाता है इस ऊर्जा से कि एक नहीं दिखने वाले वायरस से पनाह माँगते फिर रहे हो। इंसान से जब जानवर बनने का भूत चढ़ता है न तब इंसान इंसान नहीं रह जाता है, प्रेत बन जाता है। और नतीजे में कभी ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की बात करता है , कभी हथियारों की टेस्टिंग के लिए लड़ाइयाँ करता, करवाता है तो कभी शांति दूत बनने की नौटंकी करता है, पर उसका हर झूठ इस दुनिया को और कुरूप कर जाता है। खुद के इंसान होने और इंसान होने की मौलिकता की ओर जब तक नहीं लौटोगे, यूँ ही तड़पते रहोगे।