भीड़ बनने बनाने की राजनीति
एक स्वतंत्र नागरिक के लिए राजनीतिक द्वंद्व का कोई महत्व नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी चिंता एक नागरिक के रूप में मिलने वाले अधिकारों की रक्षा की होनी चाहिए इस स्वतंत्र नागरिक की राजनीति, राजनीतिक दलों की राजनीति से इतर नागरिक अधिकारों और नागरिक सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर होनी चाहिए। अगर हम आप राजीनीतिक दलों के मोहरे बनने से इनकार कर अपने अधिकारों और सुविधाओं की राजनीति शुरू कर दें तो राजनीतिक दलों को भी अपनी राजनीतिके दिशा दशा बदलनी ही पड़ेगी। लेकिन यदि हम खुद को दलों के चारे के रूप में। खुद को परोसते रहेंगे तो फिर राजनीति आराम से राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व की भलाई और उसके व्हिम की पूर्ति के लिए होगी। होगा ये कि बिना अपने हित के एजेंडे के आप नागरिक नहीं बल्कि भीड़ में तब्दील हो जाते हैं । तब आपका हित गौण हो जाता है और दलों के वे हित जो सत्ता प्राप्ति के लिए जरूरी माने जाते हैं वही राजनीति के केंद्र में होते हैं। ऐसी राजनीति में नागरिक भीड़ भर होता है, जयकारा लगाने और वोट देने के लिए। उसके बाद उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है क्योंकि उसके अपने संघर्ष के लिए कोई एजेंडा नहीं होते। तब वोट के बाद कि राजनीति नेताओं के बीच होती है और राजनीति के मैदान से बाहर स्टेडियम में नागरिक भीड़ बनकर बैठा होता है। उसकी अहमीयत इतनी भर होती है कि वो गिनती के उद्देश्य से आँकड़े में कितना है, यानी कि भीड़ कितनी है, नागरिक कितने हैं नहीं।