नई आर्थिक व्यवस्था
दक्षिणपंथ के उभार का मुख्य कारण लिबरल राजनीति और मुक्त अर्थव्यवस्था से उपजी असमानता है जिसमें श्रम के प्रति के घृणा का भाव है। लगभग 5 से 6 दशक तक के लंबे लिबरल शासन व्यवस्था के कारण जिस फ्रीडम आधारित दर्शन के तहत फ्री मार्केट इकॉनमी का जोर रहा उसने अवसरों की उपलब्धता, संसाधनों पर अधिकार और परिणामों की संभावना के क्षेत्र में घोर असमानता को जन्म दिया। जिस देश में जो वर्ग परम्परागत रूप से मजबूत था उसकी मजबूती काफी बढ़ गई। पूँजी की बेताहाशा वृद्धि हुई किंतु उसपर अधिकार उनका रहा जो फ्रीडम के नाम पर फ्री इकॉनमी के ऊँचे पायदान पर थे। तकनीक का जोर बढ़ा और गैर वस्तु माध्यमों यथा सॉफ्टवेयर,वर्चुअल तरीकों, और प्लेटफॉर्म, फण्ड मैनेजमेंट, डेटा मैनेजमेंट जैसे चीजों का महत्व बढ़ा और निर्माण सम्बन्धी, शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति बढ़ी। लेकिन गैर निर्माण नई तकनीक के क्षेत्र में रोजगार के अवसर तो कम थे ही , तकनीक के बल पर उनको और कम कर दिया गया ताकि मेघा के नाम पर बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित किया जा सके।
इस असमानता, फ्री मार्केट इकॉनमी और मेरिटोक्रेसीय का योगकीय परिणाम ये हुआ कि लोकतंत के मूल सिद्धांत कि सत्ता जनता की इक्षा अनुसार रहेगी, कमजोड हुआ और ओपिनियन इंडस्ट्री खड़ा कर अधिसंख्य लोगों के ओपिनियन को प्रभावित किया गया। इस दौर में जो अधिसंख्य आबादी पेरिफेरी पर धकेल दी गई वो अपनी आर्थिक,शैक्षणिक , और सामाजिक असमानता के कारण सत्ताधारी वर्ग से नाराज हुई। सत्ताधारी लिबरल वर्ग अपनी ही दुनिया में खोया हुआ था, gdp के बढ़ते आँकड़े, सकल पूँजी की बढ़ती मात्रा, तकनीक की चमक -दमक वाली सफलता में भुला हुआ असमानता जनित असंतोष को नहीं देख पा रहा था, फिर चाहे वो क्लिंटन हो, मनमोहन सिंह हों, या यूरोप के सोशल डेमॉक्रेटिक पार्टियों के नेतागण हों। ऐसी स्थिति में सत्ता से बाहर चल रही दक्षिणपंथी पार्टियों ने इस असंतोष को पकड़ा, उसके साथ सत्ता के प्रति घृणा के सेंटीमेंटल कारणों, जैसे भारत में धर्म को जोड़ा, नव धनाढ्य और शिक्षित वर्ग के खिलाफ और उनकी नई आर्थिक सफलता के खिलाफ मानसिकता तैयार की। ऐसा माहौल बनाया गया कि समाज का अधिसंख्य वर्ग सत्ता के द्वारा उपेक्षित किया जा रहा है। ये पूरी दुनिया में हुआ, लगभग साथ साथ, तुर्की , भारत, चीन, ब्रिटेन, स्पेन, वेनेजुएला, पोलैंड, हंगरी, मैक्सिको, कोलंबिया और अमेरिका में भी।
भारत में 1990 से जो आर्थिक परिवर्तन चले, तकनीकी प्रगति हुई उसने वही किया जिसका उल्लेख मैने ऊपर किया है। विशेष ये हुआ कि चूंकि भारत में कांग्रेस के बाहर कोई दक्षिणपंथ नहीं था, अगर था तो धार्मिक कट्टरपंथ था उसी ने इस असमानता को भुनाया और उसके साथ साम्प्रदायिकता को मिला दिया क्योंकि तथाकथित भारतीय दक्षिणपंथ मूल रूप से धार्मिक कट्टरपंथ था जिसे अव्सर की तलाश थी और वह अवसर भारत में फ्री मार्केट इकॉनमी वाले तौर तरीकों से उपजी असमानता ने दिया। चुँकि भारत बहु धर्मावलम्बियों का देश है सो यँहा धार्मिक आधार पर भौतिक असमानता को देख लेना बहुत आसान है और यही किया गया।
सो वर्तमान में वैश्विक स्तर पर दक्षिणपंथ का उभार फ्री मार्केट इकॉनमी से उपजी असमानता की देन है। अब दुनिया को इससे आगे बढ़कर नई आर्थिक व्यवस्था गढ़नी होगी और मुझे लगता है communatarianis की बढ़ती लोकप्रियता इसे परिभाषित करेगी।